Tuesday, April 1, 2025

धुल गया श्वेतकेतु का अहंकार

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अहंकार कभी कभी व्यक्ति को चैन से बैठने नहीं देता है। व्यक्ति बैराए पशु के समान इधर-उधर भटकता रहता है, लेकिन अहंकार उसका सुख-चैन सब कुछ छीन लेता है। यही अहंकार कभी श्वेतकेतु को हुआ था। श्वेतकेतु के बारे में एक बात बता दें कि उन्होंने विवाह नाम की संस्था को मजबूत करने में बहुत बड़ी भूमिका अदा की थी। 

पतिव्रता और पत्नीव्रता होने की परंपरा की शुरुआत श्वेतकेतु ने ही की थी, ऐसा माना जाता है। कहते हैं कि उनके पिता आरुणि ने उन्हें समय पर अध्ययन के लिए गुरुकुल भेजा। जिस गुरुकुल में वे पढ़ने के लिए भेजे गए थे, वे अपने समय के सबसे विद्वान और विचारवान गुरु थे। चौबीस साल बाद जब श्वेतकेतु जब गुरुकुल से लौटा, तो उसके पिता ने पाया कि उसकी चाल में मस्ती कम, अहंकार ज्यादा है।

आरुणि ने पूछा कि गुरुकुल से तुम क्या सीखकर आए हो। श्वेतकेतु ने कहा कि सब कुछ। कुछ भी नहीं छोड़ा। वेद, पुराण, उपनिषद, विज्ञान, तर्क और भी सारा कुछ सीख कर आया हूं। 

उसके पिता ने कहा कि तुम उस एक को जानकर आए हो जिसको जानने के बाद सारा ज्ञान-विज्ञान अपने आप ही मालूम हो जाता है। अब वह चकराया कि यह एक क्या है जिससे जानने के बाद कुछ भी जानने की जरूरत नहीं पड़ती है।

उसने अपने पिता से पूछा कि वह एक क्या है? उसके पिता ने कहा कि स्वयं को जाने बिना तुम्हारा सारा ज्ञान अधूरा है। तुम गुरुकुल जाओ और फिर से पढ़कर आओ। गुरुकुल में उसके गुरु ने चार सौ गाएं देकर कहा कि जब एक हजार एक गायें हो जाएं, तब आना मैं तुम्हें ज्ञान दूंगा। 

वन में रहते उसे कई साल बीत गए। अब श्वेतकेतु एक निर्मल बालक की तरह हो गया था। उसका सारा अहंकार धुल गया था। तब उसे गुरु ने कहा कि अब तुम स्वयं को जान चुके हो।



आप मुझे अपना बेटा मान लीजिए

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

भारत में नारी को पूजनीय माना गया है। कहा भी गया है कि यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमंते तत्र देवता। कहने का मतलब यह है कि जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। नारी की महत्ता प्रदर्शित करने के लिए ही साल में दो बार नवरात्र मनाए जाते हैं और कन्याओं का पूजन किया जाता है। यह भारतीय संस्कृति है। यहां हर पराई स्त्री को मां, बहन और बेटी समझने की शिक्षा दी जाती है। 

इस बात को स्वामी विवेकानंद के जीवन से जुड़े एक प्रसंग से अच्छी तरह समझा जा सकता है। एक बार की बात है। स्वामी विवेकानंद की बातों और व्यवहार से एक विदेशी महिला बहुत प्रभावित हुई। उसने कई बार स्वामी जी से मिलने का प्रयास किया। लेकिन वह सफल नहीं हो पाई। 

एक दिन वह उस जगह पहुंच गई जहां स्वामी विवेकानंद प्रवचन दे रहे थे। जब प्रवचन खत्म हो गया, तो वह स्वामी विवेकानंद से मिली। उसने स्वामी जी से कहा कि वह उनसे बहुत प्रभावित है। वह उनसे शादी करना चाहती है। स्वामी जी ने कहा कि यह संभव नहीं है। मैं संन्यास ले चुका हूं। मैं शादी नहीं कर सकता हूं। महिला उदास हो गई। स्वामी जी ने उस महिला से पूछा कि आप मुझसे शादी क्यों करना चाहती हैं। 

