अशोक मिश्र
हरियाणा कांग्रेस के नए प्रभारी संजय सतीशचंद्र दत्त की हालत पर यह मुहावरा काफी सटीक बैठता है-आए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास। कांग्रेस हाई कमान ने उन्हें राज्य में संगठन खड़ा करने की जिम्मेदारी दी है, लेकिन अब उन्हें कांग्रेस में व्याप्त गुटबाजी को लेकर नए सिरे से संघर्ष करना पड़ रहा है। वैसे हरियाणा प्रदेश कांग्रेस के इतिहास में न तो गुटबाजी का इतिहास नया है और न ही नए प्रभारी का आना। अब तक न जाने कितने नए प्रभारी आए और चले गए, लेकिन प्रदेश कांग्रेस की गुटबाजी पर लगाम लगाने में विफल रहे।कार्यकर्ताओं को भी अब इस गुटबाजी की आदत सी हो गई है। प्रदेश कांग्रेस में हुड्डा खेमा, सैलजा खेमा, सुरजेवाला खेमा के साथ-साथ अब तो कुछ नए चेहरे छोटे स्तर पर दिखाई देने लगे हैं। जब भी राज्य में चुनाव के दिन नजदीक आते हैं, हर खेमा अपने-अपने दावे लेकर उठ खड़ा होता है। हर चुनाव से पहले यही कथा दोहराई जाती है और नतीजा हर बार वही निराशाजनक ही होता है।
हरियाणा प्रभारी संजय दत्त का पांच दिवसीय दौरे से एक आशा बंधी थी कि प्रदेश कांग्रेस में माहौल बदलेगा। नेता अपने-अपने अहंकार को त्यागकर कांग्रेस को मजबूत करने में अपना सौ प्रतिशत योगदान देंगे, लेकिन ऐसा दिखाई नहीं दिया। वैसे तो कहने को सभी गुट के वरिष्ठ नेता मंच पर एक साथ दिखाई दिए, लेकिन उन्होंने मंच पर जिस तरह अपनी बातें रखीं, उससे यह साफ हो गया कि हाथ भले ही मिले हों, लेकिन उनके दिल नहीं मिले हैं। बैठक के दौरान ही पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और पार्टी महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला के बीच मंच पर ही तीखी नोकझोंक का एक वीडियो वायरल हो रहा है जिससे हालात का पता चलता है।
सैलजा कुमारी का यह कहना कि कुछ नेता कार्यकर्ताओं से अपनी जयजयकार करवाते हैं, लेकिन जिस दिन कांग्रेस जिंदाबाद के नारे लगेंगे, उस दिन कांग्रेस मजबूत हो जाएगी। सच तो यह है कि इन वरिष्ठ नेताओं के बीच अदावतें बहुत पुरानी और इतनी गहरी हैं कि दो-चार बैठकों से यह वैरभाव खत्म होने वाला नहीं है। हुड्डा का जनाधार और संगठन पर पकड़ आज भी सबसे मजबूत है। वहीं सैलजा दलित और महिला वोट को साधने की कोशिश में हैं। सुरजेवाला अपने संगठन कौशल के लिए जाने जाते हैं। इन तीनों को एक मंच पर लाकर एकजुट करना किसी जादू से कम नहीं होगा।
यदि प्रदेश प्रभारी संजय दत्त इस काम में सफल हो जाते हैं, तो यकीनन हरियाणा कांग्रेस में बदलाव आएगा। कांग्रेस का सबसे जरूरी काम है युवा और नए चेहरों को मौका देना। हरियाणा में जाट राजनीति के साथ-साथ गैर-जाट, ओबीसी और दलित समीकरण भी हार-जीत तय करते हैं। अगर कांग्रेस सिर्फ पुराने नामों के इर्द-गिर्द घूमती रही तो भाजपा को हराना मुश्किल होगा।
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