Friday, March 28, 2025

संकट में एक आदमी को दूसरे के काम आना चाहिए

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जॉर्ज वाशिंगटन अमेरिका के पहले राष्ट्रपति थे। उनका जन्म 22 फरवरी 1732 को वर्जीनिया में हुआ था। वह आस्टाइन और मैरी बॉल वाशिंगटन के छह में से पहले बच्चे थे। पिता की मृत्यु के बाद 11 वर्षीय जॉर्ज वाशिंगटन का पालन-पोषण उनके सौतेले भाई लॉरेंस ने किया। लॉरेंस एक भला और अपने सौतेले भाई वाशिंगटन को प्यार करने वाला व्यक्ति था। 

उसने उनका लालन-पालन बहुत अच्छे तरीके से किया। एक बार की बात है। वर्जीनिया के जंगलों की पैमाइश चल रही थी। पैमाइश करने वाली टीम में जॉर्ज वाशिंगटन भी थे। वर्जीनिया के जंगल में जब यह टीम पैमाइश कर रही थी तो उन्होंने एक महिला के बहुत जोर-जोर से चीखने की आवाज सुनी। सारे लोग भागकर उस महिला की ओर गए। उत्सुकतावश उस स्थान पर वाशिंगटन भी पहुंचे। 

उन्होंने देखा कि कुछ लोग एक महिला को पकड़कर नदी से दूर कर रहे हैं और वह महिला ‘बचाओ, बचाओ’ चिल्ला रही है। पहले तो वाशिंगटन की समझ में मामला नहीं आया। फिर उन्होंने एक आदमी से पूछा कि क्या मामला है? उस आदमी ने बताया कि इस महिला का बेटा नदी में गिर गया है। हालांकि बच्चा अभी जिंदा है और बाहर आने का प्रयास कर रहा है। 

यह महिला भी नदी में कूदकर अपने बच्चे को बचाने की जिद कर रही है। यह सुनते ही वाशिंगटन उस स्थान पर पहुंचे जहां बच्चा निकलने का प्रयास कर रहा था। वह अपने कपड़े उतारे बिना नदी में कूद पड़े और काफी मशक्कत के बाद उस बच्चे को बचाकर नदी के किनारे लाने में सफल हो गए। 

यह देखकर सर्वे कर रही टीम के एक आदमी ने कहा कि जब तुम तैरना नहीं जानते थे, तो नदी में क्यों कूद गए। वाशिंगटन ने जवाब दिया कि एक आदमी को संकट में दूसरे के काम आना चाहिए।



Thursday, March 27, 2025

‘पीस आफ माइंड’ पुस्तक ने दिलाई ख्याति

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

अमेरिका के ओहियो प्रांत में सन 1907 में पैदा हुए जोशुआ लोथ लिबमैन को बेस्ट सेलर पुस्तक ‘पीस आफ माइंड’ के लिए जाना जाता है। सन 1946 में लिबमैन की यह पुस्तक न्यूयार्क टाइम्स की नान फिक्शन बुक श्रेणी में एक साल से अधिक समय तक सेलिंग के मामले में नंबर वन रही। लिबमैन ने 19 साल की उम्र में ही सिनसिनाटी विश्वविद्यालय से स्नातक कर लिया था। वह एक सुधारवादी रब्बी यानी यहूदी धर्म के आध्यात्मिक शिक्षक भी थे। लिबमैन की पुस्तक ‘पीस आफ माइंड’लिखे जाने के संदर्भ में एक प्रसंग बहुत चर्चित है। 

कहते हैं कि जब उन्होंने स्नातक की डिग्री हासिल की तो यह सोचने लगे कि उन्हें सुख से जीवन गुजारने के लिए क्या-क्या चाहिए। उन्होंने कई दिनों की मेहनत करके एक सूची बनाई जिसमें धन, संपत्ति, यश, उत्तम स्वास्थ्य, शक्ति आदि को शामिल किया। इसके बाद वे अपनी सूची के मुताबिक अपने लक्ष्य की प्राप्ति में जुट गए। कुछ साल बाद उनकी समझ में आया कि इन सब को हासिल करने में तो पूरा जीवन बीत जाएगा। वह इनका सुख कब उठाएंगे? 

