Monday, July 6, 2026

छत्तीसगढ़ में शुरू किया सत्याग्रह

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

पंडित सुंदरलाल शर्मा को बड़े प्रेम से छत्तीसगढ़ का गांधी कहा जाता है। इनका जन्म 21 दिसंबर 1881 को रायपुर जिले के राजिम के पास चामशुर गांव में हुआ था। वह एक अग्रणी स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने साहित्य में भी अंग्रेजों के खिलाफ रचनाएं लिखीं। उन्होंने सामाजिक न्याय, समानता और अहिंसा का समर्थन किया। उन्होंने स्वदेशी वस्तुओं को बढ़ावा देने के लिए मित्र मंडल की स्थापना की। 

सन 1918 में  धमतारी में राजनीतिक परिषद की स्थापना और 1919 में एक जिला सम्मेलन के आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कहा जाता है कि 1921 में महात्मा गांधी को छत्तीसगढ़ लाने में उनकी अहम भूमिका रही। उन्होंने सन 1929 में कंदेल नामक स्थान में नहर सत्याग्रह की शुरुआत की। इसका नतीजा यह हुआ कि छत्तीसगढ़ में राजनीतिक जागरूकता पैदा हुई। 

सुंदरलाल शर्मा महात्मा गांधी से बहुत ज्यादा प्रभावित थे। शर्मा ने जीवन भर दलितों के उत्थान के लिए कार्य किया। हरिजन और अनाथों के लिए आश्रम और स्कूल स्थापित किए। कई भाषाओं के पारखी विद्वान सुंदर लाल शर्मा को बचपन से ही कविता का शौक था। बीस वर्ष की आयु तक वे राजिम क्षेत्र के एक प्रमुख बुद्धिजीवी के रूप में पहचाने जाने लगे थे। 

सामाजिक अन्याय के प्रति उनकी सहानुभूति ने उन्हें सक्रिय राजनीति में ला खड़ा किया, जहां उन्होंने गांधीजी, मदन मोहन मालवीय और लाला लाजपत राय जैसे नेताओं के साथ मिलकर काम किया। छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी भूमिका के लिए गिरफ्तार होने वाले वे पहले व्यक्ति थे। वे जीवन भर समाज सुधारक बने रहे और जातिवाद, अस्पृश्यता और शोषण के खिलाफ लड़ते रहे। 1940 में उनका निधन हो गया।

अब हरियाणा के नहरी पानी में राजस्थान भी होगा हिस्सेदार


अशोक मिश्र

हरियाणा को सदियों से हरियाली प्रदेश कहा जाता रहा है। लेकिन आज हरियाणा की जड़ें प्यास से दरक रही हैं। भाखड़ा-नांगल और पश्चिमी यमुना नहर के भरोसे खड़ा हरियाणा अब पानी के तीन मोर्चों पर एक साथ लड़ रहा है-अपने लिए घटती उपलब्धता, पड़ोसियों से हक की जंग और जमीन के नीचे सूखता जल भंडार। इसके बावजूद केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में नई दिल्ली में हरियाणा और राजस्थान सरकार के बीच यमुना जल परियोजना को लेकर समझौते पर हस्ताक्षर हुए हैं। 

यमुना जल परियोजना के अंतर्गत राजस्थान के हिस्से का 577 एमसीएम (मिलियन क्यूबिक मीटर) यमुना जल हथिनीकुंड बैराज से लगभग 295.5 किमी लंबी भूमिगत पाइपलाइन प्रणाली से चूरू जिले के हंसियावास जलाशय तक पहुंचाया जाएगा। इस परियोजना की अनुमानित लागत 34,102 करोड़ रुपये है। अब जब राजस्थान के साथ समझौता हो गया है, तो स्वाभाविक है कि हरियाणा को 577 एमसीएम पानी देना ही पड़ेगा। जबकि हरियाणा की स्वयं हालत यह है कि नहरों में टेल तक पानी नहीं पहुंचता तो किसान समर्सिबल की गहराई बढ़ाता है और हर फीट नीचे जाता जलस्तर आने वाली नस्लों के हिस्से का पानी चुरा रहा है। 

