अशोक मिश्रग्रेप नियमों का पालन न करने का नतीजा है कि दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण कम होने का नाम नहीं ले रहा है। जमीनी स्तर पर नियमों को लागू करा पाने में जिला प्रशासन नाकाम रहे, इसी का परिणाम है कि हरियाणा के कई जिलों में वायु गुणवत्ता सूचकांक सामान्य स्तर पर नहीं पहुंच पाया है। यदि हालात पर काबू नहीं पाया गया, तो लोगों की परेशानियां और भी बढ़ती जाएंगी।
ग्रेप नियमों के मुताबिक, हवा चलने पर सड़कों से धूल नहीं उड़नी चाहिए। इससे बचने के लिए सड़कों पर पानी का छिड़काव बहुत जरूरी है, लेकिन हालत यह है कि जरा सी हवा चलने पर ही धूल उड़ रही है। लोगों ने भवन निर्माण कार्य भी अभी तक बंद नहीं किया है, जबकि पिछले दो महीने से किसी न किसी स्तर का ग्रेप पूरे राज्य में लागू रहा है। यहां तक कि सरकारी विभागों के कर्मचारी भी खुलेआम निर्माण कार्य कर रहे हैं। इन्हें कोई रोकने वाला नहीं है।
इतना ही नहीं, बालू, मौरंग और सीमेंट आदि भी सड़कों पर ही रखी जा रही है जिसकी वजह से आते-जाते वाहनों की वजह से बालू, मौरंग और सीमेंट के अंश हवा में मिल रहे हैं। इससे भी लोगों को काफी परेशानी हो रही है। यदि कोई जागरूक नागरिक शिकायत भी करना चाहता है, तो संबंधित विभागों के अधिकारी फोन ही नहीं उठाते हैं जिसकी वजह से लोग हतोत्साहित हो जाते हैं और अगली बार वह शिकायत करने के बारे में सोचने से भी कतराने लगते हैं। सड़कों और खुली जगहों पर कूड़ा फेंकने की प्रवृत्ति लोगों में बदस्तूर जारी है।
कूड़ा-कचरा आज भी जलाया जा रहा है। यही कारण है कि बच्चों, बुजुर्गों को कई तरह की बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है। सांस के रोगी दिनोंदिन बढ़ते जा रहे हैं। हृदयरोग, हार्ट अटैक और त्वचा रोग भी लोगों में फैल रहा है। राज्य में प्रदूषण के चलते आंखों में जलन जैसी समस्याओं को लेकर काफी संख्या में मरीज अस्पताल पहुंचे। आंखों में जलन, पलकों और उसके आसपास सूजन जैसी समस्याएं प्रदूषण की ही देन हैं। लोगों को गले में खराश जैसी समस्याओं से भी जूझना पड़ रहा है। गनीमत यह है कि इस बार किसानों ने पराली जलाने में रुचि नहीं ली। हरियाणा में सरकार की सख्ती, अधिकारियों की सजगता और किसानों की जागरूकता की वजह से पराली जलाने की घटनाएं बहुत कम हुईं।
जिन किसानों ने पराली जलाई उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई भी की गई। नतीजा यह हुआ कि पराली से होने वाला प्रदूषण का प्रतिशत लगभग शून्य रहा, लेकिन दूसरे मामलों में नागरिकों और स्थानीय निकायों के अधिकारियों-कर्मचारियों ने जागरूकता नहीं दिखाई। वाहन भी प्रदूषण का कारण बन रहे हैं। राज्य की सड़कों पर डीजल चालित वाहन भारी संख्या में चल रहे हैं। इनको रोकने का भी प्रयास नहीं किया जा रहा है।

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