Tuesday, January 13, 2026

आप महाराज होकर क्यों भटकते हैं?

 

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

आज पूरा देश स्वामी विवेकानंद की जयंती को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मना रहा है। राजनीतिक पार्टियां भी स्वामी विवेकानंद की जयंती को अपने-अपने स्तर पर मना रही हैं। स्वामी विवेकानंद सनातन धर्म के  सबसे बड़े प्रवक्ता के रूप में जाने जाते हैं। गुलाम भारत में पैदा हुए स्वामी विवेकानंद ने साफ तौर पर कहा था कि जब तक देश के युवाओं में आत्मबल नहीं होगा, वह गुलाम ही रहेंगे। 

शरीर भी बलशाली, निरोगी होना चाहिए ताकि दुश्मनों से लड़ सकें। उठो, जागो और तब तक न रुको, जब तक तुम्हें लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए। यह अमर संदेश आज भी पूरे भारत में गूंज रहा है। एक बार की बात है। स्वामी विवेकानंद विभिन्न राज्यों में घूमते हुए अलवर पहुंचे। अलवर में एक दिन स्वामी विवेकानंद प्रवचन दे रहे थे, तो अलवर के दीवान रामचंद्र ने उनका प्रवचन सुना और बड़े प्रभावित हुए। 

उन्होंने सोचा कि स्वामी जी को महाराज मंगल सिंह से मिलवाया जाए। स्वामी जी से मिलने के बाद महाराज मंगल सिंह भी काफी प्रभावित हुए। उन्होंने स्वामी जी का बड़ा आदर सत्कार किया। एक दिन महाराज बोले, स्वामी जी! आप इतने ज्ञानी हैं, आपकी प्रतिभा भी काफी प्रखर है। आप एक ही जगह रहकर क्यों नहीं प्रवचन देते हैं? यह सुनकर विवेकानंद बोले, आप यह बताइए कि आप अपना काम धाम छोड़कर अंग्रेजों के साथ शिकार पर क्यों निकल जाते हैं? 

आपका काम तो प्रजा का कल्याण करना है। दरबार में सन्नाटा छा गया। महाराज ने कहा कि शिकार खेलना मुझे अच्छा लगता है। तब स्वामी जी ने कहा कि मेरे और आपके भटकने में अंतर है। आप निजी खुशी के लिए भटकते हैं, मैं लोगों के कल्याण के लिए भटकता हूं। मैं भारत में प्रेम और समानता फैलाना चाहता हूं। यह सुनकर महाराज की आंखें खुल गईं।

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