अशोक मिश्र
मेरठ के चर्चित नीले ड्रम हत्याकांड का अंतत: फैसला आ गया। इस मामले में जिला जज अरविंद कुमार मिश्र की अदालत ने मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मृत्युदंड की सजा सुनाई है। सच कहा जाए, तो यह फैसला केवल एक आपराधिक मामले का अंत नहीं है। यह हमारे समय के सामाजिक, नैतिक और न्यायिक अंतर्द्वंद्व पर की गई एक तीखी टिप्पणी है। जिन दिनों यह मामला प्रकाश में आया था, पूरे देश में इसकी चर्चा हुई थी। चर्चा का कारण मुस्कान और साहिल द्वारा हत्या के दौरान की गई क्रूरता थी।एक मर्चेंट नेवी अफसर सौरभ राजपूत की हत्या उसकी ही पत्नी मुस्कान और उसके प्रेमी साहिल ने कर दी थी। शव के पाँच टुकड़े करने के बाद उसे सीमेंट से भरे नीले ड्रम में छिपा दिया गया। अदालत ने इसे जघन्यतम अपराध मानते हुए रेयरेस्ट आॅफ रेयर की श्रेणी में रखा। दोनों अपराधियों को हत्या के साथ-साथ साक्ष्य छिपाने के आरोप में सात-सात साल की अतिरिक्त सजा भी सुनाई। अदालत ने अपने फैसले में महाभारत का उल्लेख करते हुए कहा कि अपराधी को उसके किए की सजा देना भी धर्म का कार्य है। अदालत ने यह भी कहा कि जब प्रजा सोती है, तब भी कानून जागता रहता है।
अदालत द्वारा की गयी यह टिप्पणी काफी महत्वपूर्ण है। भारतीय न्याय व्यवस्था में फांसी केवल प्रतिशोध नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक अंतरात्मा की प्रतिक्रिया होती है। जब प्रेम, जो मनुष्य को बेहतर बनाता है, वही स्वामित्व और वासना में बदलकर इतनी बर्बरता पर उतर आए कि एक इंसान को काटकर ड्रम में भर दिया जाए, तो कानून को यह संदेश देना पड़ता है कि मनुष्यता की एक सीमा है जिसके पार जाना अक्षम्य है। इस फैसले के दो मानवीय पहलू भी हैं जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता। पहला, सजा सुनते ही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग पर मौजूद दोनों दोषियों का रो पड़ना और मुस्कान का यह कहना कि मेरी बच्चियों का ध्यान रखना।
यह एक माँ की अंतिम चिंता थी, जो बताती है कि अपराधी भी अंतत: एक मनुष्य ही है। आवेश में उसने अपराध तो किया, लेकिन वह अपनी बेटियों के प्रति उतनी ही संवेदनशील है जितनी एक मां को होना चाहिए। दूसरा, मृतक सौरभ की माँ का यह कहना कि आज बेटे को न्याय मिला, जो एक परिवार के 591 दिन लंबे इंतजार और 126 सुनवाइयों के दर्द का अंत है। मृत्युदंड एक सभ्य समाज के लिए हमेशा एक दुखद घटना है।
लेकिन यह फैसला एक स्पष्ट चेतावनी है कि वैवाहिक संबंधों में विश्वासघात का रास्ता कानूनन तलाक से निकलता है, हत्या से नहीं। प्रेम के नाम पर किया गया स्वार्थ जब किसी निर्दोष की जान ले लेता है, तो समाज को उसके खिलाफ सबसे कठोर शब्दों में बोलना ही पड़ता है। इस सजा ने पीड़ित परिवार को न्याय दिया है, पर साथ ही हम सबके सामने यह सवाल भी छोड़ा है कि हम अपने रिश्तों में इतने असंवेदनशील और हिंसक कैसे होते जा रहे हैं?


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