केंद्रीय भूजल बोर्ड की मानें तो हरियाणा के 141 ब्लॉक में से 88 ओवर-एक्सप्लॉइटेड हैं यानी जितना पानी जमीन उगलती है, उससे डेढ़ गुना हर साल खींच लिया जाता है। धान-गेहूं का चक्र, जो कभी हरित क्रांति का नायक था, अब विलेन बन गया है। एक किलो चावल के लिए हरियाणा चार हजार लीटर पानी खर्च करता है, जबकि पंजाब के पास नदियां हैं, हरियाणा के पास सिर्फ नहरों का हक। एसवाईएल नहर का मसला चार दशक से सुप्रीम कोर्ट की फाइलों और सियासी भाषणों में उलझा है। 

नतीजा यह है कि 214 किमी लंबी नहर का हरियाणा वाला 91 किमी हिस्सा सूखा खड़ा है। उधर यमुना पर दिल्ली का दबाव अलग है। हथिनीकुंड बैराज से तयशुदा नौ हजार क्यूसेक में से गर्मियों में आधा भी नसीब नहीं होता। दिल्ली की प्यास और ऊपरी राज्यों की खींचतान के बीच हरियाणा का हिस्सा सबसे पहले कटता है। दक्षिण हरियाणा महेंद्रगढ़, रेवाड़ी, नूंह तो वैसे ही डार्क जोन हैं। हरियाणा का 80 फीसदी पानी खेती में जाता है और खेती का 70 फीसदी धान-गेहूं में। 

हरियाणा में नहरें सूखीं तो खेत बिकेंगे, खेत बिके तो गांव उजड़ेंगे और गांव उजड़े तो शहरों में पानी के लिए मारामारी मचेगी। जब तक फसल का पैटर्न नहीं बदलेगा, बूंद-बूंद का हिसाब नहीं होगा और पड़ोसी को दुश्मन नहीं, हिस्सेदार माना जाएगा, तब तक हर बजट में नहर निकलेगी, पर खेत तक पानी नहीं पहुंचेगा। क्योंकि प्यासे को नक्शा नहीं, नल चाहिए। यह नल ही हरियाणावासियों को जीवनदान दे सकता है।

Monday, June 29, 2026

पुरानी नाक वापस आ जाए

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कई बार इंसान के पास अपना भाग्य संवारने का बेहतरीन मौका होता है, लेकिन वह अपनी मूर्खता और लालच के चलते अपना भला नहीं कर पाता है। अवसर की उपयोगिता नहीं समझ पाने की वजह से ही ऐसा होता है। अवसर बीत जाने के बाद वह पछताता है, लेकिन अब किया क्या जा सकता है। इसी वजह से कहा गया है कि इंसान को अवसर को पहचानना आना चाहिए और उसका कैसे लाभ उठाया जा सकता है, इतनी समझ होनी चाहिए। 

एक कथा है। किसी गरीब व्यक्ति ने देवता की खूब आराधना की। देवता प्रसन्न हो गए। उन्होंने उस व्यक्ति को एक पासा देते हुए कहा कि तुम इस पासे से तीन वरदान मांग सकते हो। वह व्यक्ति बहुत प्रसन्न हुआ। वह पासा को लेकर अपने घर गया। उसने सारी बात अपनी पत्नी को बताई। यह सुनकर पत्नी बहुत खुश हुई। उसने अपने पति से कहा कि हम लोग काफी गरीब हैं। इसलिए हमें इस पासे से खूब धन दौलत मांगनी चाहिए ताकि हमारी गरीबी दूर हो सके। 

पति ने कहा, नहीं। हमारी नाक चपटी है। इसकी वजह से लोग हमारा मजाक उड़ाते हैं। हमें इस पासे से सुंदर नाक मांगनी चाहिए। इतना कहकर उसने पासा फेंका और तीन बार कहा कि सुंदर नाक दे दो। तीन नाकें आकर उसके शरीर पर चिपक गई और उसकी अपनी नाक गायब हो गई। उसने दूसरी बार पासा फेंका और कहा, नाक गायब हो जाए। सारी नाक गायब हो गई। अब उसके पास एक ही अवसर बचा था। 

