बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
यूनान के सबसे बड़े दार्शनिकों में सुकरात का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। उनका जन्म 470 ईस्वी पूर्व एथेंस में हुआ था। उन्हें लोगों को राजसत्ता के खिलाफ भड़काने के आरोप में मौत की सजा सुनाई गई थी। उन दिनों जब किसी को मौत की सजा दी जाती थी, तो उसे जहर का प्याला पीने को दे दिया जाता था। सुकरात के साथ भी यही किया गया।कहते हैं कि जब सुकरात को जहर का प्याला पीने को दिया गया, इससे पहले वह अपने शिष्यों को ज्ञान की बातें बता रहे थे। एक बार की बात है। उनसे एक व्यक्ति ने पूछा कि आपका सबसे बड़ा मित्र कौन है? उन्होंने उत्तर दिया-मेरा मन। उस व्यक्ति ने दोबारा पूछा-आपका सबसे बड़ा शत्रु कौन है? सुकरात ने उत्तर दिया-मेरा मन। मित्र और शत्रु दोनों को मन मानने से वह व्यक्ति बात को समझ नहीं पाया।
उसने सुकरात से कहा कि यह कैसे हो सकता है। आपका मन ही आपका मित्र भी है और शत्रु भी। यह बात मेरी समझ में नहीं आई। इस बात को विस्तार से समझाने की कृपा करें। तब सुकरात ने मुस्कुराते हुए कहा कि मेरा मन ही मुझे अच्छे मार्ग पर चलने को प्रेरित करता है। वही जीवन में सही राह दिखाता है। तब वह मेरा मित्र होता है। जब यही मन मुझे सही राह से भटकाकर कुमार्ग पर ले जाता है, तब वह मेरा सबसे बड़ा शत्रु होता है।
उस व्यक्ति ने पूछा तो सबसे ज्यादा प्रभावी कौन सा मन होता है, मित्र वाला या शत्रु वाला। सुकरात ने हंसते हुए कहा कि यह तो मुझ पर निर्भर करता है कि मैं अपने ऊपर किस मन को हावी होने देता हूं। अगर मुझे अच्छे राह पर चलना है, तो मुझे मित्र वाले मन को ही अपने ऊपर हावी होने देना है। नहीं तो शत्रु मन विनाश करने के लिए बैठा ही है।

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