बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
केशव गंगाधर तिलक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, शिक्षक, वकील और समाज सुधारक थे। उन्हें जनमानस लोकमान्य तिलक के नाम से पुकारता था। वह कांग्रेस के बड़े नेताओं में शुमार किए जाते थे। कांग्रेस में उन दिनों दो तरह की विचारधारा वाले नेता पाए जाते थे।तिलक गर्म दल के नेताओं में प्रमुख थे। सन 1916 में तिलक ने गरम दल के नेता के रूप में घोषणा की थी कि स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा। बात उन दिनों की है, जब वह स्कूल में पढ़ते थे। एक दिन उनके अध्यापक इतिहास पढ़ा रहे थे। सभी छात्र अपनी कापियां निकालकर नोट बनाते जा रहे थे।
पढ़ाने के दौरान अध्यापक ने ध्यान दिया कि सभी छात्र तो नोट बना रहे हैं, लेकिन एक छात्र ने कापी तक नहीं निकाली है। नोट न बनाने वाले छात्र थे केशव गंगाधर तिलक। तिलक से अध्यापक ने पूछा कि तुम नोट क्यों नहीं कर रहे हो? तिलक ने जवाब दिया, जो आप पढ़ा रहे हैं, वह मुझे पहले से ही याद है। अध्यापक नाराज हो गया। उसने कहा कि यदि तुम मुझे नहीं सुना पाए, तो तुम्हें छड़ी से पीटूंगा।
तिलक ने पूरा पाठ ज्यों का त्यों सुना दिया। अध्यापक चुप रह गए। तिलक को दंडित नहीं कर पाए। अगले दिन उस अध्यापक ने देखा कि सीट के पास मूंगफली के छिलके पड़े हुए हैं। बस फिर क्या था? बिना तहकीकात किए वह हर छात्र की पिटाई करने लगे। जब तिलक का नंबर आया, तो उन्होंने सजा स्वीकार करने से इनकार करते हुए कहा कि आप पहले पूछ लीजिए कि किसने छिलके बिखराए हैं। उसके बाद उसको सजा दीजिए। किसी एक की गलती के लिए पूरी क्लास सजा क्यों भुगते। बाद वाजिब थी। अध्यापक को चुप रह जाना पड़ा।

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