मजबूर होकर उसने तीसरी बार पासा फेंका और कहा कि मेरी पुरानी नाक वापस आ जाए। पुरानी नाक वापस आ गई और अब पासा बेकार हो चुका था। उस व्यक्ति ने अपनी मूर्खता से तीन बेहतरीन अवसर को खो दिया।

कांग्रेस के नए प्रदेश प्रभारी के सामने चुनौतियां ही चुनौतियां


अशोक मिश्र

हरियाणा कांग्रेस के प्रभारी रहे बीके हरिप्रसाद के कर्नाटक के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद उनकी जगह संजय दत्त को लाया गया है। कांग्रेस में इन दिनों बदलाव की बयार बह रही है। कांग्रेस हाईकमान ने 26 जून को उत्तर प्रदेश, हरियाणा और ओडीसा में नए प्रदेश प्रभारी नियुक्त किए  हैं। इसमें सबसे ज्यादा आश्चर्यजनक उत्तर प्रदेश में किया गया बदलाव माना जा रहा है। पार्टी ने अविनाश पांडेय को हटाकर राजेंद्र पाल गौतम को नया प्रभारी नियुक्त किया है। गौतम दलित समुदाय से हैं और माना जा रहा है कि वह कांग्रेस के साथ दलित समुदाय को जोड़ने में सफल हो सकते हैं। राजेंद्र पाल गौतम आम आदमी पार्टी से आए हैं। 

उत्तर प्रदेश कांग्रेस में अविनाश पांडेय को हटाने को लेकर असंतोष की लहर दिखाई दे रही है। जहां तक हरियाणा की बात है। बीके हरिप्रसाद के स्थान पर संजय दत्त की नियुक्ति से बहुत ज्यादा फर्क पड़ता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है। संजय दत्त महाराष्ट्र से हैं और कांग्रेस में वह कई पदों पर काम कर चुके हैं। संजय दत्त के सामने सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस कार्यकर्ताओं का विश्वास जीतना और उनके विश्वास को कायम रखना है ताकि वह खुले मन से काम कर सकें। 

संजय दत्त के सामने इससे भी बड़ी चुनौती हरियाणा कांग्रेस में सक्रिय गुटों को एक मंच पर लाकर उनमें समन्वय स्थापित करना है। सन 2024 में विधानसभा चुनावो के दौरान भूपेंद्र हुड्डा, कुमारी सैलजा, रणदीप सुरजेवाला तीनों अपने को सीएम पद का दावेदार बताते हुए थक नहीं रहे थे। इन तीनों गुटों के कांग्रेस में अपने-अपने विधायक हैं और अपने जिलाध्यक्ष। हरियाणा कांग्रेस की सबस बड़ी दिक्कत यही है कि जैसे ही प्रदेश कांग्रेस में अध्यक्ष या प्रभारी की नियुक्ति होती है, उस पर किसी न किसी गुट का ठप्पा लग जाता है। उसे हुड्डा, सैलजा या सुरजेवाला गुट का बताने की मुहिम शुरू हो जाती है। 

सब उसे अपने-अपने पाले में खींचने में लग जाते हैं। संजय दत्त के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह इन तीनों गुटों को एक मंच पर लाकर खड़ा कर पाते हैं या नहीं। यदि तीनों गुट एक साथ मिल जुलकर काम करें, तो सन 2029 का चुनाव जीतना मुश्किल नहीं होगा। लेकिन सबसे बड़ा मुद्दा संगठन है। अधिकतर जिलों में जिलाध्यक्ष की नियुक्ति ही नहीं हुई है। जिला, ब्लॉक, न्याय पंचायत स्तर पर संगठन है ही नहीं। ऐसी स्थिति में विधानसभा चुनाव में सफलता हासिल होगी, कहना मुश्किल है। 