इससे परेशान लिबमैन एक दिन अपनी सूची को लेकर एक बुजुर्ग के पास पहुंचे और अपनी समस्या बताई। सूची को देखकर बुजुर्ग मुस्कुराए और बोले, तुमने यह जो सूची बनाई है, वह बहुत अच्छी है। लेकिन इसमें तीन शब्द वाले एक चीज की कमी है। उस बुजुर्ग ने पेन्सिल उठाई और सूची में सबसे नीचे लिखा-मन की शांति। बुजुर्ग ने कहा कि जब तक मन में शांति नहीं होगी, तब तक इन उपलब्धियों का आनंद नहीं मिलेगा।

बस फिर क्या था? उन्होंने अथक परिश्रम करके ‘पीस आफ माइंड’ पुस्तक लिखा जो दुनिया भर में खूब बिकी। लेकिन हार्ट अटैक से 9 जून 1948 को 41 साल की उम्र में लिबमैन की मृत्यु हो गई।



Wednesday, March 26, 2025

सोए हुए राजा के खिलाफ पुनर्विचार की मांग

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

वैसे तो यूरोप और मध्य एशिया में फिलिप नाम के कई राजा हुए हैं।  फ्रांस के राजा फिलिप चतुर्थ, स्पेन के राजा फिलिप द्वितीय और मेटाकोमेट के राजा फिलिप आदि प्रमुख हैं। मकदूनिया के राजा और सिकंदर के पिता फिलिप द्वितीय भी काफी प्रसिद्ध राजा हुए हैं। 

जब भी बिना किसी संदर्भ के बात किसी फिलिप राजा की चलती है, तो यह तय करना बहुत मुश्किल हो जाता है। यह कथा शायद सिकंदर के पिता और मकदूनिया के राजा फिलिप की है। कहा जाता है कि फिलिप अपने दरबार में बैठे एक मुकदमे की सुनवाई कर रहे थे। इसी दौरान उन्हें झपकी आ गई। एक पक्ष अपनी बात रख रहा था। उस समय पक्षकार ने अपने समर्थन में क्या तर्क दिया, यह वह सुन नहीं पाए। 

जब वह जागे, तो दूसरे पक्ष को अपनी बात रखने की बारी आ गई। दूसरे पक्ष ने बहुत जोरदार ढंग से अपनी बात राजा फिलिप के समक्ष रखी। उसकी बात सुनकर राजा फिलिप बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने दूसरे पक्ष के पक्ष में फैसला सुना दिया और पहले पक्ष को सजा सुना दी। यह सुनकर पहले पक्ष के व्यक्ति ने राजा से कहा कि महाराज! मैं आपके सामने पुनर्विचार की मांग करता हूं। 

राजा ने कहा कि तुम्हें मेरे फैसले पर विश्वास नहीं है। तब उस व्यक्ति ने कहा कि महाराज! मैं सोए हुए राजा के खिलाफ जागे हुए राजा के समक्ष पुनर्विचार की मांग रख रहा हूं। यह सुनकर लोग दंग रह गए। लोगों ने सोचा कि राजा फिलिप उसे कड़ी सजा देंगे, लेकिन राजा ने उसकी बात स्वीकार कर ली। 

उस व्यक्ति ने अपना पक्ष रखा, तो वह समझ गए कि दूसरा पक्ष दोषी है। उन्होंने पहले पक्ष को बरी करते हुए दूसरे पक्ष को सजा सुनाई। राजा फिलिप ने पुनर्विचार की मांग करने वाले व्यक्ति की खूब प्रशंसा की जिसने गलत फैसला देने से उन्हें बचा लिया था।



Tuesday, March 25, 2025

करतार सिंह सराभा थे भगत सिंह के आदर्श

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

शहीद भगत सिंह का जन्म पश्चिमी पंजाब के बंगा गांव में 27 सितंबर 1907 में हुआ था। कुछ लोग भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर को हुआ मानते हैं। पश्चिमी पंजाब अब पाकिस्तान में है। उनके पिता सरदार किशन सिंह एक किसान थे। भगत सिंह गदर पार्टी के संस्थापक करतार सिंह सराभा को अपना आदर्श मानते थे। 

अमृतसर के जलियांवाला बाग में 13 अप्रैल 1919 को अंग्रेजी हुकूमत ने बैसाखी के दिन हजारों निर्दोष लोगों की गोलियों से भूनकर हत्या कर दी थी, तब बारह वर्षीय भगत सिंह बहुत व्यथित हुए थे। हत्याकांड की खबर सुनकर भगत सिंह इतने बेचैन हुए कि अगले दिन वह स्कूल जाने की जगह लाहौर रेलवे स्टेशन पहुंचे और वहां से पहली रेलगाड़ी से अमृतसर आए। 

