Tuesday, January 13, 2026

सिकंदर महान नहीं, इच्छाओं का सबसे अभागा दास था


अशोक मिश्र

हमारे यहां अक्सर बातचीत के दौरान कहा जाता है कि हरि अनंत, हरि कथा अनंता। हरि यानी भगवान विष्णु के अनंत रूप हैं और उनकी कथाएं भी अनंत हैं। ठीक इसी तरह इच्छाएं अनंत हैं। इन इच्छाओं की कहीं कोई सीमा नहीं है। हमने बचपन में मध्य प्रदेश की एक लोककथा पढ़ी थी। 

एक बड़े साहित्यकार ने भी इसी संदर्भ में एक निबंध भी लिखा है। ठीक ऐसी ही कहानी रूसी साहित्य में भी पढ़ने को मिलती है। कहानी कुछ यों है कि एक मछुआरा नदीं में मछलियां पकड़ने गया। उसके जाल में एक सुनहरी मछली फंसी। मछली ने उससे छोड़ने की विनती की, तो मछुआरे को भी दया आ गई। अगले दिन मछुआरा मछली के लिए आटे की गोलियां बनाकर ले आया। धीरे-धीरे मछली और मछुआरे के बीच दोस्ती हो गई। यह बात मछुआरे की पत्नी को पता चली तो उसने मछली से कुछ मांगने को कहा। मछुआरे ने जो मांगा, वह पूरा हो गया। 

धीरे-धीरे मछुआरे की पत्नी ने महल, धन-दौलत, नौकर-चाकर सब मांग लिया, तो एक दिन इच्छा प्रकट की कि चांद और सूरज उसके इशारे पर काम करें। मछुआरे ने अपनी पत्नी की इच्छा जब मछली के सामने जताई, तो उसने मछुआरे को पहले जैसा कर दिया और फिर दोबारा मछुआरे के बुलाने पर नहीं आई। यह लोककथा कई समाज में थोड़े-बहुत अंतर के साथ प्रचलित है। इसका यही निहितार्थ है कि प्रत्येक समाज मनुष्य की अनंत इच्छाओं के बारे में जानता था और उसके दुष्परिणाम भी जानता था। 

दरअसल, मानव स्वभाव यही है। जब उसकी एक इच्छा पूरी हो जाती है, तो तत्काल दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है। इच्छाएं तभी पीछा छोड़ती हैं,जब इंसान के प्राण पखेरू उड़ जाते हैं। इच्छाएं इतनी प्रबल होती हैं कि इंसान कई बार इनका गुलाम बनकर रह जाता है। उसकी अपनी स्वतंत्र सत्ता या पहचान नहीं रह जाती है। इतिहास में सिकंदर को ही देख लीजिए। लोग उसे सिकंदर महान कहते हैं, लेकिन अगर देखा जाए, तो उससे ज्यादा अभागा कौन होगा, जो इतनी सुख-सुविधाएं और धन-दौलत होने के बावजूद उसका सुख नहीं उठा पाया। वह और..थोड़ा और की रट लगाता हुआ, तत्कालीन ज्ञात दुनिया का पंद्रह प्रतिशत हिस्सा ही जीत पाया। 

कहां उसने मकदूनिया से निकलते समय पूरी दुनिया को जीतने की इच्छा मन में पाली थी। उसके पास जितनी दौलत थी, उस पूरी दौलत का उपयोग करके भी अपनी मौत को चौबीस घंटे भी टाल नहीं पाया। दरअसल, सच यही है कि जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं पर विजय प्राप्त कर लेता है, सच्चे अर्थों में स्वतंत्र वही है। बाकी सब इच्छाओं के दास हैं। 

मजे की बात यह है कि इंसान को यह दासत्व बहुत पसंद भी आता है। जीवन भर इसी दासत्व की मृगतृष्णा में भटकता रहता है और सिकंदर की तरह खाली हाथ इस दुनिया से विदा हो जाता है। यह स्थिति लगभग सबकी होती है। एक घर बन गया, तो दो घर बनाने की जुगत में इंसान लग जाता है। करोड़ रुपये हैं, तो सौ करोड़ कैसे बने, इसकी फिराक में वह जीवन खपा देता है, लेकिन इन रुपयों का सुख नहीं उठा पाता है।

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