बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
कहा गया है कि गोधन, गजधन, बाजधन और रतनधन खान। जब आवे संतोष धन, सब धन धूरि समान। इस बात से साधु प्रवृत्ति के लोग तो सहमत होंगे, लेकिन सामान्य वृत्ति के लोगों को यह सुहाएगा नहीं। हर व्यक्ति के मन में यह लालसा रहती है कि उनके पास जीवनयापन के लिए पर्याप्त धन जरूर रहे। धन की लालसा होना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन वह अपनी मेहनत से कमाया हुआ धन ही सार्थक है।काशी में एक पंडित रामनाथ रहते थे। उनकी कुटिया नगर के बाहरी हिस्से में बनी हुई थी जिसमें वह अपनी पत्नी के साथ रहते थे। वह गुरुकुल चलाते थे। उनके पास काफी दूर-दूर से विद्यार्थी पढ़ने आते थे। एक दिन जब वह पढ़ाने जाने लगे, तो उनकी पत्नी ने कहा कि घर में एक मुट्ठी चावल है। आज खाना क्या बनेगा? पंडित जी ने पल भर पत्नी को देखा और फिर चले गए।
| प्रतीकात्मक चित्र |
दोपहर में जब वह खाने बैठे, तो उनकी थाली में थोड़ा सा चावल और साग रखा हुआ था। उन्होंने अपनी पत्नी से पूछा कि यह स्वादिष्ट साग कहां से आया है? पत्नी बताया कि मेरे सवाल पर आने इमली की ओर देखा था, तो मैंने इमली के पत्तों का साग बना दिया। इस तरह सादगी पूर्ण जीवन बिता रहे थे। यह बात राजा के कानों तक पहुंची तो वह उनसे मिलने आए और नगर में रहने का प्रस्ताव रखा। रामनाथ ने मनाकर दिया। फिर राजा ने पूछा कि आपको किसी बात की परेशानी तो नहीं है।
उन्होंने कहा कि मेरी पत्नी से पूछिए। उनकी पत्नी ने जवाब दिया, महाराज! कोई कष्ट नहीं है। कपड़े अभी फटे नहीं हैं। खाने को कुछ न कुछ मिल जाता है। जरूरत के समय के लिए मेरे हाथों में थोड़ी चूड़ियां हैं। राजा ने मदद करने की बहुत कोशिश की लेकिन रामनाथ दंपति इसके लिए तैयार नहीं हुए।