अमृतसर में वह बारह मील पैदल चलकर जलियांवाला बाग पहुंचे थे। कहते हैं कि उस समय उनके हाथ में एक बोतल थी जिसमें वह निर्दोष भारतीयों का खून भरकर ले जाना चाहते थे। लेकिन बालक भगत सिंह को यह नहीं मालूम था कि खून सूख चुका है। उन्होंने वहां की मिट्टी को बोतल में भरी और अपने साथ लेकर गए। इस घटना का उन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। 

वह क्रांतिकारी साहित्य पढ़ने की ओर प्रवृत्त हुए। चौरी-चौरा कांड के बाद जब महात्मा गांधी ने किसानों का साथ देने से इनकार करते हुए असहयोग आंदोलन वापस ले लिया, तो उनका कांग्रेस और महात्मा गांधी से मोह भंग हो गया। उन्होंने देश के क्रांतिकारियों का मार्ग अपनाया। 

सन 1928 में साइमन कमीशन के विरोध के दौरान लाला लाजपत राय की मौत ने उन्हें इतना उद्वेलित कर दिया कि उन्होंने एएसपी सांडर्स को मारकर लाला जी की मौत का बदला ले लिया। अंतत: 23 मार्च 1931 को भगत सिंह देश की खातिर शहीद हो गए।




Monday, March 24, 2025

स्वामी सहजानंद सरस्वती ने कहा-मेरा डंडा जिंदाबाद

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

स्वामी सहजानंद सरस्वती को भारत में किसान आंदोलन का जन्मदाता माना जाता है। उनका एक सर्वप्रिय नारा था-मेरा डंडा जिंदाबाद। सन 1909 को उन्होंने काशी के दशाश्वमेघ घाट पर दंडी संन्यासी के रूप में दंडी स्वामी अद्वैतानंद से दीक्षा ली और उनका नाम पड़ा स्वामी सहजानंद सरस्वती। 

वैसे उनके बचपन का नाम नौरंग राय था। स्वामी सहजानंद ने बिहार और उत्तर प्रदेश में घूम-घूमकर किसानों को अंग्रेजों के खिलाफ संगठित किया। वह पढ़ाई में बहुत तेज थे। उन्होंने छह साल की पढ़ाई को तीन साल में पूरा किया और हमेशा अव्वल रहे। 

बाद में उन्हें छात्रवृत्ति मिली और गाजीपुर के जर्मन मिशन हाईस्कूल में पढ़ने गए। वहां बाइबिल पढ़ना अनिवार्य था। बाइबिल पढ़ाने का काम पादरी करते थे। उनकी कक्षा में जब पादरी बाइबिल पढ़ाने आता, तो वह हिंदू धर्म की बुराई करता रहता था। 

एक दिन नौरंग राय यानी स्वामी सहजानंद को हिंदू धर्म की बुराई सहन नहीं हुई। वह गरजते हुए बोले, आप बाइबिल पढ़ाएं, इससे मुझे कोई ऐतराज नहीं है, लेकिन दूसरे धर्म की बुराई न करें। दूसरे धर्म की बुराई करके आप अपने धर्म को श्रेष्ठ नहीं बता सकते है। यह सुनकर पादरी बहुत नाराज हुआ। उसने उन्हें अनुशासनहीन और उद्दंड कहकर कक्षा में बैठने को मजबूर कर दिया। 

नौरंग राय बैठ तो गए, लेकिन इससे पादरी को ईसाई धर्म के श्रेष्ठ होने का भ्रम टूट गया। उस दिन के बाद उसने कभी किसी दूसरे धर्म की बुराई नहीं की। बाद में स्वामी सहजानंद ने किसानों और क्रांतिकारियों को संगठित करने का भी काम किया। वह सक्रिय रूप से तो किसानों के पक्ष में नहीं आए, लेकिन कांग्रेस में रहते हुए भी उनका समर्थन क्रांतिकारियों को हासिल था। स्वामी सहजानंद ने किसानों को संगठित किया।