वैसे तो हरियाणा के नए प्रदेश प्रभारी संजय दत्त के पास खोने को कुछ नहीं है। उन्हें सब कुछ जीरो से शुरू करना है। अगर वह प्रदेश में संगठन खड़ा करने में सफल हो गए, तो उनके सामने किसी प्रकार की शायद ही कोई चुनौती खड़ी होगी। सबसे बड़ी बात तो यह है कि वह कांग्रेस हाईकमान को निष्पक्षता से हरियाणा कांग्रेस की वर्तमान हालत बता पाते हैं या नहीं।

Sunday, June 28, 2026

सुश्रुत ने की दुनिया में पहली प्लास्टिक सर्जरी

 बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कहा जाता है कि शल्य चिकित्सा के जनक सुश्रुत  थे। सुश्रुत  का जन्म छठी शताब्दी ईसा पूर्व कन्नौज में हुआ था। इनके गुरु धन्वंतरि थे। सुश्रुत के जन्म के समय को लेकर विद्वानों में मतभेद है। कोई इन्हें ईसा पूर्व पहली शताब्दी का मानते हैं। एक बार की बात है। वह कहीं जा रहे थे तो उन्होंने देखा कि एक हिरन घायल पड़ा हुआ है। 

उन्होंने उस हिरन के घाव पर औषधियों का लेप लगाया और उसकी देखभाल की। जब हिरन ठीक हो गया, तो उसे जंगल में छोड़ दिया। तभी उनके मन में आया कि जब औषधियों से जानवरों को ठीक किया जा सकता है, तो इंसानों की बीमारियों को क्यों नहीं ठीक किया जा सकता है। 

उन्होंने अपने गुरु प्रसिद्ध चिकित्सक धन्वंतरि से इस बारे में बात की, तो धन्वंतरि ने कहा कि बेटा! चिकित्सा केवल एक काम नहीं है, यह दुखी इंसानों को आराम पहुंचाने का महान कार्य है। उसी समय से उन्होंने चिकित्सा विज्ञान में निपुणता हासिल करने के लिए शल्य क्रिया सीखने की कोशिश करनी शुरू कर दी। इसके लिए वह तरबूज, कद्दू और खीरा आदि पर चीरा लगाते और उसे सिलने की कोशिश करते। 

कई बार सिलाई अच्छी नहीं होती थी। लेकिन बार-बार प्रयास करने से वह धीरे-धीरे निपुण हो गए। काफी समय बाद एक दिन जब वह आराम कर रहे थे तो उनके दरवाजे पर एक घायल सैनिक आया। उसकी युद्ध में नाक कट गई थी। वह चिंतित था कि अब वह पहले जैसा नहीं दिखेगा। सुश्रत ने उसे धीर बंधाया। उन्होंने चेहरे की त्वचा से नई नाक बनाई और उसकी कटी नाक पर लगा दी। धीरे-धीरे सैनिक स्वस्थ हो गया। यह शायद दुनिया की पहली प्लास्टिक सर्जरी थी। इस घटना के बाद सुश्रुत अमर हो गए?

बिजली कट से लोग परेशान उद्योगों को हो रहा नुकसान

अशोक मिश्र

प्री मानसून बरसात नहीं होने की वजह से हरियाणा में गर्मी कम नहीं हो रही है। पूरे राज्य में पारा लगभग 40 के आसपास ही बना हुआ है। न्यूनतम तापमान भी 26 डिग्री के आसपास ही दर्ज किया जा रहा है। ऐसी स्थिति में गर्मी और उमस बढ़ती जा रही है। गर्मी की वजह से होने वाली बीमारियों के चलते अस्पतालों में मरीजों की भरमार है। उल्टी, दस्त, पेट दर्द और कई प्रकार के संक्रामक रोगों के शिकार मरीज अस्पताल पहुंच रहे हैं। ऐसी स्थिति बार-बार लगने वाले कट से मरीज ही नहीं, आम लोग भी काफी परेशानी झेल रहे हैं। 

