अशोक मिश्र
मध्यम और निम्न आय वर्ग के लोगों को सबसे ज्यादा परेशानी तब होती है, जब उनके यहां कोई बीमार पड़ जाता है। बीमारी गरीबों और मध्यम आय वर्ग के लोगों को सबसे ज्यादा परेशान करती है। इससे उनकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह गड़बड़ा जाती है। बीमारी के समय किसी तरह की लापरवाही भी नहीं की जा सकता है। यदि आदमी के पास कोई बचत नहीं होती है, तो वह दूसरों से कर्ज लेकर भी अपना या परिजनों का इलाज कराता है।
लोगों की इन्हीं दिक्कतों को समझते हुए केंद्र सरकार ने आयुष्मान योजना की शुरुआत की थी। हरियाणा सरकार ने उस योजना को आयुष्मान चिरायु योजना का नाम देकर गरीबों को इलाज कराने की सुविधा प्रदान की है। आयुष्मान चिरायु योजना राज्य के सभी लाभार्थी परिवारों को पांच लाख तक का मुफ्त स्वास्थ्य बीमा कवर देती है, जिसमें परिवार की आय सीमा बढ़ाकर तीन लाख रुपये तक कर दी गई है। तीन लाख से छह लाख रुपये तक आय वाले परिवारों के लिए नाममात्र के प्रीमियम पर कवरेज उपलब्ध है, जो कैशलेस और पेपरलेस इलाज की सुविधा देती है। लेकिन पिछले कुछ दिनों से यह देखने में आ रहा था कि आयुष्मान चिरायु योजना से जुड़े निजी अस्पताल इलाज के मामले में काफी गड़बड़ियां कर रहे हैं।
आखिरकार जांच के बाद राज्य सरकार को 45 निजी अस्पतालों को आयुष्मान योजना के पैनल से निकालने का निर्णय लेना पड़ा। राज्य में इस योजना के तहत गरीबों का इलाज करने के लिए 1304 निजी अस्पतालों को संबद्ध किया गया था। इसमें से 641 सरकारी अस्पताल हैं। बाकी 663 अस्पताल निजी हैं। पैनल से हटाए गए निजी अस्पतालों के बारे में इलाज कराने वाले मरीजों की कई शिकायतें आई थीं। इन शिकायतों की जांच के बाद सही पाए जाने पर सरकार को इन्हें पैनल से बाहर निकालने का फैसला लेना पड़ा।
सबसे ज्यादा परेशानी उन मरीजों को झेलनी पड़ी जो योजना में शामिल होने के बाद भी निजी अस्पतालों को पैसे देने पर मजबूर किए गए। ऐसे अस्पतालों ने मरीज से तो पैसे वसूले ही, उधर सरकार के सामने भी बिल पेश करके पैसे वसूले। निजी अस्पतालों की यह कार्रवाई सरासर गलत थी। कुछ महीने पहले हरियाणा आयुष्मान भारत प्राधिकरण ने छह अस्पतालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की थी। पैनल से बाहर निकाले गए अस्पतालों में से कुछ के पास जरूरी संसाधन तक नहीं थे। जरूरी सुविधाएं न होते हुए कुछ अस्पताल अपने को पैनल में शामिल कराने में सफल हो गए थे।
जब इन अस्पतालों की जांच हुई, तो सारी सच्चाई सामने आ गई। कुछ अस्पताल तो योजना के दिशा निर्देशों का पालन ही नहीं कर रहे थे। आखिरकार इन अस्पतालों को पैनल से बाहर का रास्ता दिखाना पड़ा। वहीं कुछ अस्पतालों ने इलाज का बिल तो पेश कर दिया,लेकिन सबूत नहीं दिखा पाए।

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