Monday, January 5, 2026

ऐसा न हो, मैं हल चलाना ही भूल जाऊँ

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

इंसान को अपने कर्म पर हमेशा भरोसा करना चाहिए। यदि परिस्थितियां विपरीत हों, तो भी न साहस छोड़ना चाहिए और न ही अपना कर्तव्य। यदि अपने कर्तव्य से विमुख हो गए, तो विपरीत परिस्थितियों को अपने अनुकूल कैसे बना पाएंगे। जो विपरीत परिस्थितियों से लड़कर उसे अपने अनुकूल बना लेता है, असली विजेता वही है। है तो यह एक काल्पनिक कथा, लेकिन इस संदर्भ में सटीक उदाहरण बन सकता है। 

एक बार की बात है। किसी गांव में एक ज्योतिषी आया। उस ज्योतिषी ने सभी गांव वालों को एक जगह इकट्ठा किया और घोषणा की कि इस इलाके में अगले बारह साल तक बारिश नहीं होगी। यह सुनकर गांववाले काफी घबरा गए। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए। जब बारिश ही नहीं होगी, तो वह करेंगे क्या? उनके परिवार का पालन पोषण कैसे होगा? काफी सोच विचार के बाद लोगों ने गांव छोड़ने का फैसला किया। एक किसान ने वहीं रहने का फैसला किया। 

गांववालों ने उस किसान को बहुत समझाया, लेकिन वह नहीं माना। लोगों के गांव छोड़ने के सात-आठ दिन तक तो किसान परेशान रहा, लेकिन एक दिन उसने अपने खेत को जोतना शुरू कर दिया। एकाध दिन बाद बादल का एक टुकड़ा उधर से गुजरा। किसान को हल जोतते देखकर कहा, तुम्हें नहीं मालूम है कि इस इलाके में बारह साल तक बरसात नहीं होगी। 

किसान ने कहा कि मुझे मालूम है, लेकिन खेत इसलिए जोत रहा हूं कि कहीं मैं खेत जोतना ही भूल न जाऊं। किसान की बात सुनकर बादल के उस टुकड़े ने सोचा कि मैं भी कहीं बरसना न भूल जाऊँ। यही सोचकर उसने बरसना शुरू कर दिया। उसको बरसता देखकर दूसरे बादल भी बरसने लगे। गांव के लोग भी इस दौरान लौट आए।

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