Tuesday, January 13, 2026

समाज की सामूहिकता और श्रम की महत्ता का पर्व है लोहड़ी

अशोक मिश्र

लोहड़ी आ गई। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, उत्तराखंड, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बड़ी धूमधाम से लोहड़ी मनाई जाती है। लोहड़ी प्रकृति की पूजा का पर्व है। प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का अवसर है। हड्डियों को भी कंपा देने वाली ठंड की विदाई का अवसर जानकर लोग प्रसन्न हैं। सूर्य मकर रेखा पर आने वाला है। ऐसी स्थिति में कौन ऐसा प्राणी होगा जो प्रसन्न नहीं होगा। मकर संक्रांति से एक दिन पहले मनाई जाने वाली लोहड़ी वस्तुत: किसानों का पर्व है। 

यह श्रम की महत्ता और सामूहिकता का पर्व है। लोहड़ी बताती है कि मानव समाज का विकास भी सामूहिकता की वजह से ही हुआ है और भविष्य में भी सामूहिकता ही देश और समाज को आगे ले जाएगी। यही वजह है कि लोहड़ी भी सामूहिक रूप से मनाई जाती है। कोई भी घर में लोहड़ी नहीं मनाता है। गांव हो या शहर का कोई मोहल्ला सभी जगहों पर किसी एक खुले स्थान पर लकड़ियां और उपले इकट्ठे किए जाते हैं। उसमें आग लगाने के बाद लोग आग सेंकते हैं, उसके इर्दगिर्द बच्चे से लेकर बूढ़े तक नाचते गाते हैं, हंसी ठिठोली करते हैं। मूंगफली, रेवड़ी और मक्के का लावा लोहड़ी को समर्पित किया जाता है। 

दरअसल, जलती हुई लोहड़ी इस बात का प्रतीक है कि अब ठंड विदा होने वाली है। कल तक जो ठंड लोगों को घरों में ही रहने को बाध्य कर रही थी, दैनिक कार्यों में एक बाधा के रूप में थी, वह अब विदा होने वाली है। मकर राशि में प्रवेश करने के बाद सूर्य की ऊष्मा प्रखर होने लगेगी। ऐसी स्थिति में प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करना, लाजिमी है। हमारा देश सदियों से कृषि प्रधान रहा है। ज्यादातर तीज-त्यौहार खेती-किसानी से ही जुड़े रहे हैं। लोहड़ी भी किसानों का ही पर्व है। यह वैदिक काल से ही मनाया जा रहा है। रबी की फसल तैयार हो रही है। किसान अपनी मेहनत को फलीभूत होते हुए देखकर प्रसन्न है। 

धरती ने उसे उम्मीद से ज्यादा दिया है। जल्दी ही पड़ने वाली गर्मी में फसल पकने लगेगी, ऐसी स्थिति में अग्नि और धरती के प्रति श्रद्धा प्रकट करना, उसका कर्तव्य है। वह मूंगफली, रेवड़ी, तिल, मक्के का लावा (पॉपकॉर्न) आदि अग्नि और धरती को समर्पित करके उसे प्रति श्रद्धा और आदर प्रकट करता है। प्रकृति की ही अनुकंपा की वजह से उसका और उसके परिवार का पालन पोषण होता है। 

अपनी मेहनत का परिणाम देखकर किसान प्रसन्न है, तो नाचना-गाना स्वाभाविक है। लोहड़ी लोकपरंपरा का पर्व है। इस अवसर पर लोकगीतों से गली, मोहल्ला और गांव गुलजार हो जाते हैं। लोकगीत हमारे देश की प्राचीन परंपरा के वाहक होते हैं। इन गीतों के माध्यम से ही हमें पता चलता है कि हमारे पूर्वज कैसे थे और उनकी परंपराएं कैसी थीं। लोहड़ी के अवसर पर दूल्ला भट्टी की कथा न गाई जाए, ऐसा हो ही नहीं सकता है।

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