Saturday, January 10, 2026

पैदल चलने वालों के लिए खतरा बनते जा रहे आवारा कुत्ते


अशोक मिश्र

इन दिनों कुत्तों के मामले को लेकर सुप्रीमकोर्ट में सुनवाई चल रही है। सड़कों पर लगातार बढ़ते कुत्ते और उनके काटने की बढ़ती घटनाएं सचमुच चिंताजनक है। दो-तीन महीने पहले जब सुप्रीमकोर्ट ने सड़कों पर घूमते लावारिस कुत्तों को शेल्टर होम भेजने और उनका बधियाकरण करने के निर्देश दिए थे, तो देश भर के लोगों ने इसकी आलोचना की थी। पशु प्रेमियों ने जगह-जगह प्रदर्शन भी किया था। सच कहा जाए, तो यह समस्या केवल दिल्ली एनसीआर की ही नहीं है। यह पूरे देश की समस्या है। हरियाणा भी इस समस्या से अछूता नहीं है। सरकारी आंकड़ा बताता है कि वर्ष 2024 में हरियाणा में ही 37 लाख लोग डॉग बाइट यानी कुत्तों के काटने के शिकार बने थे। इनमें से 54 लोगों की मौत भी हो गई थी। 

पिछले साल दिसंबर 2025 के अंतिम सप्ताह में ताबड़ू में 72 घंटे में आवारा और पागल कुत्तों ने 58 लोगों को अपना शिकार बनाया था। वैसे सैनी सरकार कई बार सड़कों को आवारा कुत्तों और लावारिस पशुओं से मुक्त कराने की घोषणा कर चुकी है। लेकिन अभी तक सरकारी घोषणाओं पर पूरी तरह अमल नहीं किया जा सका है। सड़कों के हालात इतने बुरे हो चुके हैं कि लोगों का चलना मुश्किल हो रहा है। चार-पांच साल के बच्चों का अकेले सड़कों पर निकलना खतरे से खाली नहीं है। देश में कुछ ऐसी भी घटनाएं सामने आई हैं जिसमें चार-पांच साल के बच्चे को कुत्तों का एक झुंड घेर लेता है। 

चारों तरफ से हुए हमले को देखकर बच्चा भागने की कोशिश करता है, लेकिन वह नाकाम रहता है। कुत्ते उसे नोचते-घसीटते रहते हैं। जब तक लोग उसे बचाने के लिए पहुंचते, बच्चा दम तोड़ चुका होता है। हरियाणा में ही कई जिलों में कुत्ते झुंड बनाकर रहते हैं और आने जाने वालों पर हमला कर देते हैं। रात में तो लोगों का पैदल चलना काफी जोखिम भरा होता है। कब और कहां से आकर कुत्ता या कुत्तों का झुंड आक्रमण कर दे, कोई पता नहीं होता है। 

पिछले कुछ वर्षों से कुत्तों में आक्रामकता बढ़ती जा रही है। वह अकारण लोगों पर हमला कर रहे हैं। इसका एक कारण तो यह भी है कि कुत्तों की बढ़ती संख्या के चलते उन्हें भोजन मिलने में काफी दिक्कत हो रही है। लोगों ने भी कुत्तों को बचा खुचा खाना देना बंद कर दिया है। इसकी वजह से भूखे रहने पर कुत्ते आक्रामक हो रहे हैं। कुत्तों के काटने पर लोग जब सरकारी अस्पतालों में रैबीज का टीका लगवाने पहुंचते हैं, तो उन्हें दूसरे किस्म की परेशानी झेलनी पड़ती है। 

पता लगता है कि अस्पताल में रैबीज का टीका ही अनुपलब्ध है। ऐसी स्थिति में उसके पास निजी अस्पतालों में जाने के अलावा कोई दूसरा चारा भी नहीं रहता है। निजी अस्पताल भी उन्हें महंगे दामों पर टीका उपलब्ध कराते हैं। सरकार को चाहिए कि वह कुत्तों को पकड़ने और उनका बन्ध्याकरण की ओर विशेष ध्यान दे।

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