बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
कहते हैं कि इनसान जो बोता है, उसे जीवन में काटना जरूर पड़ता है। जो अपने माता-पिता की देखभाल नहीं करता है, तो संभव है कि उसकी संतान भी अपने माता-पिता की देखभाल न करे। ऐसा हर मामले में तो संभव नहीं है, लेकिन कुछ मामलों में यह बात सच हो सकती है। कहते हैं कि किसी जगह पर एक फकीर रहता था। जीवन भर गांव-गांव शहर-शहर भटकता रहा।एक दिन ऐसा भी आया, जब वह बूढ़ा हो गया। अब उसमें चलने-फिरने की ताकत नहीं रही। उसने सोचा कि अब भटकने से बेहतर है कि वह अपने परिवार के पास लौट जाए। उस समय उसके परिवार में बेटा-बहू और छह-सात साल का पौत्र था। घर लौटने पर उसके बेटे-बहू ने बेमन से घर में रख लिया। खाना खाते समय उस फकीर के हाथ कांपते थे। जब वह चम्मच से खाना निकालता, तो कुछ न कुछ मेज या फर्श पर गिर जाता। पानी या दूध पीने के लिए गिलास उठाता, तो वह भी मेज पर गिर जाता। मेज और फर्श पर खाना वगैरह गिरने से बहू को सफाई करनी पड़ती थी। कई बरतन भी हाथ से छूटकर टूट चुके थे।
फकीर की बहू ने अपने पति से कहकर बूढ़े फकीर को एक छोटी मेज पर खाने के लिए बैठा दिया। उसके बर्तन भी लकड़ी के थे। खाने का चम्मच भी लकड़ी का बनवा लिया। इससे बूढ़ा फकीर बहुत दुखी हुआ, लेकिन कर भी क्या सकता था। काफी दिन बीत गए। एक दिन बेटे ने अपने पुत्र को लकड़ी का कटोरा बनाते देखा, तो पूछा, बेटे! तुम क्या कर रहे हो।
उसके बेटे ने जवाब दिया कि पिता जी, कटोरा बना रहा हूं। जब मैं बड़ा हो जाऊंगा, तो आपको भी इसमें खाने को दिया करूंगा। फकीर का बेटा यह सुनकर अवाक रह गया। अपने बेटे की बात सुनकर पति-पत्नी बहुत परेशान हो गए। उस दिन से बूढ़े फकीर को अलग मेज पर बैठकर खाने की जरूरत नहीं पड़ी। जब तक बूढ़ा फकीर जिंदा रहा, बहू-बेटे ने बहुत ख्याल रखा।
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