अशोक मिश्र
महात्मा बुद्ध ने कहा है कि जो पल आप जी रहे हैं, वही पल आपका है। जो बीत गया, वह बीत गया। वह दोबारा वापस आने से रहा। जो भविष्य के गर्भ में है, उस पर आपका कोई अधिकार नहीं है। ऐसी स्थिति में जो वर्तमान है, उसी को अच्छी तरह से जीना चाहिए। वर्तमान को संवारकर ही अच्छे भविष्य की रूपरेखा तय की जा सकती है। दर्शन में इसे बुद्ध का क्षणवाद कहा जाता है।
इस संदर्भ में एक रोचक कथा है। किसी राज्य का राजा अत्यंत धनवान था। वह अपने राज्य की प्रजा के लिए भी जरूरत पड़ने पर कल्याणकारी काम करता था। इसके बावजूद वह खुश नहीं था। वह अपनी नाखुशी का कारण भी समझ नहीं पाता था। धीरे-धीरे उसके मन में निराशा बढ़ती जा रही थी। एक दिन उसने अपने राज्य के एक बुद्धिमान व्यक्ति के सामने अपनी समस्या रखी।
उस बुद्धिमान व्यक्ति ने राजा से कहा कि कल सुबह महल के बाहर जो व्यक्ति खुश दिखाई दे, उसके साथ एक दिन गुजारिये। आपकी समस्या का समाधान हो जाएगा। अगले दिन राजमहल के बाहर राजा खड़ा हुआ। तभी उसने देखा कि एक लकड़हारा अपने सिर पर लकड़ी का गट्ठर लादे हुए जा रहा है। सिर पर बोझ होने के बावजूद वह गुनगुना रहा था।
राजा ने उस लकड़हारे से पूछा कि तुम इतने गरीब हो, रात का खाना मिलेगा या नहीं, इसकी भी गारंटी नहीं है। इसके बावजूद तुम खुश दिख रहे हो। क्या कारण है? उस लकड़हारे ने कहा कि मैं स्वस्थ हूं। अपनी मेहनत की कमाई खाता हूं। मैं यह कतई नहीं सोचता हूं कि कल क्या होगा। मैं आज में ही मस्त रहता हूं। इसलिए मुझे कोई चिंता नहीं होती है। यह सुनकर राजा समझ गया किउसकी बीमारी का कारण क्या है। उसी दिन से वह भविष्य की चिंता छोड़कर प्रजा के पालन पर अधिक ध्यान देने लगा।
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