अशोक मिश्र
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान दवाओं की कीमतों को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने केंद्र सरकार से पूछा कि पूरा सिस्टम दवा निर्माताओं की मदद क्यों कर रहा है। अदालत ने एमआरपी और रिटेलर को मिलने वाली कीमत यानी प्राइस टू रिटेलर (पीटीआर) के बीच भारी अंतर पर चिंता जताई। सचमुच एमआरपी और पीटीआर के बीच भारी अंतर मरीजों के लिए काफी चिंता का विषय है। कोई भी मरीज या उपभोक्ता जब इन दवाओं को खरीदता है, तो सारा भार उसे ही उठाना पड़ता है। याचिकाकर्ताओं ने बताया कि भारत में कैसे एक ही दवा दो बिल्कुल अलग कीमतों पर बिकती है।एक उदाहरण अदालत में दिया गया कि एक इंजेक्शन की रिटेलर कीमत करीब 3,520 रुपये है, लेकिन उसकी एमआरपी 22,437 रुपये तय है। एक और कैंसर की दवा का उदाहरण और भी चौंकाने वाला था, जो रिटेलर को करीब 2,700 रुपये में मिलती है जबकि उसकी एमआरपी करीब 27,000 रुपये रखी गई थी, यानी लगभग दस गुना का अंतर। अदालत ने इस पर हैरानी जताते हुए इसे मरीजों के साथ दिनदहाड़े की गई डकैती कहा है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ड्रग्स प्राइस कंट्रोल आॅर्डर 2013 की कमियों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।
कोर्ट ने कहा कि लोग इलाज के लिए घर-गहने बेचने को मजबूर हो जाते हैं। भारत में स्वास्थ्य खर्च का बड़ा हिस्सा दवाओं पर जाता है। आंकड़ों के अनुसार घरेलू दवा बाजार का करीब 17 प्रतिशत हिस्सा ही सीधे मूल्य नियंत्रण के दायरे में आता है, जबकि शेष 83 प्रतिशत गैर-अनुसूचित दवाओं पर निर्माता शुरू में अपनी मर्जी से एमआरपी तय कर सकते हैं और बाद में सालाना 10 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की अनुमति होती है। अदालत ने नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी को लगभग निष्क्रिय बताया और सवाल किया कि सरकार की नजरों के सामने यह अंतर कैसे बना रहता है। यह अंतर आंकड़ों में नहीं, घर के बजट में दिखता है। भारत में इलाज पर होने वाले कुल खर्च का लगभग 17 प्रतिशत सिर्फ दवाओं पर जाता है।
यह दुनिया के कई विकसित देशों से कहीं अधिक है जहां बीमा या सरकारी खरीद इस बोझ को सोख लेती है। भारत में आज भी अधिकतर खर्च जेब से होता है। कैंसर, हृदय रोग, या लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों में यह बोझ परिवार को कर्ज, संपत्ति बेचने और इलाज छोड़ने तक ले जाता है। सरकारी अस्पतालों में भी जब दवा बाहर से लिखी जाती है या जन औषधि केंद्र पर विकल्प नहीं मिलता, तो वही लूट दोहराई जाती है। रिटेलर का ऊंचा मार्जिन उसे उसी ब्रांड को बेचने के लिए प्रेरित करता है जिसमें उसे ज्यादा लाभ है, सस्ता जेनेरिक नहीं। भारत में दो तरह की दवाएं हैं। शेड्यूल्ड दवाएं, जिनकी लगभग 388 दवाओं की सीलिंग कीमत एनपीपीए तय करता है, और नॉन-शेड्यूल्ड दवाएं, जो बाजार में 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा रखती हैं। नॉन-शेड्यूल्ड पर कंपनियां अपनी एमआरपी खुद तय करती हैं, बस सालाना बढ़ोतरी 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। इस नियम में ही खेल है। कंपनी कम पीटीआर पर दवा देकर रिटेलर और डॉक्टर को भारी मार्जिन का लालच देती है और एमआरपी ऊंची रखकर उस मार्जिन को वैध बना देती है।
सुप्रीम कोर्ट ने इसी पर केंद्र से पूछा कि पूरा तंत्र दवा निर्माताओं की मदद करने के लिए क्यों काम कर रहा है। केंद्र सरकार ने अदालत में कहा कि नीति के अनुसार पूरे इकोसिस्टम को कड़े नियंत्रण में नहीं लाया जाना चाहिए। भारत में दवाओं की कीमतें विश्व स्तर पर तुलनात्मक रूप से कम मानी जाती हैं। एमआरपी और रिटेलर कीमत के बीच का अंतर केवल निर्माता का मुनाफा नहीं होता। इसमें स्टॉकिस्ट, वितरक, रिटेलर, परिवहन, भंडारण, क्रेडिट सुविधा, एक्सपायरी का जोखिम, कर और मार्केटिंग जैसे कई खर्च शामिल होते हैं। अगर मार्जिन बहुत सख्ती से सीमित कर दिए गए तो छोटी फार्मेसियां और वितरण नेटवर्क प्रभावित हो सकता है। उद्योग का कहना है कि अनुसंधान, नए अणुओं का विकास और गुणवत्ता बनाए रखने के लिए पर्याप्त मार्जिन जरूरी है।
ज्यादा नियंत्रण से निवेश घट सकता है, आपूर्ति श्रृंखला बाधित हो सकती है और कुछ दवाएं बाजार से गायब भी हो सकती हैं। अब जरूरत है कि सरकार, नियामक एजेंसियां, उद्योग और उपभोक्ता संगठन मिलकर ऐसा ढांचा बनाएं जो अनावश्यक मुनाफाखोरी रोके, पारदर्शिता बढ़ाए और साथ ही दवाओं की उपलब्धता व गुणवत्ता बनाए रखे। केवल अदालती आदेश या सीमित नियंत्रण से समस्या हल नहीं होगी। व्यापक नीति, बेहतर निगरानी और सभी हितधारकों के बीच संवाद से ही स्वास्थ्य सेवाओं को ज्यादा न्यायसंगत बनाया जा सकता है। अदालत का इशारा साफ है कि जरूरी दवाओं को दो श्रेणियों में बांटकर एक को खुला छोड़ देना अब नहीं चलेगा। इलाज का 17 प्रतिशत हिस्सा दवाओं पर खर्च हो रहा है, यह आंकड़ा बताता है कि दवा महंगी नहीं, तो इलाज महंगा हो ही नहीं सकता।


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