उस महिला ने स्वामी जी से कहा कि वह उनके व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित है। वह उनसे शादी इसलिए करना चाहती है ताकि उसके स्वामी जी की ही तरह बेटा पैदा हो। यह सुनकर स्वामी विवेकानंद ने कहा कि वह शादी तो नहीं कर सकते हैं, लेकिन उसकी यह इच्छा जरूर पूरी कर सकते हैं। 

उन्होंने महिला से कहा कि आप मुझे अपना बेटा मान लीजिए। मैं आपको मां समान मान लेता हूं। यह सुनकर वह विदेशी महिला बहुत प्रसन्न हुई। वह उनके सद्गुणों से अत्यंत प्रभावित हुई।




Monday, March 31, 2025

रक्त और पानी अमूल्य, बहाना उचित नहीं

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

तथागत का जन्म 563 ईसा पूर्व शाक्य कुल के राजा शुद्धोधन के घर में हुआ था। इनकी मां का नाम महामाया था जिनकी मृत्यु बुद्ध के जन्म के सात दिन बाद हो गई थी। बचपन में इनका नाम सिद्धार्थ रखा गया था। 29 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपने नवजात पुत्र राहुल और पत्नी यशोधरा को त्यागकर लोगों को जरा, मरण और दुखों को दूर करने का मार्ग तलाशने के लिए घर से निकल गए थे। 

कई साल की तपस्या के बाद महात्मा बुद्ध को बिहार के बोध गया नामक स्थान पर उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ था। इसके बाद महात्मा बुद्ध जीवन भर भ्रमण करते रहे। कहा जाता है कि वह भ्रमण करते हुए एक गांव में पहुंचे जहां लोग नदी के पानी के बंटवारे को लेकर आपस में लड़ने जा रहे थे। किस्सा यह है कि उस गांव के बाहर एक नदी बहती थी। नदी के दोनों ओर गांव बसे थे। 

दोनों गांवों के लोग पीने और खेतों की सिंचाई के लिए इसी नदी के पानी का उपयोग करते थे। यह क्रम कई वर्षों से चला आ रहा था। दोनों गांवों के लोग आपस में मिलजुलकर रहते थे। एक साल ऐसा हुआ कि खूब गर्मी पड़ी। नतीजा यह हुआ कि नदी का पानी बहुत कम हो गया। दोनों गांवों की जरूरतें इतने पानी में पूरी नहीं हो पा रही थीं। तब एक गांव के लोगों ने सोचा कि नदी से नहर निकालकर पानी का उपयोग किया जाए। 

इस बात की खबर जब दूसरे गांव के लोगों को मिली तो उन्होंने इसका विरोध किया। मरने-मारने को उतारू हो गए। तभी उस गांव में महात्मा बुद्ध पहुंच गए। उन्होंने मामले को समझते हुए गांववालों से पूछा कि अच्छा, पानी की क्या कीमत होगी? लोगों ने कहा कि पानी तो अमूल्य है। प्रकृति प्रदत्त है। तब बुद्ध ने पूछा कि रक्त का क्या मूल्य होगा? गांववालों ने जवाब दिया कि रक्त भी अमूल्य है। 

बुद्ध के इन सवालों को सुनकर गांववाले समझ गए कि वे पानी के लिए रक्त न बहाने को कह रहे हैं। उन्होंने इसके बाद लड़ना छोड़ दिया। वह आपस में समन्वय बनाकर पानी का उपयोग करने लगे।





Sunday, March 30, 2025

वैद्य को भारी पड़ गया लालच करना

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

लालच से किसी का भला नहीं होता है। लालची व्यक्ति सदैव इसी उधेड़बुन में लगा रहता है कि कैसे किसी को ठगा जाए, बेवकूफ बनाकर उसकी चीज को हड़प लिया जाए। हमारे प्राचीन ग्रंथों में भी लालच को बुरी बला बताया गया है, लेकिन कुछ लोग अपने स्वभाव को बदल नहीं पाते हैं जिसकी वजह से उन्हें जीवन में कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। 

