बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
लोग कहते हैं कि सिकंदर महान था। गंभीरता से सोचें, विश्व इतिहास का सबसे अभागा इंसान था सिकंदर। वह एक प्यास के पीछे आजीवन भटकता रहा। प्यास थी धन-दौलत की, प्यास थी विश्व विजेता कहलाने की। प्यास थी बहते हुए रक्त देखने की, प्यास थी पूरी पृथ्वी को अपने पैरों तले रौंदने की। कहते हैं कि इतना वैभवशाली, विश्व विजेता और दुनिया के कई देशों को लूटकर धन संपत्ति जोड़ने वाला सिकंदर अपनी मौत को चौबीस घंटे भी टाल नहीं सका।जब वह मर रहा था, तो उसके वैद्य ने उसके सेवकों से कहा था कि केवल चौबीस घंटे उसे किसी तरह जिंदा रखो, मैं 24 घंटे में उसके पास पहुंच जाऊंगा और उसे हर हालत में बचा लूंगा। लेकिन वह सारे प्रयास करने के बाद भी वैद्य के पहुंचने से पहले ही मर गया। एक बार की बात है। जब वह विश्व विजय के बाद अपने राज्य में प्रवेश कर रहा था, तो राज्य की जनता सड़क के दोनों ओर कतारबद्ध होकर उसे देखने के लिए खड़े हो गए।
वह जिसकी ओर देख लेता, वह अपने को धन्य मानने लगता था। संयोग से उसी समय संतों का एक दल उधर से गुजरा जिसने सिकंदर की ओर ध्यान ही नहीं दिया। सिकंदर क्रोधित हो उठा। उसने सैनिकों को संतों को पकड़कर दरबार में पेश करने का हुक्म दिया। दरबार में पेश हुए संतों के चेहरे पर निडरता थी। सिकंदर गरजा -तुम नहीं जानते थे कि विश्व विजेता सिंकदर तुम्हारे सामने से गुजर रहा है।
एक संत ने कहा कि तुम एक अमिट प्यास के गुलाम हो। इस गुलामी में तुमने पूरी दुनिया रक्तरंजित कर दी। उस प्यास को हमने गुलाम बना रखा है। फिर हम गुलाम के गुलाम के आगे क्यों झुकें। यह सुनकर सिकंदर का सिर झुक गया। उसने संतों को रिहा कर दिया।

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