बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
श्रेणिक मगध साम्राज्य के परम प्रतापी और अति प्रसिद्ध राजा थे। बौद्ध साहित्य में इन्हें ही बिंबिसार के नाम से जाना जाता है। बौद्ध और जैन साहित्य में इनके बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। कहते हैं कि यह जैन धर्म को मानने वाले थे, लेकिन इनकी आस्था बौद्ध धर्म पर भी थी।महात्मा बुद्ध और स्वामी महावीर के राजा श्रेणिक समकालीन थे। इनकी राजधानी राजगृह यानी राजगीर थी। इतनी पत्नी का नाम चेलना था जो वैशाली राज्य के राजा चेटक की पुत्री थीं। कहा जाता है कि रानी चेलना के प्रसिद्ध पुत्रों में अभयकुमार और कूणिक यानी अजातशुत्र शामिल थे। एक बार की बात है। राजा श्रेणिक का मन अशांत था। वह रात को न तो ठीक से सो पाते थे और न ही उन्हें भोजन रुचिकर लगता था।
मन अन्यमनस्क सा था। किसी काम में उनका मन नहीं लगता था। कई तरह की आशंकाएं उन्हें घेरे हुए थे। वह समझ नहीं पा रहे थे कि ऐसा क्यों हो रहा है। संयोगवश उन दिनों महात्मा बुद्ध राजगृह पधारे हुए थे। मन से बेचैन राजा श्रेणिक ने सोचा कि तथागत से मिलकर समस्या का समाधान पूछा जाए। वह आश्रम पहुंच गए। उस समय महात्मा बुद्ध का प्रवचन चल रहा था। वहां उपस्थित सारे लोग अत्यंत प्रसन्न होकर बुद्ध का प्रवचन सुन रहे थे।
राजा श्रेणिक भी बिना व्यवधान पैदा किए एक कोने में जाकर बैठ गए। बुद्ध ने उनकी मनोदशा भांप ली। प्रवचन के दौरान ही उन्होंने कहा कि मनुष्य को तृष्णाएं विचलित कर देती हैं। यदि मनुष्य तृष्णाओं से मुक्ति पा ले, तो राजा हो या रंक, सभी सुखी जीवन गुजार सकते हैं। तृष्णाएं मनुष्य का खो जाती हैं। यह सुनते ही राजा श्रेणिक को अपनी समस्याओं का समाधान मिल गया। वह प्रसन्न चित्त राज महल लौट गए।
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