लालच को लेकर एक पुरानी कथा है। कहते हैं कि किसी गांव में एक वैद्य रहता था। वह लालची बहुत था। उसका स्वभाव भी अच्छा नहीं था। इस वजह से बहुत मजबूरी में ही लोग उसके पास इलाज कराने आते थे। उसके पास जो भी इलाज कराने आता, वह उसको थोड़ी बहुत राहत दिलाकर रोग का पूरी तरह उपचार नहीं करता था ताकि लोग दोबारा उसके पास आने को मजबूर हो जाएं। 

इसका नतीजा यह हुआ कि लोगों ने उसके पास आना ही छोड़ दिया। एक समय ऐसा भी आया, जब काफी दिनों तक उसके पास कोई मरीज नहीं आया। वह परेशान हो गया। एक दिन वह एक बाग से होकर गुजर रहा था तो उसने देखा कि एक पुराने वृक्ष के तने के कोटर (तने का खोखला हिस्सा) में एक सांप बैठा हुआ है। 

उसने सोचा कि यदि किसी को यह सांप काट ले, तो वह आदमी उसके पास इलाज के लिए जरूर आएगा। बाग में एक लड़का खेल रहा था। उसने लड़के से कहा कि इस कोटर में एक सुंदर गौरेया है। तुम इसे निकाल सकते हो। लड़का बोला कि मैं जरूर सुंदर गौरेया को पकडूंगा और पालूंगा। 

बच्चे ने कोटर में हाथ डालकर बाहर निकाला तो वह सांप को हाथ में देखकर डर गया। उसने सांप को फेंका तो वह सांप वैद्य के गले में लिपट गया। सांप ने वैद्य को काट भी लिया, लेकिन वह जहरीला नहीं था। वैद्य के चिल्लाने पर कुछ लोगों ने आकर उसका इलाज किया और उसे पानी पिलाया। उस दिन के बाद वैद्य का व्यवहार बदल गया।