अघोषित कट की वजह से जहां लोगों को परेशानी हो रही है, वहीं उद्योग-धंधों पर भी बुरा असर पड़ रहा है। हरियाणा में बिजली की मांग हर साल नई ऊंचाई छू रही है। हरियाणा पावर परचेज सेंटर (एचपीपीसी) के अनुसार 2026-27 की गर्मी में पीक डिमांड 16,454 मेगावाट तक पहुंच सकती है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण का अनुमान भी 16,337 मेगावाट है।  पिछले साल 2025 की गर्मी में अधिकतम मांग 15,300 मेगावाट थी। यानी एक साल में 1,150 मेगावाट से ज्यादा का उछाल आया है। राज्य में  जैसे जैसे बिजली खपत बढ़ रही है, वैसे-वैसे उपलब्धाता भी काफी तेजी से बढ़ रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, राज्य के पास ताप-विद्युत (थर्मल), गैस और नवीकरणीय ऊर्जा को मिलाकर 16,552 मेगावाट से ज्यादा की बिजली उपलब्ध है। 

इसका लक्ष्य 9,929 मेगावाट परंपरागत और 6,622 मेगावाट नवीकरणीय यानी हाइड्रो, सौर और पवन ऊर्जा जैसे स्रोत हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि सन 2030 तक अधिकतम मांग 19,481 मेगावाट तक पहुंच जाएगी। सरकार के मुताबिक राज्य के पास कुल मिलाकर पर्याप्त बिजली उपलब्ध है, लेकिन मई-जून जैसी भीषण गर्मियों में कुछ उच्च खपत वाले दिनों में पीक डिमांड और ऊर्जा की कमी भी देखी गई। सरकार उपलब्धता बढ़ाने की पूरी कोशिश कर रही है। इसके लिए प्रदेश सरकार ने फतेहाबाद में परमाणु ऊर्जा परियोजना और भी कई थर्मल विस्तार परियोजना पर काम शुरू कर दिया है। 

इसके बावजूद शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में बार-बार लगने वाले अघोषित बिजली कट  सारी हकीकत बयान कर देते हैं। पंद्रह जून की मियाद खत्म होने के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों ने धान की फसल बोनी शुरू कर दी है। फसल की सिंचाई के लिए पानी चाहिए। इसके लिए ट्यूबवेल चलाना पड़ेगा। बिजली न आने से सिंचाई प्रभावित हो रही है। हालांकि यह भी सही है कि प्रचंड गर्मी के चलते ट्रांसफार्मर आदि जल्दी गर्म हो जाते हैं और उनमें आग लगने की घटनाएं भी देखने को मिलती हैं। इसके बावजूद लगने वाले बिजली कट से उद्योगों को भी भारी नुकसान हो रहा है। मशीनें बंद रहने से जहां उत्पादन प्रभावित होता है, वहीं कामगार भी खाली बैठे रहते हैं।

चल हट नासपीटे!

