बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
कबीरदास अनपढ़ जरूर थे, लेकिन वैचारिक स्तर पर वह काफी ऊंचे स्तर पर थे। वह काम भले ही जुलाहे का करते थे, लेकिन वह अपने युग के तमाम उच्च पदस्थ लोगों से कहीं ज्यादा उदार और सोच में बहुत आगे थे। वह किसी भी प्रकार के पाखंड के प्रबल विरोधी थे।दिखावा तो उन्हें पसंद ही नहीं था। कबीर दास का जीवन जितना सादगी भरा था, उनका समझाने का ढंग भी उतना ही निराला था। वह जीवन के तमाम प्रसंगों के माध्यम से ही शिक्षा दे दिया करते थे। वह जैसा जीवन जीते थे, उसी प्रकार के उनके विचार भी थे। यही वजह है कि आज भी कबीरदास की बातें समाज में ग्राह्य हैं। एक बार की बात है। कबीर दास अपना काम-धाम निपटाने के बाद लोगों के बीच बैठे ज्ञान चर्चा कर रहे थे। उनका प्रवचन सुनने के लिए एक धनी व्यक्ति रोज आता था।
वह जानना चाहता था कि कबीरदास की बातों में ऐसा क्या है जिसको सुनने के लिए इतनी ज्यादा मात्रा में लोग आते हैं। तभी उसका ध्यान कबीरदास के कुर्ते पर गया। कुर्ता बहुत ही साधारण था। उसने सोचा कि कबीरदास को एक अच्छा कुर्ता भेंट किया जाए। दो-तीन दिन बाद वह एक अच्छा सा कुर्ता बनवाकर लाया। कबीर ने ग्रहण कर लिया। दूसरे दिन कबीरदास वही कुर्ता पहनकर प्रवचन देने लगे। धनी व्यक्ति ने जब उन्हें देखा तो अपना माथा पीट लिया। कबीरदास ने कुर्ता उल्टा पहन लिया था।
कुर्ते का बाहरी कपड़ा तो मखमल का था, लेकिन अंदर का कपड़ा साधारण था। उस व्यक्ति ने कहा कि आपने कुर्ता उल्टा पहना है। कबीर ने लोगों से कहा कि यह कुर्ता इन्हीं महोदय ने दिया है। नरम हिस्सा शरीर को छू रहा है। साधारण हिस्सा दिखाने के लिए काफी है। यह सुनकर वह व्यक्ति शरमा गया।

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