बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
अत्याचार करने से बड़ा गुनाह अत्याचार को सहन करना है। सच तो यह है कि जब हम अपने ऊपर हो रहे अत्याचार को चुपचाप सहन करते हैं, तो इससे अत्याचार करने वाले का साहस बढ़ जाता है। वह और अत्याचार करने लगता है। यदि अत्याचार का विरोध किया जाए, तो अत्याचार करने वाला अपना साहस खो देता है। एक बार की बात है। स्वामी विवेकानंद रेल से कहीं जा रहे थे।वैसे भी स्वामी विवेकानंद बहुत ज्यादा दिनों तक एक जगह पर नहीं रहते थे। पैदल, रेल या बस से वह यात्रा किया करते थे। वह पूरे भारत का भ्रमण करके देश की दशा को समझना चाहते थे। एक स्टेशन पर जब रेलगाड़ी रुकी, तो दो अंग्रेज अफसर उस डिब्बे में चढ़े जिसमें स्वामी विवेकानंद बैठे हुए थे। वह दोनों अंग्रेज एक महिला के बगल में बैठ गए। उस महिला की गोद में बच्चा था।
एक अंग्रेज कभी बच्चे का कान पकड़कर उमेठ देता,तो कभी उसके गाल पर चुटकी काट लेता। बच्चा रोने लगता। यह सब कुछ स्वामी विवेकानंद काफी देर से देख रहे थे। उन्हें गुस्सा आ रहा था। ट्रेन जब अगले स्टेशन पर रुकी, तो वह महिला चुपचाप उठकर दूसरे डिब्बे में बैठ गई। उन दिनों अंग्रेज भारतीय को बहुत परेशान किया करते थे। वह इस तरह की हरकतें किया करते थे।
अब अंग्रेज अफसरों ने दूसरे लोगों को परेशान करना शुरू किया। तब स्वामी विवेकानंद उठे और उन अंग्रेज अफसरों के सामने खड़े हो गए। पहले तो उन्हें घूरा, फिर अपने कुर्ते की बांह ऊपर किया। फिर उन्हें अपनी सुगठित भुजाएं दिखाईं। यह देखकर अंग्रेज डर गए। वह चुपचाप बैठ गए और अगले स्टेशन पर वह दूसरे डिब्बे में बैठ गए। तब विवेकानंद ने कहा कि कभी अत्याचार को सहन नहीं करना चाहिए।

No comments:
Post a Comment