न्यायप्रिय महारानी अहिल्याबाई होल्कर

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

31 मई 1725 को अहमदनगर के चौंडी गांव में पैदा हुई अहिल्याबाई एक साधारण किसान की पुत्री थीं। उनका विवाह दस-बारह वर्ष की आयु में खांडेराव होल्कर से हुआ था। पति स्वभाव से उग्र और चंचल था। वह अहिल्याबाई के प्रति अनुदार था। वैवाहिक जीवन में उन्होंने कई तरह के संकट झेले थे। जब वह 29 वर्ष की हुईं, तब उनके पति खांडेराव होल्कर की मौत हो गई। 

अहिल्याबाई ने अपने राज्य के अलावा दूसरे राज्यों में भी लोगों के लिए मंदिर, धर्मशालाएं बनवाईं। लोग उन्हें देवी के रूप में पूजते थे। एक बार की बात है। उनके पुत्र मालेराव होल्कर रथ पर सवार होकर कहीं जा रहे थे। मार्ग में एक बछड़ा खड़ा था जिसकी रथ से टक्कर लगने से मौत हो गई। 

बछड़े की मौत होने पर गाय वहीं आकर खड़ी हो गई। कुछ देर बाद जब उस रास्ते से अहिल्याबाई गुजरीं तो उन्होंने बछड़े के शव के पास गाय को खड़े देखा। उन्होंने मामले का पता लगाया और क्रोध से तमतमाती हुई राजमहल पहुंची। उन्होंने मालेराव की पत्नी से पूछा कि यदि कोई व्यक्ति मां के सामने पुत्र की हत्या कर दे, तो मारने वाले को क्या सजा मिलनी चाहिए। 

उनकी पत्नी ने कहा कि मृत्युदंड मिलना चाहिए। बस, अहिल्याबाई ने अपने पुत्र मालेराव को रथ से कुचलकर मृत्युदंड देने की घोषणा कर दी। इस काम के लिए कोई तैयार नहीं हुआ, तो वह खुद रथ लेकर अपने पुत्र को कुचलने निकली। कहा जाता है कि जब-जब वह मालेराव के पास पहुंचने वाली होती, वह गाय आकर रास्ते में खड़ी हो जाती। 

ऐसा कई बार हुआ, तो लोगों ने अहिल्याबाई को समझाया कि यह गाय भी नहीं  चाहती है कि किसी और मां के बेटे के साथ ऐसा हो। मालेराव को छोड़ दिया गया। कुछ  साल बाद मालेराव की मौत हो गई।



Sunday, March 23, 2025

अभी अधूरे हैं शहीदों की शहादत के लक्ष्य

अशोक मिश्र

आज शहीद दिवस है। आज ही के दिन ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ नामक पुस्तिका लिखकर अपनी नास्तिकता का सगर्व उद्घोष करने वाले शहीद-ए-आजम सरदार भगत सिंह, उनके अनन्य साथी शिवराम राजगुरु और सुखदेव थापर को 23 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी दे दी गई थी। दुनिया के सबसे लंबे समय तक चलने वाले भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दौरान कितने लोगों ने अपनी जान की पूर्णाहुति दी, इसकी गणना अब शायद संभव नहीं है। लेकिन स्वाधीनता संग्राम में अपने प्राण न्यौछावर करने वाले असंख्य वीरों केशहादत दिवसों पर उनकी प्रतिमाओं और तस्वीरों पर फूल माला चढ़ाकर हाथ जोड़ लेने से ही हमारे कर्तव्य की पूर्ति नहीं हो जाती है।

आज जब भगत सिंह, चंद्र शेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां वारसी, ठाकुर रोशन सिंह, राजगुरु और सुखदेव थापर जैसे न जाने कितने शहीदों की शहादत दिवसों पर सरकारी और गैर सरकारी आयोजनों में उनका महिमांडन करके देवपुरुष साबित करने का प्रयास तो किया जाता है, लेकिन यह सवाल कोई नहीं उठाता है कि क्या इन क्रांतिकारियों की शहादत का लक्ष्य पूरा हुआ? क्या सैकड़ों क्रांतिकारियों ने आज के भारत के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए थे?

