Tuesday, January 20, 2026

शिष्य नहीं समझ पाए धर्म का सार

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

धर्म का सार यही है कि संकट में फंसे इंसानों और जीव-जंतुओं की मदद की जाए, उनकी रक्षा की जाए। पूजा-पाठ, धर्म की तमाम क्रियाएं व्यक्ति के मन की शुद्धि के लिए ही होती हैं। यदि मन शुद्ध हो गया, तो वह व्यक्ति प्राणीमात्र के प्रति दयालु और संवेदनशील हो जाता है। अगर हम दिनभर पूजा-पाठ करने के बाद भी लोगों के प्रति सहिष्णु नहीं हैं, तो ऐसी पूजा बेकार है। 

एक बार की बात है। किसी राज्य में एक गुरु जी रहते थे। उनके आश्रम में कई शिष्य थे। वह सभी शिष्यों को धर्मशास्त्रों, व्याकरणों और धर्म-कर्म की शिक्षा दिया करते थे। सभी शिष्यों को गुरुजी के पास शिक्षा ग्रहण करते हुए कई साल बीत गए थे। उनकी शिक्षा भी पूरी हो चुकी थी। जिस दिन सभी शिष्यों की शिक्षा पूरी होने वाली थी, उस दिन गुरुजी अपने सभी शिष्यों को साथ लेकर नदी में स्नान करने गए।

 स्नान के बाद नदी के किनारे बैठकर गुरु जी और उनके शिष्य पूजा पाठ करने लगे। तभी वहां एक बच्चे की चीख पुकार गूंजी। वह नदी में डूब रहा था। वह लोगों से मदद की गुहार लगा रहा था। तभी पूजा कर रहा एक शिष्य उठा और वह बिना कुछ सोचे-समझे नदी में कूद गया। उस बच्चे को बचाकर तट पर ले आया। यह सब कुछ गुरुजी बैठे देख रहे थे। उन्होंने अपने शिष्यों से कहा कि नदी में डूबता हुआ एक बच्चा बचाने की गुहार लगा रहा था। 

आप लोगों ने उसकी पुकार नहीं सुनी, लेकिन तुम्हारे ही साथी ने उसे बचा लिया है। एक शिष्य ने कहा कि पूजा अधूरी छोड़कर साथी ने अधर्म किया है। यह सुनकर गुरुजी बोले, उसने अधर्म नहीं किया है। शिक्षा का असली मतलब समझा है। संकट में फंसे मनुष्य को बचाना ही सच्चा धर्म है। तुम लोगों ने धर्म का सार नहीं समझा है।

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