Saturday, March 29, 2025

 हमास के खिलाफ सड़कों पर उतरी युद्ध से थकी हारी फिलिस्तानी जनता

अशोक मिश्र
गाजा में तीन जगहों पर मंगलवार को हमास के खिलाफ प्रदर्शन हुए। हजारों लोगों ने प्रदर्शन में भाग लिया। इस प्रदर्शन में भाग लेने वालों के चेहरे पर गुस्सा था, दुख था, युद्ध के दौरान अपनों के मारे जाने का दर्द साफ बयां हो रहा था। आंखें अपने परिजनों को खोज रही थीं। गाजा में पिछले लगभग डेढ़ साल से चल रहे युद्ध से लोग अब थक चुके हैं। उनमें अब इतना भी साहस नहीं बचा है कि वह और अपने किसी को खोने का दुख बर्दाश्त कर सकें। यही वजह है कि मंगलवाल यानी 25 मार्च को उनके सब्र का बांध टूट पड़ा और वे सड़कों पर उतर आए। अब उन्हें हमास आतंकवादी संगठन लगने लगा है। 7 अक्टूबर 2023 को जब हमास ने इजरायल पर हमला किया था, तब यही वह लोग थे जिन्होंने हमास के हमले का खुलकर विरोध नहीं किया था। यदि उन्होंने तब यह साहस दिखाया होता, तो शायद यह नौबत नहीं आती।
पिछले डेढ़ साल में गाजा में अरबों डॉलर की संपत्ति नष्ट हो चुकी है। संकट इतना गहरा गया है कि पूरे इलाके में न तो ढंग का कोई अस्पताल बचा है, न खाने को अन्न मिल रहा है, न पीने को पानी। ऊपर से सिर पर पता नहीं कब मिसाइल आकर दग जाने का खतरा मंडराया करता है। वैसे इजरायल को भी कम नुकसान नहीं हुआ है। लेकिन उसे अमेरिका सहित यूरोपीय देशों की हर तरह से मदद मिल रही है। आर्थिक मदद के साथ हथियार और खाद्यान्न उपलब्ध हो रहा है। गाजा में जो सहायता संयुक्त राष्ट्र की ओर से भेजी जा रही है, वह भी कई बार बाधित हो जाती है जिसकी वजह से गाजा में भुखमरी जैसे हालात हैं। दवाएं, खाद्यान्न और रहने के लिए टेंट आदि की सुविधाएं लोगों को हासिल नहीं हैं। अब तक हुए युद्ध 46 हजार से ज्यादा फिलिस्तीन मारे जा चुके है। एक अनुमान के मुताबिक 96 हजार से अधिक लोग घायल हुए हैं। बीस लाख लोगों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ा है। कई लाख लोग पड़ोसी देशों में शरण लिए हुए हैं जहां उनकी जिंदगी नरक से भी बदतर है।
सात अक्टूबर 2023 को हमास ने जब इजरायल के खिलाफ युद्ध शुरू किया था, तब फतह मूवमेंट से जुड़े लोगों ने इसका विरोध किया था, लेकिन हमास ने उनके विरोध पर कोई ध्यान नहीं दिया था। तब फिलिस्तीनी जनता ने भी मूवमेंट के साथ खड़ा होना उचित नहीं समझा था। लेकिन जैसे-जैसे गाजा के हालात बेकाबू होते गए, फतह मूवमेंट की बात लोगों की समझ में आने लगी। 25 मार्च को फतह मूवमेंट द्वारा आयोजित ‘हमास आउट’ विरोध प्रदर्शन में भाग लिया, उससे यह उम्मीद अब पैदा होने लगी है कि अपने ही नागरिकों के बढ़ते विरोध को देखकर शायद हमास मजबूर स्थायी युद्ध विराम करने को मजबूर हो जाए। युद्ध किसी भी समस्या का स्थायी हल नहीं होत है, यह बात अब फिलिस्तीनी जनता समझ चुकी है। तभी तो 25 मार्च को उत्तरी गजा के बेत लोहिया में हुए प्रदर्शन में शामिल लोग कह रहे थे कि हम युद्ध से तंग आ चुके हैं।
इन दिनों फिलिस्तीन कहे जाने वाले क्षेत्र में सत्ता के दो केंद्र हैं। सन 2006 में जब फिलिस्तीन में संसदीय चुनाव हुए थे, तब हमास को प्रचंड बहुमत हासिल हुआ था। हमास ने कभी फिलिस्तीनियों का दुनिया में प्रतिनिधित्व करने वाले फिलिस्तीनी एथारिटी (पीए) के वफादारों को या तो चुप बैठने पर मजबूर कर दिया था या फिर गजा क्षेत्र से बाहर कर दिया था। कहा जा रहा है कि पिछले मंगलवार को बेत लोहिया में जो हजारों लोग जमा हुए थे, इसके पीछे फतह मूवमेंट चलाने वाली फिलिस्तीनी एथारिटी का हाथ था। फतह मूवमेंट के पीछे इसी पीए का हाथ है। इसी ने सोशल मीडिया पर ‘हमास आउट’ का मैसेज देकर लोगों को इकट्ठा किया था। वहीं दूसरी ओर ज्यादातर लोग मानते है ं कि यह स्वत:स्फूर्त विरोध प्रदर्शन था। इसके कर्ताधर्ताओं में वे युवा हैं जो अभी किसी राजनीतिक गुट नहीं जुड़े हैं। यह फिलहाल हमास को हटाकर अपने देश को युद्ध में बरबाद होने से रोकना चाहते हैं।भविष्य में गजा में वे कैसा शासन चाहते हैं, इसकी कोई रूपरेखा तय नहीं है।

खंभे से चौपड़ हार गए महादेव गोविंद रानाडे

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

ब्रिटिश शासनकाल में भारतीय न्यायधीशों में सबसे ज्यादा न्यायप्रिय महादेव गोविंद रानाडे को माना जाता है। अंग्रेजों ने उन्हें राय बहादुर के खिताब से नवाजा था। वह बाम्बे उच्च न्यायालय के न्यायाधीश होने के साथ-साथ लेखक और समाज सुधारक भी थे। उनका जन्म 18 जनवरी 1842 को महाराष्ट्र के नासिक जिले में हुआ था। 

