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Friday, May 15, 2026

मन का अभिमान दूर हो चुका था

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अभिमान वह दीमक है, जो व्यक्ति को धीरे-धीरे सफाचट कर जाता है। जिसे एक बार अभिमान हो गया, समझो कि वह पतन की ओर बढ़ चला है। उसके सुख-समृद्धि सब कुछ नष्ट होने वाला है। अभिमान पालने वाला यदि राजा भी हो, तो कुछ ही दिनों में वह रंक हो जाता है। 

किसी राज्य में राजा को अभिमान होने लगा। वैसे वह बहुत ही दयालु और गुणवान राजा था। उसने जीवन में कभी अपनी प्रजा के साथ राजा की तरह व्यवहार नहीं किया था। वह हमेशा अपनी प्रजा को पुत्रवत मानकर ही व्यवहार किया था। वह अपनी प्रजा का हर तरह से ख्याल रखता था। लेकिन पिछले कुछ दिनों से उसका मन काफी चंचल हो रहा था। वह कई दिनों से अपने मन को साधने में लगा हुआ था। 

वह अपने राजा होने या राजकोष की संपदा पर कतई अभिमान नहीं करना चाहता था। लेकिन वह राजा था तो क्या हुआ, था तो इंसान ही। धीरे-धीरे उसके मन में अपने वैभव को लेकर अभिमान की भावना स्थायित्व पाने लगी। इसी कशमकश में वह अपने राजगुरु के पास पहुंचा। राजगुरु राजा को देखते ही सारा माजरा समझ गए। उन्होंने कहा कि यदि तुम मेरी तीन बातों को हमेशा याद रखोगे, तो तुम सामान्य जीवन जी सकोगे। पहली बात यह है कि सदा अपने गुरु के साथ रहकर चरित्रवान बने रहना। 

दूसरी बात कि कभी भरपेट भोजन मत करना। तीसरी बात कि कम से कम सोना। सोने से बचे हुए समय में प्रजा की रक्षा करना। राजसी वैभव का मोह मत करना। जब जहां जैसा बिस्तर मिले, सो जाना। ऐसी स्थिति में तुम्हें घासफूस के बिस्तर पर भी अच्छी नींद आएगी। राजा अपने गुरु की बातों का मर्म समझ गया। उसने गुरु को प्रणाम किया और राज महल लौट आया। उसके मन का अभिमान दूर हो चुका था।