Thursday, January 22, 2026

खुद घायल थे, लेकिन घायलों की सेवा की


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

आज पूरी दुनिया परमाणु बमों के ढेर पर बैठी है। 9 अगस्त 1945 को हिरोशिमा और नागासाकी में जो परमाणु बम गिराया गया था। उससे सैकड़ों गुना ज्यादा खतरनाक परमाणु बम दुनिया में बनाए जा चुके हैं। जापान के दोनों शहरों में हजारों लोग बम गिराए जाने के तुरंत बाद अपनी जान गंवा बैठे थे। कई लाख लोग रेडिएशन के शिकार हुए और काल के गाल में समा गए। 

कहते हैं कि इन दोनों शहरों में उस दिन सड़कों पर लोग तड़प रहे थे, अपनी जान गंवा रहे थे, लेकिन लोगों को बचाने के लिए आदमी ही नहीं थे। सब पीड़ित थे। कौन किसकी मदद करता। ऐसी स्थिति में भी एक पीड़ित ताकाशि नागाई आगे आए। वह खुद भी घायल थे। उनकी पत्नी का 9 अगस्त 1945 को ही निधन हुआ था। नागाई के शरीर में रेडिएशन फैल चुका था, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। 

वह नाकासाकी मेडिकल कालेज के रेडियोलाजिस्ट थे। उन्होंने लोगों का उपचार करना शुरू किया। वह लोगों से मिलते और उन्हें ढांढस बंधाते। इलाज के दौरान वह घायलों को साहस दिलाते और कहते थे कि सब ठीक हो जाएगा। घायल और अनाथ बच्चों की सेवा करने में उन्हें विशेष सुख मिलता था। हालांकि वह खुद बहुत पीड़ा में थे। उन्होंने हर उस आदमी के लिए कुछ न कुछ करने का प्रयास किया, जो दुखी था, पीड़ा में था। वह खुद एक झोपड़ी में रहते थे। 

अपना जो कुछ भी था, वह घायलों और रोगियों पर खर्च कर दिया था। उन्होंने परमाणु युद्ध की भयावहता को लेकर कई किताबें लिखीं। परमाणु युद्ध से होने वाले नुकसान के बारे में अपनी पुस्तकों में काफी विस्तार से बताया। रेडिएशन के चलते वह बहुत ज्यादा दिन जी नहीं सके। सन 1951 में उनका निधन हो गया।

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