-अशोक मिश्र
जेठ की भरी दुपहरिया में पैदल डग भरते हुए रामभूल उपाध्याय कार्यालय की ओर चले जा रहे थे। उनका पूरा शरीर स्वेदयुक्त होकर चिपचिपायमान हो रहा था। आधी दूरी तय करने के बाद उनकी हिम्मत जवाब दे गई, तो वे नीम के एक पेड़ के नीचे खड़ा होकर सुस्ताने लगे। वायुदेव की कृपा से जैसे ही स्वेद बिंदु सूखे। उन्होंने काक प्रवृत्ति अख्तियार कर ली। उन्हें नीम वृक्ष से मात्र दस कदम की दूरी पर महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की अमर काव्य कृति ‘वह तोड़ती पत्थर’ की नायिका के दर्शन हो गए। वह पत्थर तोड़ने की बजाय सड़क के किनारे बोरी बिछाकर धूप में बैठी सब्जियां बेच रही थी। श्याम वर्णी काया पर चमकती पसीने की बूंदें, पैरों की फटी बिवाइयां, अस्त व्यस्त केश, तंबाकू या गुटखा चबाने से चितकबरी हो गईं दंतावलियां मिलकर पीड़ा और करुणा का एक कोलाज रच रहे थे। रामभूल के मन में उसके प्रति सहानुभूति की विलुप्त सरस्वती अनायास बह निकली।
रामभूल सोचने लगा। अगर यह महिला सुबह-शाम महकउवा साबून से नहाए, बालों में बढ़िया क्वालिटी का शैंपू लगाए, तो इसकी काया कैसी निखर उठेगी। अगर गोरेपन की क्रीम भी सुबह, दोपहर, शाम और रात को नियमित रूप से लगाए, तो यह गोरी दिखाई देने लगेगी। विज्ञापन में तो हीरोइन क्रीम लगाने से पहले तो एकदम उल्टे तवे जैसी दिखती है। मगर क्रीम बनाने वालों का कमाल देखिए, इधर क्रीम हाथ, पैर और चेहरे पर पुता, उधर कालापन संघनित कोहरे की तरह गायब होने लगता है। पैंतीस-चालीस सेंकेड के विज्ञापन में जितनी गोरी होती हीरोइन को दिखाया जाता है, अगर उसका चालीस फीसदी यह सब्जी बेचने वाली गोरी हो जाए, तो इसके चेहरे की लुनाई और त्वचा की चिकनाई थोड़ा और निखर उठेगी। और अगर कहीं यह एलेवेरा-फेलोवेरा का जेल लगाकर सुबह-शाम मुंह धोए, कुछ तेल-फुलेल, इत्र-वित्र लगा ले, तो इसकी कंचनी काया के आकर्षण में ही ग्राहक सौ-पचास रुपये की सब्जी ज्यादा खरीद लेंगे।
रामभूल उपाध्याय आई टॉनिक लेने की गरज से सब्जी वाली के नजदीक गए और बोले, ’इधर पेड़ की छाया में क्यों नहीं लगा लेती अपनी दुकान?’ उसने उदासीन भाव से कहा, ’जिसके घर के सामने यह पेड़ है, उस घर की औरत वहां दुकान लगाने पर झगड़ा करती है।’ रामभूल ने शब्दों में शहद घोलते हुए कहा, ’तो फिर बांस-बल्ली लगाकर पन्नी-वन्नी क्यों नहीं तान लेती?’ रामभूल की बात सुनकर चेहरे पर रंचमात्र क्रोध का भाव झलका, ’पुलिस और नगर पालिका वाले बांस-बल्ली, छानी-छप्पर उजाड़ जाते हैं। सब्जियां छितरा देते हैं, नालियों में फेंक जाते है। उन्हें इकट्ठा कर धोती हूं और बेचती हूं।’
‘धूप में बैठने से देखो तुम्हारा शरीर काला पड़ गया है। कंडे की आंच में भुना हुआ भांटा लग रही हो।’ रामभूल ने उसकी श्याम वर्णी काया को निहारते हुए कहा, ‘अगर तुम अपने शरीर का ख्याल रखो। ब्यूटी पार्लर में जाकर पेडिक्योर, मेनिक्योर, आईब्रो सेटिंग करवा लो, फिर देखो, ग्राहकों की संख्या कैसे बढ़ती है।’ यह सुनकर उसने अपने अस्त व्यस्त कपड़ों को संभाला और गुर्राती हुई बोली-‘चल हट नासपीटे! तुम जैसों को रोज धनिये के साथ फ्री बेच लेती हूं। बड़ा आया सहानुभूति जाने वाला।’ यह सुनते ही रामभूल ने चुपचाप खिसक लेने में ही भलाई समझी।
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Saturday, June 27, 2026

रंगभेद के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला के ही समानरंगभेद  और मानवाधिकार के समर्थन में काम करने वाले डेसमंड एमपिलो टूटू को उनके कार्यों के लिए नोबल शांति पुरस्कार से नवाजा गया था।  वह दक्षिण अफ्रीका के एक एंग्लिकन बिशप और धर्मशास्त्री थे। टुटू का जन्म दक्षिण अफ्रीका के क्लर्कडॉर्प में एक गरीब परिवार में हुआ था, जहाँ उनकी मिश्रित खोसा और मोत्स्वाना वंश की वंशावली थी। 

