बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
चीन में एक महान दार्शनिक हुए हैं कन्फ्यूशियस। कन्फ्यूशियस का जन्म काल लगभग वही माना जाता है जो भारत में महात्मा बुद्ध का है। कन्फ्यूशियस के एक शिष्य थे चांग हो। चांग हो भी काफी विद्वान थे और उन्होंने भी लोगों की भलाई के लिए काफी काम किया था।चांग हो को उनके गुरु कन्फ्यूशियस बहुत प्यार करते थे। एक बार की बात है। चांग हो एक लंबी यात्रा पर निकले। उन दिनों इस तरह की यात्राओं का उद्देश्य ज्ञानार्जन के साथ-साथ लोगों को उपदेश देना भी हुआ करता था। यात्रा करते हुए चांग हो एक ऐसे गांव में पहुंचे, जहां एक बुजुर्ग व्यक्ति दोपहर में सूखे हुए पेड़ों को पानी दे रहा था। वह कुएं से घड़े में पानी भरकर लाता और सूखे पेड़ों की जड़ों में डाल देता।
उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी। वह प्रसन्न था। चांग हो को लगा कि इस बुजुर्ग की सहायता करनी चाहिए। उन्होंने लोगों की मदद से सूखे पेड़ों तक पानी पहुंचाने के लिए नालियां बनवा दी। कुएं से पानी निकालने के लिए एक उपकरण लगवा दिया। यह सब करने के बाद चांग हो अपनी आगे की यात्रा के लिए निकल गए। चार साल बाद जब वह अपनी यात्रा पूरी करके लौट रहे थे, तो उन्होंने देखा कि उस गांव के सभी पेड़ सूख चुके हैं। नालियां टूट गई हैं। वह उस बुजुर्ग को खोजते हुए उसके घर पहुंचे तो देखा कि वह बुजुर्ग खाट पर लेटा हुआ है और बीमार है।
चांग हो ने जब बुजुर्ग का हालचाल पूछा, तो उसकी पत्नी ने कहा कि इनकी यह दशा आपकी ही वजह से हुई है। पहले यह श्रम करते थे और स्वस्थ रहते थे। आपकी वजह से इनका श्रम करना छूट गया, तो यह बीमार रहने लगे। चांग हो समझ गए कि स्वस्थ रहने के लिए श्रम करना बहुत जरूरी है। श्रम का कोई विकल्प नहीं है।

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