Thursday, July 23, 2026

विकल्प नहीं, हरियाणा की जरूरत बन चुकी है प्राकृतिक खेती

अशोक मिश्र

प्राचीनकाल में जब हल से जुताई करके खेती करने की पद्धति का विकास नहीं हुआ था, तब लोग प्राकृतिक खेती करते थे। वह खेतों और अन्य खाली जगहों पर बीज का छिड़काव कर दिया करते थे। अनुकूल मौसम में यह बीज अंकुरित होकर बढ़ते रहते थे और समय आने पर लोग उस फसल को काट लेते थे। बाकी अवशेष को वह यो ही छोड़ देते थे, जो अगली फसल के लिए खाद का काम करते थे। 

आज भी प्राकृतिक खेती इसी तरह से की जाती है। प्राकृतिक खेती में यूरिया, डीएपी और कीटनाशकों जैसे कृत्रिम रसायनों का बिल्कुल उपयोग नहीं होता है। इन रासायनिक खादों की जगह मिट्टी के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए खेत में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों और देसी गाय के गोबर-मूत्र का उपयोग किया जाता है। हरियाणा की सैनी सरकार ने 2026-27 तक एक लाख एकड़ भूमि को प्राकृतिक खेती के दायरे में लाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। प्राकृतिक खेती को अपनाने के लिए अब तक लगभग दो लाख किसानों ने तीन लाख एकड़ भूमि के लिए पोर्टल पर पंजीकरण कराया है। 

एक जानकारी के अनुसार राज्य में लगभग 24 हजार किसान 44 हजार एकड़ भूमि में अभी प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। राज्य में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए हर पंचायत ने अपनी कुल भूमि का 10 प्रतिशत या कम से कम एक एकड़ हिस्सा प्राकृतिक खेती के लिए आरक्षित करने का फैसला लिया है। प्राकृतिक खेती का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसके माध्यम से पैदा हुई फसल हानिकारक रसायनों से पूरी तरह मुक्त होती है जिससे गंभीर किस्म की बीमारियों के होने का खतरा नहीं रहता है। 

प्राकृतिक खेती पूरी तरह से पारिस्थितिकी पर आधारित है। देसी गाय के गोबर, गोमूत्र, गुड़, दाल के आटे और मिट्टी के मिश्रण से 'जीवामृत' (तरल उर्वरक) और 'बीजामृत' (बीज उपचार) तैयार किए जाते हैं, जो मिट्टी में सूक्ष्मजीवों को बढ़ाते हैं। प्राकृतिक खेती अन्य पद्धतियों की अपेक्षा सस्ती और सुरक्षित है। यही वजह है कि  राज्य सरकार रसायनिक खाद और कीटनाशकों के बढ़ते खर्च, घटते भूजल और मिट्टी की उर्वरता में गिरावट के के कारण पिछले कुछ सालों से प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दे रही है। 

प्राकृतिक खेती में रासायनिक खाद, कीटनाशक और सिंचाई पर खर्च 40 से 50 प्रतिशत तक कम हो जाता है। प्राकृतिक खेती से कार्बन उत्सर्जन घटता है, मिट्टी का स्वास्थ्य सुधरता है और स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च कम होता है। राज्य सरकार का मानना है कि अगर एक लाख एकड़ का लक्ष्य पूरा हुआ तो खाद और बिजली सब्सिडी में करोड़ों की बचत होगी और निर्यात के लिए जैविक उत्पादों का बाजार भी खुलेगा। राज्य की अर्थव्यवस्था को कम लागत, बेहतर स्वास्थ्य और टिकाऊ पानी की दिशा में ले जाएगी। प्राकृतिक खेती आज विकल्प नहीं, जरूरत बन चुकी है।

No comments:

Post a Comment