शायद नहीं। याद करें, अपनी फांसी से मात्र तीन दिन पहले यानी 20 मार्च 1931 को पंजाब के तत्कालीन गवर्नर सर जेफ्री फिट्जहर्वे डी मोंटमोरेंसी को लिखे पत्र में उन्होंने साफतौर पर लिखा था कि हम पर युद्ध अपराधी होने का आरोप ब्रिटिश हुकूमत ने लगाया है। हम मानते हैं कि युद्ध छिड़ा हुआ है और यह लड़ाई तब तक चलती रहेगी जब तक इंसान इंसान का गुलाम रहेगा। आज  शक्तिशाली व्यक्तियों ने भारतीय जनता और श्रमिकों की आय के साधनों पर अपना एकाधिकार कर रखा है। चाहे ऐसे व्यक्ति अंग्रेज पूँजीपति और अंग्रेज या सर्वथा भारतीय ही हों, उन्होंने आपस में मिलकर एक लूट जारी कर रखी है। चाहे शुद्ध भारतीय पूँजीपतियों के द्वारा ही निर्धनों का खून चूसा जा रहा हो तो भी इस स्थिति में कोई अंतर नहीं पड़ता।

उनके इस पत्र से साफ जाहिर है कि वह एक ऐसे समाज की रचना करना चाहते थे जिसमें मानव द्वारा मानव का रक्त शोषण संभव न हो। 24 मार्च 1902 को बैरिस्टर प्रमथ नाथ मित्र के नेतृत्व में गठित अनुशीलन समिति ने अपने गठन के कुछ साल के बाद अपना लक्ष्य घोषित किया था-मनुष्य में मनुष्यत्व विकसित करना। चूंकि गुलामी में ऐसा करना संभव नहीं था। इसलिए अनुशीलन समिति ने अपना तात्कालिक लक्ष्य ब्रिटिश दासता से मुक्ति घोषित किया था। 

अनुशीलन समिति की एक शाखा के रूप में पूरे उत्तर भारत में सक्रिय हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी (बाद में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी) के नेता चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, योगेश चंद्र चटर्जी, राम प्रसाद बिस्मिल आदि ने दिल्ली के फिरोजशाह कोटला में द रिवोल्यूशनरी नाम से अपना घोषणा पत्र जारी करके कहा कि क्रांतिकारियों का तात्कालिक लक्ष्य ब्रिटिश गुलामी से मुक्ति है। लेकिन उनका अंतिम लक्ष्य ऐसे समाज की रचना करना है जिसमें कोई किसी का गुलाम न रहे। 

समाज में शोषण, दोहन, गुलामी आदि की कोई गुंजाइश ही न रहे। किंतु इसे इतिहास की विडंबना ही कही जाएगी कि ‘गरीबों को मिले रोटी, तो मेरी जान सस्ती है’ का उद्घोष करने वाले अमर क्रांतिकारी चंद्र शेखर आजाद की 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में शहादत हुई और उसके अगले ही महीने विप्लवी दर्शन से लैस सरदार भगत सिंह और उनके दो साथियों राजगुरु और सुखदेव थापर को लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी दे दी गई। इसके बाद जो कुछ हुआ उस इतिहास से सारा देश परिचित है। 






Saturday, March 22, 2025

लेनिन पुरस्कार पाने वाला फिल्म निर्माता आंद्रेई तारकोवस्की

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

आंद्रेई तारकोवस्की का जन्म 4 अप्रैल 1932 को रूस के कादिस्की जिले में हुआ था। वह अपने स्कूली जीवन में काफी उपद्रवी छात्र के रूप में जाने जाते थे। इसके बावजूद किसी तरह वह स्नातक करने में सफल हो गए थे। गरीबी और माता-पिता की वजह से काफी अस्थिर जीवन बिताने वाले तारकोवस्की ने जीवन भर संघर्ष किया। 

सन 1954 में उन्होंने स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ सिनेमेटोग्राफी (वीजीआईके) में पढ़ाई पूरी की और फिल्म निर्माता बन गए। कहा जाता है कि उनकी फिल्में काफी धीमी और आध्यात्मिक हुआ करती थीं। टारकोवस्की को अपने करियर के दौरान कई पुरस्कार मिले जिसमें फिररेस्की पुरस्कार, इक्वेनिकल जूरी पुरस्कार और कान फिल्म समारोह में ग्रैंड प्रिक्स स्पेशल डु जूरी पुरस्कार के अलावा वेनिस फिल्म समारोह में उनकी पहली फिल्म इवान्स चाइल्डहुड के लिए गोल्डन लायन और द सैक्रिफाइस के लिए बाफ्टा फिल्म पुरस्कार शामिल हैं। 

1990 में उन्हें मरणोपरांत सोवियत संघ के प्रतिष्ठित लेनिन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी तीन फिल्में आंद्रेई रुबलेव , मिरर और स्टॉकर- साइट एंड साउंड सभी समय की 100 महानतम फिल्मों के सर्वेक्षण में शामिल थीं। सन 1966 में वह भारत आकर बाबा आमटे से मिले।