महाराष्ट्र के चितपावन ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए महादेव गोविंद रानाडे ने अपनी प्राथमिक शिक्षा कोल्हापुर के एक मराठी स्कूल में हासिल की थी। उसके बाद वह अंग्रेजी स्कूल में पढ़ने के लिए भेजे गए थे। 1864 में उन्होंने इतिहास से एमए पास किया था और 1866 में एलएलबी की डिग्री हासिल की थी। उनके बचपन का एक किस्सा बहुत मशहूर है। 

कहते हैं कि तब गोविंद रानाडे की उम्र आठ साल थी। उन्हें चौपड़ खेलने का बहुत शौक था। एक दिन जब उन्हें खेलने के लिए दूसरा कोई साथी नहीं मिला, तो वह बरामदे में बने खंभे (पिलर) को अपना दूसरा साथी मानते हुए दायें हाथ से उसका पासा फेंकने लगे और बाएं हाथ से अपना पासा फेंकते थे। खेल शुरू हुआ। इस बीच एक बच्चे को अकेला चौपड़ खेलते देखकर लोग दूर खड़े होकर तमाशा देखने लगे। 

रानाडे ने दायें हाथ से खंभे का पासा फेंका। उसके बाद अपने बायें हाथ से अपने हिस्से का। खेल काफी रोचक हो गया था, लेकिन कुछ देर बाद वह उस खेल में हार गए। दूर खड़े एक व्यक्ति ने उनसे कहा कि तुम तो खंभे से हार गए। उन्होंने कहा कि हां, बायें हाथ से पासा फेंकने में दिक्कत होती थी। 

तब लोगों ने कहा कि तुमने अपना पासा दायें हाथ से क्यों नहीं फेंका। रानाडे ने जवाब दिया कि तब मैं बेइमान कहा जाता। यह सुनकर लोग आश्चर्यचकित रह गए कि इतना छोटा होने के बावजूद न्याय की बात करता है।



Friday, March 28, 2025

संकट में एक आदमी को दूसरे के काम आना चाहिए

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जॉर्ज वाशिंगटन अमेरिका के पहले राष्ट्रपति थे। उनका जन्म 22 फरवरी 1732 को वर्जीनिया में हुआ था। वह आस्टाइन और मैरी बॉल वाशिंगटन के छह में से पहले बच्चे थे। पिता की मृत्यु के बाद 11 वर्षीय जॉर्ज वाशिंगटन का पालन-पोषण उनके सौतेले भाई लॉरेंस ने किया। लॉरेंस एक भला और अपने सौतेले भाई वाशिंगटन को प्यार करने वाला व्यक्ति था। 

उसने उनका लालन-पालन बहुत अच्छे तरीके से किया। एक बार की बात है। वर्जीनिया के जंगलों की पैमाइश चल रही थी। पैमाइश करने वाली टीम में जॉर्ज वाशिंगटन भी थे। वर्जीनिया के जंगल में जब यह टीम पैमाइश कर रही थी तो उन्होंने एक महिला के बहुत जोर-जोर से चीखने की आवाज सुनी। सारे लोग भागकर उस महिला की ओर गए। उत्सुकतावश उस स्थान पर वाशिंगटन भी पहुंचे। 

उन्होंने देखा कि कुछ लोग एक महिला को पकड़कर नदी से दूर कर रहे हैं और वह महिला ‘बचाओ, बचाओ’ चिल्ला रही है। पहले तो वाशिंगटन की समझ में मामला नहीं आया। फिर उन्होंने एक आदमी से पूछा कि क्या मामला है? उस आदमी ने बताया कि इस महिला का बेटा नदी में गिर गया है। हालांकि बच्चा अभी जिंदा है और बाहर आने का प्रयास कर रहा है। 

यह महिला भी नदी में कूदकर अपने बच्चे को बचाने की जिद कर रही है। यह सुनते ही वाशिंगटन उस स्थान पर पहुंचे जहां बच्चा निकलने का प्रयास कर रहा था। वह अपने कपड़े उतारे बिना नदी में कूद पड़े और काफी मशक्कत के बाद उस बच्चे को बचाकर नदी के किनारे लाने में सफल हो गए। 

