Thursday, January 29, 2026

आलसी का कभी भला नहीं हो सकता है


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जो व्यक्ति समय का सदुपयोग करना नहीं जानता है, वह जीवन में कभी सफल नहीं हो सकता है। समय मुट्ठी से फिसलती रेत के समान होता है। धीरे-धीरे कब वह हाथ से फिसल जाता है, इसका आभास तक नहीं होता है। जब मुट्ठी खाली हो जाती है, तब जाकर एहसास होता है कि अरे, अब तो कुछ नहीं बचा है। एक आलसी की कहानी भी कुछ इसी तरह की है। 

एक बार किसी गांव में एक साधु आया। उसकी काफी दिनों तक एक ऐसे युवक ने सेवा की, जो खुद बहुत आलसी था। लेकिन उसने साधु की सेवा बड़े मन से की थी, इसलिए साधु उसकी सेवा से प्रसन्न हो गया। उसने उसे पारस पत्थर देते हुए कहा कि इस पत्थर से सात दिनों तक लोहे को सोने में बदल सकते हो। सातवें दिन मैं आऊगा तब तुम्हें यह पारस पत्थर वापस करना होगा। 

यह सुनकर वह युवक बहुत प्रसन्न हुआ। उसने अपने घर में लोहे को खोजना शुरू किया। उसके यहां बहुत थोड़ा सा लोहा मिला जिसे उसने सोने में बदल दिया। अगले दिन वह बाजार लोहा खरीदने गया। लोहा बहुत महंगा था। उसने सोचा कि इतना महंगा लोहा खरीदने से बेहतर है कि वह थोड़े दिन रुक जाए, जब लोहा सस्ता हो जाएगा, तब वह लोहा खरीदेगा। तीन दिन बाद वह फिर बाजार पहुंचा। 

लोहे का दाम पहले की अपेक्षा कई गुना ज्यादा हो गया था। उसने सोचा कि कुछ दिन और इंतजार कर लेता है। यही सोचते-सोचते सातवां दिन आ पहुंचा। साधु उस पत्थर को लेने आ पहुंचा। युवक ने विनती की कि वह कुछ दिन और पत्थर उसके पास रहने दे, लेकिन साधु नहीं माना और पत्थर ले लिया। साधु ने कहा कि तुम आलसी आदमी हो। तुम्हारा भला नहीं हो सकता है। कोई दूसरा होता तो अब तक अपने घर में सोने का पहाड़ खड़ा कर लेता। तुम निरे आलसी हो।

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