गुड़गांव, फरीदाबाद, मानेसर, कुंडली, सोनीपत और हिसार जैसे क्षेत्र लाखों लोगों को रोजगार देते हैं। इन शहरों को राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। लेकिन पिछले कुछ महीनों से इन औद्योगिक क्षेत्रों में बिजली कटौती की समस्या ने उत्पादन की रफ्तार को धीमा कर दिया है। बिजली कटौती के चलते कारखानों की मशीनें बंद हो जाती हैं। उद्यमियों को डीजल जनरेटर चलाने पड़ते हैं। इससे उत्पादन खर्च 10 से 12 रुपये प्रति यूनिट तक पहुंच जाता है, जिससे उत्पादन लागत भारी मात्रा में बढ़ गई है। समस्या का मूल कारण मांग और उपलब्धता के बीच का बढ़ता फासला है।
नतीजा यह है कि फैक्ट्रियों को तय शेड्यूल के अलावा भी कई बार बिना सूचना के बिजली बंद करनी पड़ रही है। एक बार मशीन रुकी तो उसे दोबारा शुरू करने में समय, कच्चा माल और मजदूरी तीनों बर्बाद होते हैं। दूसरी तरफ बिजली की मांग हर साल 7 से 8 फीसदी बढ़ रही है। नए उद्योग लग रहे हैं, डेटा सेंटर आ रहे हैं, मेट्रो और ई-वाहन चार्जिंग स्टेशन भी जुड़ रहे हैं। पर ट्रांसमिशन और वितरण नेटवर्क उतनी तेजी से नहीं बढ़ा। कई सब-स्टेशन पुराने हैं और लोड सहन नहीं कर पाते। पीक आॅवर्स में ट्रिपिंग और वोल्टेज की समस्या आम हो गई है। बिजली केवल एक सुविधा नहीं है, यह आज के उद्योग की सांस है। जब सांस ही अनियमित हो जाएगी तो उत्पादन, रोजगार और राजस्व तीनों प्रभावित होंगे।
राज्य के औद्योगिक संगठनों का कहना है कि बार-बार की बिजली कटौती के चलते न केवल उत्पादन घट रहा है, बल्कि कामगारों की क्षमता भी प्रभावित हो रही है। छोटे और मझोले कल-कारखानों पर सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ रहा है। माल समय पर न बनने से निर्यातकों और बड़े खरीदारों के आॅर्डर रद्द हो रहे हैं। छोटे और मझोले संस्थान ज्यादा देर तक जेनरेटर चलाना काफी महंगा साबित हो रहा है। इसके चलते कई छोटे और मझोले कल-कारखाने बंद हो रहे हैं।
इसका समाधान तात्कालिक राहत और दीर्घकालिक योजना दोनों से निकलेगा। हालांकि सरकार यमुनानगर और पानीपत में नए बिजलीघर बना रही है ताकि आने वाले समय में पर्याप्त बिजली मिल सके। राज्य सरकार अपनी ओर से बिजली कटौती को रोकने का भरपूर प्रयास कर रही है, लेकिन सफलता नहीं मिल रही है।
No comments:
Post a Comment