वयस्क होने पर उन्होंने शिक्षक के रूप में प्रशिक्षण लिया और नोमालिजो लेआ शेनक्सेन से विवाह किया जिनसे उनके कई बच्चे हुए। 1962 में वे किंग्स कॉलेज लंदन में धर्मशास्त्र का अध्ययन करने के लिए यूनाइटेड किंगडम चले गए । 1966 में वे दक्षिणी अफ्रीका लौट आए। वह अपने पिता के काफी करीब थे, लेकिन उनके शराब पीने और अपनी पत्नी से मारपीट करने की आदत से वह अपने पिता से नाराज भी रहते थे। 

उन दिनों अफ्रीका में रंगभेद चरम पर था। गोरे लोग अश्वेतों के साथ बुरा व्यवहार करते थे। एक बार की बात है। वह बचपन में अपने पिता के साथ कहीं जा रहे थे।  तभी उन्होंने देखा कि सामने से एक श्वेत पादरी ट्रेवर हडलस्टन चले आ रहे हैं। डेसमंड ने देखा कि उनके पिता को देखते ही पादरी ने अपनी टोपी उतारी और अभिवादन किया। यह एक तरह से दक्षिण अफ्रीका में आश्चर्य की बात है। 

डेसमंड ने अपने पिता से इस बारे में पूछा, तो उन्होंने बताया कि यह व्यक्ति सभी मनुष्य को समान समझता है। रंग के आधार पर किसी से भेदभाव नहीं करता है। बस,यहीं से डेसमंड में रंगभेद की भावना के खिालाफ लड़ने की प्रेरणा मिली। उन्होंने एक लंबी लड़ाई लड़कर दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की नीति को खत्म कराया।

क्षणिक आवेश में होने वाले अपराध पर कैसे लगे अंकुश?

अशोक मिश्र

नेहा कुमारी का अपराध केवल इतना था कि उसने अपने पति अमित को ड्यूटी पर जाने को कहा था। अमित उस दिन ड्यूटी पर नहीं जाना चाहता था। बस, इसी बात पर अमित ने छह महीने की गर्भवती अपनी पत्नी की हत्या कर दी। पहले उसने चुन्नी से नेहा का गला दबाया। उसके बाद पानी से भरी बाल्टी में उसका मुंह दबाकर मार डाला। बिहार के मुजफ्फरनगर की रहने वाली नेहा एक महीने पहले अपने पति के साथ फरीदाबाद के पल्ला थाना क्षेत्र स्थित पंचशील कालोनी में रहने आई थी। 

पत्नी की हत्या का आरोपी अमित फरार है। आज नहीं तो कल अमित गिरफ्तार किया जाएगा। उस पर अपनी पत्नी और गर्भस्थ शिशु की हत्या का मुकदमा चलेगा। भले ही हत्या का आरोपी अमित और मारी गई नेहा बिहार के मूल निवासी रहे हों, लेकिन हरियाणा में भी इस तरह की हत्याएं होती रहती हैं। यह किसी एक प्रांत या जिले की कहानी नहीं है। लगभग पूरे देश में ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं। अक्सर देखा गया है कि मानसिक दबाव, अहंकार, शराब की लत और घरेलू विवाद के चलते पुरुष अपनी पत्नी की हत्या कर बैठते हैं। 

इस तरह की घटनाओं में होता यह है कि कई बार पति का इरादा पत्नी की हत्या करने का नहीं होता है, लेकिन वह उत्तेजना में आकर हत्या कर बैठता है। वह अनचाहे ऐसी जगह पर वार कर बैठता है जिससे पत्नी की मौत हो जाती है। कई बार पति अपनी पत्नी के किरदार पर शक करते हैं और इस शक में आकर हत्या जैसा कदम उठाते हैं। कई बार तो बात इससे उलट भी होती है। पत्नी को अपने पति के चरित्र पर शक होता है या उसे प्रमाण मिल जाता है, तो अपनी पत्नी से छुटकारा पाने के लिए वह हत्या जैसा कुकृत्य कर बैठता है। 