यह देखकर सर्वे कर रही टीम के एक आदमी ने कहा कि जब तुम तैरना नहीं जानते थे, तो नदी में क्यों कूद गए। वाशिंगटन ने जवाब दिया कि एक आदमी को संकट में दूसरे के काम आना चाहिए।



Thursday, March 27, 2025

‘पीस आफ माइंड’ पुस्तक ने दिलाई ख्याति

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अमेरिका के ओहियो प्रांत में सन 1907 में पैदा हुए जोशुआ लोथ लिबमैन को बेस्ट सेलर पुस्तक ‘पीस आफ माइंड’ के लिए जाना जाता है। सन 1946 में लिबमैन की यह पुस्तक न्यूयार्क टाइम्स की नान फिक्शन बुक श्रेणी में एक साल से अधिक समय तक सेलिंग के मामले में नंबर वन रही। लिबमैन ने 19 साल की उम्र में ही सिनसिनाटी विश्वविद्यालय से स्नातक कर लिया था। वह एक सुधारवादी रब्बी यानी यहूदी धर्म के आध्यात्मिक शिक्षक भी थे। लिबमैन की पुस्तक ‘पीस आफ माइंड’लिखे जाने के संदर्भ में एक प्रसंग बहुत चर्चित है। 

कहते हैं कि जब उन्होंने स्नातक की डिग्री हासिल की तो यह सोचने लगे कि उन्हें सुख से जीवन गुजारने के लिए क्या-क्या चाहिए। उन्होंने कई दिनों की मेहनत करके एक सूची बनाई जिसमें धन, संपत्ति, यश, उत्तम स्वास्थ्य, शक्ति आदि को शामिल किया। इसके बाद वे अपनी सूची के मुताबिक अपने लक्ष्य की प्राप्ति में जुट गए। कुछ साल बाद उनकी समझ में आया कि इन सब को हासिल करने में तो पूरा जीवन बीत जाएगा। वह इनका सुख कब उठाएंगे? 

इससे परेशान लिबमैन एक दिन अपनी सूची को लेकर एक बुजुर्ग के पास पहुंचे और अपनी समस्या बताई। सूची को देखकर बुजुर्ग मुस्कुराए और बोले, तुमने यह जो सूची बनाई है, वह बहुत अच्छी है। लेकिन इसमें तीन शब्द वाले एक चीज की कमी है। उस बुजुर्ग ने पेन्सिल उठाई और सूची में सबसे नीचे लिखा-मन की शांति। बुजुर्ग ने कहा कि जब तक मन में शांति नहीं होगी, तब तक इन उपलब्धियों का आनंद नहीं मिलेगा।

बस फिर क्या था? उन्होंने अथक परिश्रम करके ‘पीस आफ माइंड’ पुस्तक लिखा जो दुनिया भर में खूब बिकी। लेकिन हार्ट अटैक से 9 जून 1948 को 41 साल की उम्र में लिबमैन की मृत्यु हो गई।



Wednesday, March 26, 2025

सोए हुए राजा के खिलाफ पुनर्विचार की मांग

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

वैसे तो यूरोप और मध्य एशिया में फिलिप नाम के कई राजा हुए हैं।  फ्रांस के राजा फिलिप चतुर्थ, स्पेन के राजा फिलिप द्वितीय और मेटाकोमेट के राजा फिलिप आदि प्रमुख हैं। मकदूनिया के राजा और सिकंदर के पिता फिलिप द्वितीय भी काफी प्रसिद्ध राजा हुए हैं। 

जब भी बिना किसी संदर्भ के बात किसी फिलिप राजा की चलती है, तो यह तय करना बहुत मुश्किल हो जाता है। यह कथा शायद सिकंदर के पिता और मकदूनिया के राजा फिलिप की है। कहा जाता है कि फिलिप अपने दरबार में बैठे एक मुकदमे की सुनवाई कर रहे थे। इसी दौरान उन्हें झपकी आ गई। एक पक्ष अपनी बात रख रहा था। उस समय पक्षकार ने अपने समर्थन में क्या तर्क दिया, यह वह सुन नहीं पाए। 

