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Thursday, May 14, 2026

अरे! यह भोजन तो बासी है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मित्रता का अर्थ यह नहीं है कि साथ घूमे-फिरे। सुख में मित्रता का दंभ भरा और जब संकट का समय आया, तो अपने मित्र से कन्नी काटकर निकल गए। मित्रता तो मित्र की मौत के बाद भी कायम रहती है।  दो मित्रों की एक बहुत ही अच्छी कथा है। किसी नगर में दो मित्र रहते थे। 

दोनों मित्र एक दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनते थे। अमीरी-गरीबी या ऊंच-नीच की भावना उनमें कभी नहीं आई। संयोग की बात है। एक दिन एक मित्र की मौत हो गई। उम्र भी लगभग साठ के आसपास की हो गई थी। जीवित बचे मित्र को बहुत दुख हुआ। वह जानता था कि उसके मित्र का पुत्र आलसी और लापरवाह है। उसके मित्र ने काफी मेहनत करके खूब धन कमाया था। 

मित्र का पुत्र अपने आलस्य के चलते कुछ ही दिनों में सारे धन को खर्च कर बैठेगा। फिर कंगाली का जीवन जीना पड़ेगा। मित्र की मौत के कुछ दिनों बाद वह व्यक्ति दिवंगत मित्र के घर गया। मित्र का पुत्र उसे जानता था। उसने बड़े सम्मान के साथ उसे बैठाया और आग्रह करते हुए कहा कि कुछ दिनों बाद त्यौहार आ रहा है। कृपया आप उस दिन भोजन पर पधारें। उस आदमी ने आग्रह स्वीकार कर लिया। जब वह व्यक्ति खाने पर बैठा, तो उसने पहला निवाला खाने के बाद कहा, अरे यह भोजन तो बासी है। 

मित्र के पुत्र ने कहा कि नहीं, यह तो अभी बनाया गया है। बासी कैसे हो सकता है। उस आदमी ने कहा कि इसमें गंध तो बरसों पुरानी आ रही है। मित्र का पुत्र समझ गया कि वह क्या कहना चाहते हैं। जिस धन से यह भोजन बना है, वह मेरे पिता का कमाया हुआ है। पुत्र ने अपने पिता के मित्र से कहा कि आप क्या कहना चाहते हैं, मैं समझ गया हूं। आप निश्चिंत रहें। मैं अपने पिता की संपत्ति में कमी नहीं आने दूंगा। मैं मेहनत करूंगा और अपनी कमाई से आपको भेजन कराऊंगा। यह सुनकर उस आदमी ने भोजन किया और संतुष्ट होकर अपने घर चाला गया।