अशोक मिश्रदेश में महंगाई ने 23 महीने का रिकॉर्ड तोड़ा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार सितंबर 2026 में खुदरा महंगाई दर यानि कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स आधारित महंगाई 5.54 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो अक्टूबर 2024 के बाद सबसे ऊंचा स्तर है और अगस्त के 4.83 प्रतिशत से काफी अधिक है। यह बढ़ोतरी लगातार आरबीआई के चार प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है। हालांकि छह प्रतिशत की ऊपरी सीमा के भीतर है। यह 23 महीने का उच्चतम स्तर है। इस तेजी के पीछे सबसे बड़ी वजह खाने-पीने की चीजों का महंगा होना है।
सितंबर में फूड इन्फ्लेशन यानि उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक 7.74 प्रतिशत तक पहुंच गया, जो अगस्त में 5.97 प्रतिशत था। ग्रामीण भारत में यह असर और ज्यादा है, जहां कुल महंगाई 6.08 प्रतिशत और खाद्य महंगाई 8.06 प्रतिशत दर्ज की गई, जबकि शहरी इलाकों में कुल महंगाई 4.88 प्रतिशत रही। रोजमर्रा की रसोई की थाली सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है। प्याज की महंगाई सालाना आधार पर 108.09 प्रतिशत तक उछल गई, जो अगस्त में 48.78 प्रतिशत थी। इस महंगाई का असर ब्याज दरों पर भी दिख रहा है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इसी दबाव के कारण आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति ने हाल की समीक्षा में दरें बढ़ाने का फैसला सही ठहराया है। कर्ज महंगा होने से होम लोन और पर्सनल लोन की ईएमआई बढ़ रही है, जबकि आमदनी उसी अनुपात में नहीं बढ़ रही। महंगाई के प्रभाव को कम करने के लिए कुछ व्यावहारिक कदम उठाए जा सकते हैं। मौसमी सब्जियों और स्थानीय मंडियों से खरीदारी करना, प्याज-अदरक-लहसुन जैसी चीजों का थोक में मिल-जुल कर स्टोर करना, दालों और तेल में ब्रांड के बजाय गुणवत्ता देखकर विकल्प चुनना और खाने की बर्बादी कम करना सीधे तौर पर थाली की लागत घटाता है।
सरकारी आंकड़ों पर नजर रखते हुए पीडीएस, मदर डेयरी के सफल स्टोर और एनसीएफ की रियायती बिक्री जैसी योजनाओं का उपयोग भी गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए राहत दे सकता है। बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी दोनों लोगों के लिए परेशानी का कारण बन रहे हैं। परिवार की आय बढ़ती महंगाई के अनुपात में नहीं बढ़ रही है। इसी वजह से युवाओं में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। लोग परेशान हैं। गरीबों को तो सबसे ज्यादा परेशानी हो रही है। रोज की थाली का बजट ही बिगड़ जाता है।
परिवार दाल, तेल और सब्जी की मात्रा घटाने लगते हैं, बच्चों के पोषण पर असर पड़ता है। मध्यम वर्ग की सैलरी महंगाई के हिसाब से नहीं बढ़ रही, लेकिन स्कूल की फीस, मकान का किराया, बिजली का बिल और कर्ज की ईएमआई लगातार बढ़ रही है। ब्याज दर बढ़ने से होम लोन और पर्सनल लोन महंगा हो गया है, इसलिए बचत लगभग खत्म हो रही है। गरीब परिवारों के लिए दिहाड़ी में काम मिलने पर भी हाथ में पैसा कम बचता है क्योंकि किराना और यातायात दोनों महंगे हैं। कई परिवार इलाज या बच्चों की पढ़ाई जैसे जरूरी खर्च टालने को मजबूर हो रहे हैं।


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