अशोक मिश्र
जब तक नागरिकों में ‘मेरा कचरा, मेरी जिम्मेदारी’ वाली सोच पैदा नहीं होगी, तब तक प्रत्येक जिले में करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी कचरे के ढेर और गंदी नालियों से निजात नहीं मिलेगी। सच कहा जाए, तो स्वच्छ हरियाणा का सपना तब सच होगा, जब सरकार के साथ हर नागरिक अपने दरवाजे से सफाई शुरू करेगा। वैसे तो प्रदेश में स्वच्छता के नाम पर हर साल हर जिले में सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं। राज्य में बड़ी जोर-शोर से स्वच्छ भारत मिशन भी चलाया जाता है।
नेता, अधिकारी और कुछ सामाजिक संस्थाएं किसी दिन सड़कों पर झाड़ू लगाकर स्वच्छता का संदेश भी देती हैं। अखबारों और टीवी चैनलों पर झाडू बुहारते हुए फोटो और खबर भी प्रकाशित हो जाती है। उसके चंद घंटों बाद वह सड़क फिर से अपने पुराने स्वरूप में आ जाती है। स्वच्छता के नाम पर नगर निकायों का बजट, सफाई कर्मचारियों की तनख्वाह, कचरा उठाने के ठेके, डोर-टू-डोर कलेक्शन, सेग्रीगेशन प्लांट और जागरूकता अभियान जैसे सारे उपाय किए जाते हैं, लेकिन इनमें से अधिकतर कागज पर दिखते हैं, वास्तविकता में नहीं। गुरुग्राम, फरीदाबाद, पंचकूला और करनाल को स्मार्ट सिटी कहा जाता है। इसके बावजूद सुबह सड़क पर निकलते ही कूड़े के ढेर, नालों में प्लास्टिक और खाली प्लॉट में कचरे का पहाड़ आमतौर पर दिख ही जाता है।
अकेले गुरुग्राम में कचरा प्रबंधन और सफाई के लिए 315 से 350 करोड़ रुपये तक वार्षिक खर्च होता है। फरीदाबाद में भी सौ से 125 करोड़ प्रति वर्ष खर्च होने का अनुमान है। राज्य सरकार 'स्वच्छ भारत मिशन' (शहरी और ग्रामीण) के तहत सालाना करोड़ों रुपये आवंटित करती है। इतने भारी बजट के बाद भी सड़कों पर कूड़ा बिखरा हुआ दिखाई दे, तो सचमुच यही समझना चाहिए कि स्थानीय प्रशासन अपने काम में लापरवाही बरत रहा है। सारा दोष सफाई कर्मचारियों का ही नहीं है।
सच कहा जाए, तो राज्य के नागरिकों की लापरवाह आदत की वजह से भी सड़कों, गलियों और मैदानों में सफाई नहीं रह पाती है। ठेले वाले, दुकानदार और बिल्डिंग मैटेरियल वाले भी कचरा उठाने की फीस बचाने के लिए रात में सड़क किनारे डाल जाते हैं।
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