बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
लालच में अकसर लोग अपनी किस्मत को संवारने का अवसर खो देते हैं। कई बार ऐसा होता है कि यदि हम लालच में न पड़ें, तो हमारे जीवन की दशा बदल सकती है, लेकिन यह लालच हमें कहीं का नहीं छोड़ता है। इसी वजह से कहा गया है कि लालच बुरी बला है। इस संबंध में एक बहुत रोचक कथा है। कहते हैं कि एक सूनसान जगह पर एक बूढ़ा तीन गठरियों के साथ खड़ा हुआ था।
तभी उस रास्ते से एक युवक गुजरा। बूढ़े ने युवक से कहा कि बेटा, अगर तुम यह गठरी उठाकर ले चलो, तो मैं तुम्हें दो सोने के सिक्के दूंगा। युवक मान गया। उसने एक गठरी उठाई। गठरी भारी थी। युवक ने पूछा कि बाबा! इसमें क्या है? बूढ़े ने कहा कि इसमें सिक्के हैं। थोड़ी दूर चलने के बाद एक नदी आई। बूढ़े ने कहा कि बेटा! दो गठरियां लेकर मैं नदी नहीं पार कर पाऊंगा। क्या तुम एक गठरी और ले लोगे।
युवक ने हामी भर दी। युवक ने दूसरी गठरी उठाकर पूछा, बाबा! इसमें क्या है? बूढ़े ने कहा कि इसमें चांदी के सिक्के हैं। तुम इसे लेकर भाग तो नहीं जाओगे। युवक ने कहा कि नहीं, मैं ईमानदार आदमी हूं। नदी पार करने के बाद एक पहाड़ी आ गई। बूढ़े ने कहा कि बेटा, इस गठरी को भी तुम ले लो। मैं गठरी उठाकर पहाड़ी पार नहीं कर सकता हूं। युवक ने तीसरी गठरी उठा ली।
युवक ने पूछा, इसमें क्या है? बुजुर्ग ने कहा कि इसमें सोने के सिक्के हैं। तुम लेकर भाग तो नहीं जाओगे। युवक ने कहा कि वह ईमानदार है। आगे जाने पर बूढ़ा पीछे रह गया। तब युवक तीनों गठरियां लेकर भाग गया। घर जाकर उसने तीनों गठरी खोली, तो उसमें मिट्टी भरी हुई थी और एक पत्र रखा हुआ था। पत्र में लिखा था कि मुझे एक ईमानदार खजांची की जरूरत थी। इसलिए तुम्हारी परीक्षा ली गई, लेकिन तुम पास नहीं हुए। पास हो जाते तो मंत्रि परिषद के सदस्य बन जाते। ठाठ का जीवन बिताते। यह पढ़कर युवक अपने लालच पर बहुत शर्मिंदा हुआ।
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