Tuesday, October 13, 2026

देश की परीक्षा प्रणाली को बनना होगा भरोसा देने वाली व्यवस्था


अशोक मिश्र

एनटीए सुधारों के लिए बनी संसदीय समिति ने सिफारिश की है कि परीक्षा के दिन रैलियों, जनसभाओं और जुलूसों की अनुमति नहीं दी जाए। समिति का यह सुझाव व्यावहारिक और स्वागतयोग्य है। यह सच है कि बड़े आयोजन, सड़कों पर जाम, लाउडस्पीकर और भीड़ के कारण परीक्षार्थियों को अपने केंद्र तक पहुंचने में भारी असुविधा होती है। कई बार तो स्थिति इतनी बिगड़ जाती है कि छात्र समय पर केंद्र नहीं पहुंच पाते और उनकी वर्षों की तैयारी एक दिन की अव्यवस्था के चलते मिट्टी में मिल जाती है। 

परीक्षा के दिन सार्वजनिक आयोजनों पर रोक परीक्षार्थियों के लिए एक जरूरी सुरक्षा कवच की तरह है। लेकिन सवाल यह है कि क्या असली बाधा केवल ट्रैफिक है? संसदीय समिति ने इस असुविधा पर तो ध्यान दिया, लेकिन पेपरलीक जैसे भीतरी घाव पर कुछ नहीं कहा जो हर साल लाखों युवाओं के आत्मविश्वास को तोड़ देता है। कई बार तो युवाओं को आत्महत्या के लिए मजबूर कर देता है। पेपर लीक केवल एक परीक्षा की गोपनीयता भंग होने की घटना नहीं है। यह एक युवा मन के टूटने की व्यथा-कथा है। 

एक छात्र जो छोटे से कस्बे या गांव से आता है, वह किस तरह से पैसे जुटाता है, यह वही जानता है। पिता की बचत, मां के गहने गिरवी रखकर या कर्ज लेकर परीक्षा फीस भरी जाती है। ट्यूशन के लिए, किताबों के लिए, शहर में एक छोटे से कमरे का किराया, खाने-पीने का खर्च, ये सब जुटाते-जुटाते एक मध्यम वर्गीय और गरीब परिवार टूटने की कगार पर पहुंच जाता है। युवा दिन-रात एक करके पढ़ाई करता है। अपनी नींद, अपने सुख, अपने मित्रों तक को छोड़ देता है। 

उसके मन में एक ही सपना होता है कि नौकरी मिलेगी तो परिवार का जीवन सुधरेगा। लेकिन जैसे ही उसे पता चलता है कि पेपर लीक हो गया है, उसके सारे सपने छिन्न भिन्न हो जाते हैं। कई बार यह निराशा इतनी गहरी हो जाती है कि युवा खुद को ही दोषी मानने लगता है। कुछ तो इस हताशा में आत्महत्या जैसा कठोर कदम तक उठा लेते हैं। यह केवल परीक्षा का संकट नहीं, यह सामाजिक और मानवीय संकट है। पेपर लीक व्यवस्था की नीयत और संरचना का मामला है। 

इसमें प्रश्न पत्र बनाने से लेकर प्रिंटिंग प्रेस, ट्रांसपोर्टेशन, स्ट्रांग रूम, परीक्षा केंद्र और डिजिटल सर्वर तक की पूरी श्रृंखला शामिल है। यदि इस श्रृंखला की एक भी कड़ी कमजोर है या भ्रष्ट है, तो पूरी परीक्षा की पवित्रता नष्ट हो जाती है। सुधारों की बात यदि करनी है तो इसी श्रृंखला को अभेद्य बनाना होगा। इसके लिए सख्त कानून, तकनीकी निगरानी, बायोमेट्रिक सत्यापन, ब्लॉकचेन जैसी तकनीकों से प्रश्न पत्रों की ट्रैकिंग और सबसे बड़ी बात दोषियों को त्वरित और कठोर सजा सुनिश्चित करनी होगी ताकि कोई भी युवा के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने की हिम्मत न कर सके।

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