Sunday, October 18, 2026

लोकतंत्र में रिजीम चेंज शब्द पर नहीं, इरादे पर बहस होनी चाहिए

अशोक मिश्र

रिजीम चेंज को लेकर इन दिनों देश की सियासत गरम है। सत्ता पक्ष और विपक्ष एक दूसरे पर वार-पलटवार कर रहे हैं। वैसे यह कोई नई बात नहीं है। हर बार यह सवाल बड़े जोरशोर से उठाया जाता है कि क्या किसी सरकार को बदलने की बात करना, उसकी वकालत करना या खुलेआम इसकी मांग करना लोकतंत्र में गुनाह है। इस शब्द के इर्द-गिर्द इतना शोर इसीलिए मचा हुआ है क्योंकि इसके दो बिल्कुल अलग अर्थ एक साथ चल रहे हैं। विपक्ष इसे लोकतंत्र की सबसे स्वाभाविक प्रक्रिया मानता है। 

उसका तर्क  सीधा है कि चुनाव, आंदोलन, आलोचना, अविश्वास प्रस्ताव, ये सब रिजीम चेंज के ही संवैधानिक औजार हैं। अगर सरकार अच्छा काम नहीं कर रही है। महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार या संवैधानिक संस्थाओं को अपने प्रभाव में लेकर काम कर रही है,तो विपक्ष का काम ही है जनता के सामने विकल्प रखना और कहना कि इस रिजीम को बदलो। इस अर्थ में रिजीम चेंज कहना न तो असंवैधानिक है, न राष्ट्र-विरोधी। यह तो मतदाता के मौलिक अधिकार का हिस्सा है। लोकतंत्र में कोई भी सरकार स्थायी नहीं होती, सत्ता बदलना ही लोकतंत्र की आत्मा है। जब सत्ता पक्ष ही हर आलोचना को रिजीम चेंज की साजिश बताकर देशद्रोह के खांचे में डाल देता है, तो वह दरअसल असहमति को ही अपराध बना रहा होता है। 

दूसरा पक्ष, जो आमतौर पर सत्ता में होता है, इस शब्द को एक अलग ही नजरिये से देखता है। उसका तर्क  है कि रिजीम चेंज का मतलब ही भू-राजनीति में बदलाव है। जब यह कहा जाता है कि फलां देश में रिजीम चेंज होना चाहिए, तो इसका इतिहास विदेशी हस्तक्षेप, आर्थिक प्रतिबंधों और अस्थिरता से जुड़ा रहा है। जब देश में कुछ नेता या समूह उसी शब्दावली का इस्तेमाल करते हैं, तो आशंका पैदा होती है कि क्या यह सिर्फ चुनावी नारा है या बाहरी ताकतों से सहानुभूति और आंतरिक अस्थिरता को न्योता देना है। 

चुनी हुई सरकार को अस्थिर करने की बात से देश की साख, निवेश का माहौल और संस्थाओं पर भरोसा कमजोर होता है। जनता ने पांच साल के लिए जनादेश दिया है, उसे रोज-रोज की बयानबाजी से कमजोर करना जनादेश का अपमान है। सच इन दोनों अतियों के बीच कहीं है। रिजीम चेंज की बात करना बुरा नहीं है, बुरा हो सकता है उसका तरीका और उसकी मंशा। अगर यह बात वोट की चोट से, संवैधानिक दायरे में, बेहतर नीति और बेहतर नेतृत्व का वादा लेकर कही जा रही है, तो यह लोकतंत्र को मजबूत करती है। 

यही तो विपक्ष का धर्म है। लेकिन अगर यह बात संस्थाओं को ध्वस्त करके, अफवाह, हिंसा या विदेशी मंचों पर जाकर देश को कठघरे में खड़ा करके कही जा रही है, तो यह चिंता का विषय बन जाती है। सवाल यह होना चाहिए कि उसके पीछे का रास्ता क्या सुझाया गया है-बैलेट का या किसी और चीज का। लोकतंत्र में शब्द नहीं, इरादे पर बहस होनी चाहिए।

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