अशोक मिश्रपहली कक्षा में छह साल की आयु में ही प्रवेश देने के मामले में काफी सख्त हो गई है। जिन बच्चों की आयु छह साल से कम है, उन बच्चों को प्री-प्राइमरी में समायोजित करने का निर्देश सरकार जारी कर चुकी है। पिछले कुछ दशक से निजी स्कूलों ने डेढ़ या दो साल में ही बच्चों को प्रवेश देना शुरू कर दिया था। डेढ़ साल या दो साल के बच्चों को वह प्री नर्सरी या नर्सरी में एडमिशन दे देते थे। इससे इन स्कूलों को फायदा यह होता था कि उन्हें एडमिशन फीस के नाम पर एक मोटी रकम मिल जाती थी।
हर महीने की फीस मिलती थी, वह अलग से। इतनी कम उम्र में बच्चे सीखने के नाम पर कुछ अक्षर या गिनतियां ही सीख पाते थे। माता-पिता भी निश्चिंत हो जाते थे कि उनका बच्चा स्कूल में कुछ न कुछ सीख रहा है। लेकिन इसके दुष्परिणाम के बारे में वह कुछ सोचते ही नहीं थे। कुछ निजी स्कूलों में तो यह सब कुछ आज भी जारी है, लेकिन केंद्र सरकार की नई शिक्षा नीति ने सरकारी स्कूलों के लिए तय कर दिया है कि पहली कक्षा में प्रवेश के समय बच्चा छह साल की उम्र से कम नहीं होना चाहिए।
कम उम्र में ही बच्चों को स्कूल भेजने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि बच्चों के मस्तिष्क का विकास बाधित हो जाता है। वह मानसिक रूप से कमजोर हो जाते हैं। यही नहीं, वह शारीरिक रूप से कमजोर भी हो जाते हैं। सच कहा जाए, तो पांच-छह साल तक की उम्र बस खेलने कूदने और खाने-पीने की होती है। इतनी उम्र तक आते-आते बच्चों का मस्तिष्क आयु के हिसाब से परिपक्व हो चुुका होता है। वह सीखने के लायक बन जाते हैं। ऐसी स्थिति में जब कोई बच्चा सीखना शुरू करता है, तो वह कम उम्र में ही पढ़ाई शुरू कर देने वाले बच्चों की अपेक्षा जल्दी सीखता है। उसके सीखने की क्षमता काफी तेज होती है।
उसका मानसिक विकास भी जरूरत के मुताबिक हो चुका होता है। कुछ ही दिन पहले फरीदाबाद में ही एक पिता ने अपनी चार साल की बेटी को पचास तक गिनती न लिख पाने की वजह से पीट-पीटकर मार डाला था। चार साल की बच्ची को मानसिक दबाव देने ही गलत था। अगर वह बच्ची पचास तक गिनती नहीं लिख पाई थी, तो भी यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं थी। इस उम्र के बच्चों में सीखने की क्षमता बहुत कम होती है। लेकिन उसके पिता की अधीरता ने उसकी जान ले ली।
दरअसल, शिक्षा का मतलब यही है कि भीतर की निहित शक्तियों को विकसित करना। अब कोई जरूरी तो नहीं है कि हर बच्चे की शक्तियां दो-तीन साल की उम्र से ही विकसित हो जाएं। इसके लिए जरूरी है कि बच्चों को अपने शरीर और मस्तिष्क को विकसित होने का अवसर प्रदान किया जाए। राज्य सरकार ने तय किया है कियदि किसी निजी स्कूल ने भी इस मामले में नियमों का उल्लंघन किया, तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

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