जब वह जागे, तो दूसरे पक्ष को अपनी बात रखने की बारी आ गई। दूसरे पक्ष ने बहुत जोरदार ढंग से अपनी बात राजा फिलिप के समक्ष रखी। उसकी बात सुनकर राजा फिलिप बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने दूसरे पक्ष के पक्ष में फैसला सुना दिया और पहले पक्ष को सजा सुना दी। यह सुनकर पहले पक्ष के व्यक्ति ने राजा से कहा कि महाराज! मैं आपके सामने पुनर्विचार की मांग करता हूं। 

राजा ने कहा कि तुम्हें मेरे फैसले पर विश्वास नहीं है। तब उस व्यक्ति ने कहा कि महाराज! मैं सोए हुए राजा के खिलाफ जागे हुए राजा के समक्ष पुनर्विचार की मांग रख रहा हूं। यह सुनकर लोग दंग रह गए। लोगों ने सोचा कि राजा फिलिप उसे कड़ी सजा देंगे, लेकिन राजा ने उसकी बात स्वीकार कर ली। 

उस व्यक्ति ने अपना पक्ष रखा, तो वह समझ गए कि दूसरा पक्ष दोषी है। उन्होंने पहले पक्ष को बरी करते हुए दूसरे पक्ष को सजा सुनाई। राजा फिलिप ने पुनर्विचार की मांग करने वाले व्यक्ति की खूब प्रशंसा की जिसने गलत फैसला देने से उन्हें बचा लिया था।



Tuesday, March 25, 2025

करतार सिंह सराभा थे भगत सिंह के आदर्श

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

शहीद भगत सिंह का जन्म पश्चिमी पंजाब के बंगा गांव में 27 सितंबर 1907 में हुआ था। कुछ लोग भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर को हुआ मानते हैं। पश्चिमी पंजाब अब पाकिस्तान में है। उनके पिता सरदार किशन सिंह एक किसान थे। भगत सिंह गदर पार्टी के संस्थापक करतार सिंह सराभा को अपना आदर्श मानते थे। 

अमृतसर के जलियांवाला बाग में 13 अप्रैल 1919 को अंग्रेजी हुकूमत ने बैसाखी के दिन हजारों निर्दोष लोगों की गोलियों से भूनकर हत्या कर दी थी, तब बारह वर्षीय भगत सिंह बहुत व्यथित हुए थे। हत्याकांड की खबर सुनकर भगत सिंह इतने बेचैन हुए कि अगले दिन वह स्कूल जाने की जगह लाहौर रेलवे स्टेशन पहुंचे और वहां से पहली रेलगाड़ी से अमृतसर आए। 

अमृतसर में वह बारह मील पैदल चलकर जलियांवाला बाग पहुंचे थे। कहते हैं कि उस समय उनके हाथ में एक बोतल थी जिसमें वह निर्दोष भारतीयों का खून भरकर ले जाना चाहते थे। लेकिन बालक भगत सिंह को यह नहीं मालूम था कि खून सूख चुका है। उन्होंने वहां की मिट्टी को बोतल में भरी और अपने साथ लेकर गए। इस घटना का उन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। 

वह क्रांतिकारी साहित्य पढ़ने की ओर प्रवृत्त हुए। चौरी-चौरा कांड के बाद जब महात्मा गांधी ने किसानों का साथ देने से इनकार करते हुए असहयोग आंदोलन वापस ले लिया, तो उनका कांग्रेस और महात्मा गांधी से मोह भंग हो गया। उन्होंने देश के क्रांतिकारियों का मार्ग अपनाया। 

सन 1928 में साइमन कमीशन के विरोध के दौरान लाला लाजपत राय की मौत ने उन्हें इतना उद्वेलित कर दिया कि उन्होंने एएसपी सांडर्स को मारकर लाला जी की मौत का बदला ले लिया। अंतत: 23 मार्च 1931 को भगत सिंह देश की खातिर शहीद हो गए।