अशोक मिश्र
ब्रिटिश हुकूमत की जेल में क्रांतिकारियों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार को लेकर 63 दिन तक भूख हड़ताल करके मौत को गले लगाने वाले क्रांतिकारी यतींद्रनाथ दास का जन्म 27 अक्टूबर 1904 को कोलकाता में हुआ था। असहयोग आंदोलन में भाग लेने के कारण सोलह साल की अवस्था में वह दो बार जेल गए। अपने जीवन में तो वह कई बार गिरफ्तार किए गए और जेल भेजे गए।एक बार की बात है। वह गर्मी की तपती दोपहरी में कलकत्ता की सड़कों पर कहीं जा रहे थे। उन्होंने देखा कि सड़क के किनारे लोगों की भीड़ लगी हुई है। उन्होंने देखा कि एक बुजुर्ग महिला गर्मी में चक्कर खाकर गिर पड़ी थी। वहां खड़े लोग उस महिला से सहानुभूति जता तो रहे थे, लेकिन मदद के लिए कोई आगे नहीं आ रहा था। यह देखकर यतींद्रनाथ आगे आए और उन्होंने बुजुर्ग महिला को उठाते हुए कहा, चलो! मां घर चलते हैं।
उन्होंने उस महिला की गठरी अपने सिर पर रख लिया। घर पहुंंचने पर उन्होंने उस महिला से पूछा कि आपका कोई नहीं है क्या? उस महिला ने रोते हुए बताया कि मेरा एक बेटा था जिसकी महामारी के दौरान मौत हो गई है। तब यतींद्रनाथ ने कहा कि आपका बेटा मरा नहीं है। मैं हूं न आपका बेटा। इसके बाद उन्होंने कुछ रुपये उस महिला के हाथ पर रख दिया।
वह महिला जब तक जीवित रही, वह आर्थिक सहायता करते रहे। लाहौर षड्यंत्र केस में छठी बार गिरफ्तार होने के बाद जब भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त ने क्रांतिकारियों के साथ जेल में होने वाले दुर्व्यवहार के विरोध में भूख हड़ताल की, तो लोगों ने उनसे भी भूख हड़ताल के लिए कहा। उन्होंने कभी न तोड़ने के वायदे के साथ भूख हड़ताल शुरू की और 63 दिन तक भूख हड़ताल करने के बाद 13 सितंबर 1929 को वह शहीद हो गए।

No comments:
Post a Comment