Monday, October 12, 2026

सोता हुआ व्यक्ति मृतक समान है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

तथागत ने धर्म का प्रचार करने के लिए न दिन देखा, न रात देखी। जब और जहां मौका मिला, उन्होंने लोगों को आत्म कल्याण के लिए प्रेरित किया। राज महल में जहां सिद्धार्थ को दुनिया के समस्त सुख हासिल थे। हर काम के लिए दास-दासियां पंक्तिबद्ध होकर खड़े रहते थे, संन्यास धारण करने के बाद वह अपना समस्त कार्य खुद करते थे। एक ओर थे दुनिया भर का समस्त वैभव, वहीं दूसरी ओर श्रद्धालुओं की भीड़ और दुनिया भर के कष्ट। 

इसके बावजूद बुद्ध के चेहरे पर न कभी थकान की झलक मिली, न ही उत्साहहीनता की। ऐसा लगता था कि उनमें हर समय एक नई ऊर्जा प्रवाहित होती रहती थी। एक बार की बात है। वह अपने शिष्यों को रात्रि में प्रवचन दे रहे थे। प्रवचन सुनने के लिए उपस्थित समस्त जन बड़े ध्यान से बुद्ध की वाणी का श्रवण कर रहे थे। उनमें एक व्यक्ति ऐसा भी था, जो बीच-बीच में ऊंघ रहा था। 

ऐसा लगता था कि वह काफी थका हुआ है। शायद उसने दिन भर कठिन परिश्रम किया था। थकान की वजह से उसे नींद आ रही थी। वह भिक्षुक भी नहीं था। महात्मा बुद्ध ने उसे देखा और उसको पुकारते हुए कहा, वत्स! सो रहे हो? वह व्यक्ति हड़बड़ा उठा, नहीं भगवन! जागा हुआ हूं। बुद्ध ने अपना उपदेश जारी रखा। थोड़ी देर बाद वह फिर सो गया। तीन चार बार तथागत ने वही सवाल दोहराया और वह व्यक्ति नहीं भगवन कहकर फिर सो जाता। 

आखिरी बार बुद्ध ने उससे पूछा, जीवित हो, वत्स! उसने तपाक से कहा, नहीं भगवन! यह सुनकर वहां उपस्थित सारे लोग हंस पड़े। महात्मा बुद्ध भी मुस्कुराए और बोले, इस बार तुमने सही उत्तर दिया, वत्स! सोता हुआ आदमी मृतक समान है। जब तक हम अपनी प्रज्ञा और विवेक को नहीं जगाते हैं, तब तक हम सभी मृतक समान ही हैं।

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