बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
आजकल सोशल मीडिया पर तमाम ऐसी पोस्ट देखने को मिल जाती हैं जिसमें कोई स्त्री या पुरुष किसी गरीब को कुछ वस्तु या खाने-पीने की वस्तु दे रहा होता है। लोग छोटी से छोटी चीज का दान देते समय वीडियो बनाते हैं या फोटो खींचते हैं और सोशल मीडिया पर पोस्ट कर देते हैं। ऐसी पोस्ट उनकी मानसिकता को दर्शाता है। दान देते समय मन की भावना पवित्र होनी चाहिए।एक समय की बात है। किसी गुरुकुल में आचार्य अपने शिष्यों को शिक्षा दे रहे थे। उसी समय नगर का एक बड़ा व्यापारी अपने सेवकों के साथ आया। आचार्य ने उसका ठीक वैसे ही स्वागत किया, जैसा कि वह अन्य लोगों का किया करते थे। अमीर व्यापारी अपने साथ कई तरह फल, मिष्टान्न और अनाज की कई बोरियां थीं। आचार्य ने अपने शिष्यों से कहकर व्यापारी द्वारा लाए गए उपहार को भंडार गृह में रखवा लिया। कुछ देर रहकर व्यापारी अपने सेवकों के साथ चला गया। संयोग से व्यापारी के जाने के कुछ देर बाद एक बुजुर्ग महिला एक कटोरे में थोड़ा सा भात लेकर आई। वह अत्यंत गरीब थी।
उसे देखते ही आचार्य अपने आसन से उठे और उस बुजुर्ग महिला के पास जाकर उसको प्रणाम किया। बुजुर्ग महिला द्वारा लाए गए भात को वह बड़े प्रेम से खाने लगे। भात खाने के बाद बुजुर्ग महिला का कटोरा धोकर आचार्य ने आदर सहित लौटा दिया। वह महिला चली गई। तब एक शिष्य ने कहा कि गुरु जी! व्यापारी के उपहार की ओर तो आपने देखा नहीं, लेकिन बुजुर्ग महिला का थोड़ा सा भात लेने आप खुद उठकर उसके पास गए, ऐसा क्यों? आचार्य ने कहा कि व्यापारी के दान में अहंकार का भाव था।
उसने जो कुछ भी दिया है, वह उसके धन का मामूली हिस्सा है। लेकिन महिला का थोड़ा सा भात उसके पूरे दिन की कमाई थी। किसी का दान नहीं, उसकी भावना देखनी चाहिए। बुजुर्ग महिला की भावना पवित्र थी, व्यापारी की भावना में अहंकार था।
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