बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
महात्मा बुद्ध हमेशा अपने शिष्यों को कर्म की शिक्षा दिया करते थे। वह कहा करते थे कि कर्म ही सब कुछ है। जिसका कर्म मानव समाज के लिए लाभदायक होगा, उसी का जीवन सुखी रहेगा। वह शिक्षा देने के लिए सामान्य जीवन से ही प्रसंग लिया करते थे। एक बार की बात है।
किसी गांव के बुजुर्ग की मौत हो गई। उसका पुत्र अपने पिता को अत्यंत प्यार करता था। उसने होश संभालने के बाद से ही अपने पिता का हर तरह से ख्याल रखा था। पिता की मौत से पुत्र अत्यंत व्यथित था। वह सोचा करता था कि उसके पिता की आत्मा स्वर्ग गई होगी या नरक। एक दिन उसने सुना कि उसके नगर में महात्मा बुद्ध आए हैं। वह महात्मा बुद्ध के पास जाकर बोला, भंते! क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि मेरे पिता की आत्मा स्वर्ग जाए। यदि कोई उपाय हो तो बताएं।
महात्मा बुद्ध ने कुछ देर उस युवक की बात पर विचार किया। फिर बोले, ऐसा करो, कल तुम एक घड़े में पत्थर और दूसरे घड़े में घी लेकर नदी में जाना और दोनों घड़ों को फोड़ देना। जो परिमाण निकले, उसका आकर मुझे बताना। यह सुनकर वह व्यक्ति चला गया और उसने महात्मा बुद्ध ने जो कहा था, वैसा ही किया। यह सब कुछ करने के बाद वह महात्मा बुद्ध के पास पहुंचा।
महात्मा बुद्ध को उसने बताया कि जब मैंने पत्थर वाला घड़ा फोड़ा, तो सारे पत्थर नदी में बैठ गए। लेकिन घी का घड़ा फोड़ने पर सारा घी बह गया। महात्मा बुद्ध ने कहा कि क्या ऐसा हो सकता है कि पत्थर बहने लगे और घी नदी के नीचे बैठ जाए। उस आदमी ने कहा कि ऐसा कैसे हो सकता है। तब महात्मा बुद्ध ने कहा कि जिसने जैसा कर्म किया है, उसको उसी के हिसाब से स्वर्ग या नरक में भेजा जाएगा। इसके अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं है।
No comments:
Post a Comment