हरियाणा में घरेलू हिंसा व्यवस्थित और दोहराई जाने वाली प्रवृत्ति का हिस्सा है। शराब या दूसरे किस्म के नशे आदी लोग पत्नी के विरोध करने पर हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में मारपीट के साथ-साथ हत्या जैसी घटनाएं भी घटित हो जाती हैं। एक आंकड़े के अनुसार, प्रदेश में लगभाग 37 प्रतिशत महिलाएं अपने वैवाहिक जीवन में किसी न किसी रूप में घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं। इनमें से शायद ही कोई महिला घरेलू हिंसा रोकने के लिए कदम उठाती हो। वह इसे भाग्य का लिखा या नियति मानकर चुपचाप सहती रहती है।

 नीति आयोग की सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, घरेलू हिंसा के कारण महिलाएं आत्महत्या या अचानक हुए हमलों की प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शिकार होती हैं। हरियाणा सरकार ने पिछले पांच-छह साल में कन्या भ्रूण हत्या रोककर यह साबित कर दिया है कि कानून से बदलाव लाया जा सकता है। अब जरूरत यह है कि स्त्री के खिलाफ किसी भी प्रकार का अपराध होने पर आरोपी को सख्त से सख्त सजा दी जाए।

Friday, June 26, 2026

फुटबाल के सितारे तुलसीदास बलराम

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

तुलसीदास बलराम को भारतीय फुटबॉल को स्वर्ण युग में लाने का श्रेय दिया जाता है। बलराम का जन्म 4 अक्टूबर, 1936 को ब्रिटिश-अधिकृत हैदराबाद के सिकंदराबाद के पास अम्मुगुडा गाँव में हुआ था। उनका जन्म एक बहुत ही गरीब परिवार में हुआ था। गरीबी के बावजूद बचपन से ही उन्हें फुटबॉल खेलने का बहुत शौक था। तमाम परेशानियों के बावजूद बलराम ने लल्लागुडा वर्कशॉप ग्राउंड में फुटबॉल खेलना शुरू किया। 

उन्होंने शुरुआती दौर से ही हैदराबादी शैली के वन-टच फुटबॉल का अभ्यास किया। सिकंदराबाद लीग में सिविलियंस और आर्मी इलेवन के बीच हुए एक मैच के दौरान उन्हें पहचान मिली। उस समय उनके परिवार की हालत यह थी कि फुटबॉल मैच खेलने के लिए उनके पास जूते नहीं थे। बिना जूतों के फुटबॉल मैच खेलना लगभग असंभव था। आखिरकार बहुत सोच-समझकर वह सिकंदराबाद के ही एक जूते बनाने वाले के पास पहुंचे। 

उन्होंने जूते बनाने वाले को अपनी सारी स्थिति बताई। उससे कहा कि यदि उसे जूते नहीं मिले, तो वह टूर्नामेंट नहीं खेल पाएगा। उससे कोई पुराना जूता देने की विनती की। जूता बनाने वाले ने कहा कि उसके पास कोई पुराना जूता नहीं है। अगर वह कहीं से पुलिस का पुराना जूता ले आए, तो वह उसे पहनने लायक बना देगा। काफी प्रयास के बाद उसकी मुलाकात एक ट्रैफिक पुलिसकर्मी से हुई। 

उसकी व्यथा-कथा सुनकर पुलिसकर्मी ने अपना पुराना जूता दिया। मरम्मत करने वाले ने दो रुपये में जूता ठीक कर दिया। उस टूर्नामेंट में बलराम ने गोल पर गोल मारकर सबको हैरान कर दिया। बाद में प्रसिद्ध कोच सैयद अब्दुल के मार्गदर्शन में वह 1956 में संतोष ट्राफी और मेलबर्न ओलंपिक तक पहुंचा। बलराम ने भारत के लिए कुल 33 मैच खेले और अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में 12 गोल किए।  बलराम का निधन 16 फरवरी 2023 को 86 वर्ष की आयु में हुआ।