Tuesday, January 27, 2026

सतलुज यमुना लिंक नहर को लेकर होने वाली बैठक से फिर जगी आस


अशोक मिश्र

पिछले लगभग पांच दशकों से सतलुज यमुना लिंक नहर का मुद्दा पंजाब और हरियाणा के बीच घड़ी के पेंडुलम की तरह लटका हुआ है। दोनों राज्य अपनी अपनी जिद पर अड़े हुए हैं। इस मामले में हरियाणा का पक्ष मजबूत और न्यायोचित दिखाई देता है। पंजाब से उसे उसके हिस्से का पानी मिलना चाहिए। पिछले 46 वर्षों से पंजाब हरियाणा के हिस्से का पानी दबाए हुए बैठा है और हरियाणा के हक जताने पर वह ऊलजुलूल तर्क देकर मामले को लटका देता है। 

सतलुज यमुना लिंक नहर नहीं बनने से अब तक लगभग बीस हजार करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। यह कोई छोटी-मोटी रकम नहीं है। इतना ही नहीं, नहर नहीं बनने का सबसे ज्यादा असर दक्षिण हरियाणा की कृषि जमीनों का बंजर होने के रूप में दिखाई दे रहा है। यदि समय पर सतलुज यमुना लिंक नहर बन गई होती, तो प्रदेश की दस लाख एकड़ कृषि भूमि बंजर होने से बच जाती और इस इलाके में अनाज का उत्पादन भी बढ़ जाता। एक अनुमान के मुताबिक, हर साल सिंचाई पानी नहीं मिलने से 42  लाख टन खाद्यान्न का नुकसान हरियाणा को उठाना पड़ रहा है। इन सबके बावजूद एक नई आशा फिर जगी है सतलुज यमुना लिंक नहर को लेकर। 

आगामी 27 जनवरी को हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के नेतृत्व में दोनों राज्यों के अधिकारियों की एक बैठक होने जा रही है। मुख्यमंत्री सैनी ने बैठक की तैयारियों को लेकर अधिकारियों के साथ बैठक भी की है और सबको अपने तथ्यों को दुरुस्त रखने को कहा है। मंगलवार की सुबह चंडीगढ़ के हरियाणा हाउस में होने वाली बैठक में तकनीकी पहलुओं के साथ-साथ जल की उपलब्धता, कानूनी स्थिति और संभावित आपसी सहमति को लेकर बातचीत हो सकती है। वैसे यह मामला सुप्रीमकोर्ट में विचाराधीन है। 

पहले भी एसवाईएल के मामले में सुप्रीमकोर्ट पंजाब को कड़ी फटकार लगा चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब से कहा कि वह मनमानी कर रहा है। नहर बनाने का आदेश पारित होने के बाद अधिगृहीत जमीन को गैर-अधिसूचित कर देना, कहां तक जायज है। इतना सब कुछ होने के बावजूद पंजाब हरियाणा को किसी भी हालत में पानी देने को तैयार नहीं है, जो कि हरियाणा का अधिकार है। मंगलवार को होने वाली बैठक में केंद्र सरकार का कोई प्रतिनिधि मौजूद रहेगा या नहीं, इस बारे में कोई सूचना नहीं है। वर्ष 1981 में दोनों राज्यों के बीच नदी जल बंटवारे को लेकर समझौता हुआ था। 

इसके लिए सतलुज यमुना लिंक नहर बनाने का फैसला लिया गया था। हरियाणा ने अपने हिस्से की 92 किमी लंबी नहर भी बना ली थी, लेकिन पंजाब ने 122 किमी नहर निर्माण के मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया। तब से यह मुद्दा दोनों राज्यों के बीच झूल रहा है।


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