 बाबा आमटे द्वारा दिव्यांगों के लिए संचालित आनंदवन में आकर उन्हें काफी अच्छा लगा। उन्होंने भी दिव्यांगों के लिए कुछ करना चाहा, लेकिन उनके पास पैसे नहीं थे। आमटे की सलाह पर उन्होंने आनंदवन के निकट ही संधि निकेतन की नींव डाली और कुछ ही समय में पूरा किया। 

लोगों ने उनकी काफी मदद की। दिव्यांग होते हुए भी उन्होंने संधि निकेतन के निर्माण में मजदूर की तरह काम किया। 29 दिसंबर 1986 को उनकी पेरिस में कैंसर से मौत हो गई।



नीतीश कुमार के बेटे पर टिकी भाजपा, राजद की निगाहें

 अशोक मिश्र

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार शायद इन दिनों सबसे ज्यादा दुविधाग्रस्त हैं। उन्हें आगामी विधानसभा चुनाव के बाद उभरने वाले राजनीतिक परिदृश्य को लेकर चिंता तो है ही, वह अपने बेटे निशांत कुमार के भविष्य को लेकर भी कहीं न कहीं चिंतित हैं। बढ़ती उम्र भी उनके लिए एक समस्या बनी हुई है जिसका मुद्दा बार-बार उभारकर आरजेडी नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव बिहार की राजनीति में उनके अप्रासंगिक होने का संकेत देते रहते हैं। जब भी बात नीतीश कुमार के बेटे निशांत की आती है, तो वह उनके राजनीति में आने का स्वागत करते हैं। सच तो यह प्रतीत होता है कि आरजेडी ही नहीं, बिहार की सक्रिय राजनीति में निशांत कुमार के आने का इंतजार भाजपा भी कर रही है। यदि ऐसा होता है, तो चुनाव बाद यदि भाजपा बिहार की 243 सदस्यीय विधानसभा चुनाव में 122 सीटों पर जीत हासिल नहीं कर पाती है, तो वह अपना मुख्यमंत्री बनाकर डिप्टी सीएम का पद निशांत को देकर सरकार बना सकती है। भाजपा   को पूर्ण बहुमत उसी दशा में मिल सकता है, जब जनता दल यूनाइटेड और राष्ट्रीय जनता दल का प्रदर्शन आगामी विधानसभा चुनावों के दौरान खराब रहे।

जनता दल यूनाइटेड के सामने समस्या यह है कि नीतीश कुमार अपनी उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच चुके हैं, जहां पहले की तरह सक्रिय रह पाना शारीरिक रूप से संभव नहीं दिखाई पड़ रहा है। हालांकि जदयू ने यह नारा जरूर दिया है कि नव वर्ष 2025, 2025 से 2030 फिर से नीतीश, लेकिन इस मुद्दे पर भाजपा सहमत होगी, यह अभी नहीं कहा जा सकता है। हालांकि नए नारे से जदयू ने यह संकेत दे दिया है कि उसे नीतीश के अलावा दूसरा मुख्यमंत्री स्वीकार नहीं है। एनडीए गठबंधन में मुख्यमंत्री पद मिलने को लेकर जदयू भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं है। उसके सामने महाराष्ट्र का उदाहरण मौजूद है। एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में चुनाव लड़ने के बाद भाजपा ने अपना सीएम बनाया और शिंदे को डिप्टी सीएम बनने को मजबूर कर दिया।

ऐसी स्थिति में पिछले बीस-बाइस साल से मुख्यमंत्री पद पर काबिज नीतीश कुमार डिप्टी सीएम पद पर मान जाएंगे, ऐसा कतई नहीं लगता है। हां, यदि नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार राजनीति में सक्रिय होते हैं, तो उन्हें आगे करके डिप्टी सीएम पद पर समझौता किया जा सकता है। वैसे जनता दल यूनाइटेड में भी यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि यदि चुनाव से पहले निशांत कुमार राजनीति में सक्रिय नहीं होते हैं, तो पार्टी में बिखराव तय है। इस संभावित बिखराव को सिर्फ निशांत की सक्रियता ही रोक सकती है। निशांत के सक्रिय न होने से जदयू में जो भगदड़ मचेगी, उसे रोक पाना किसी के वश की बात नहीं होगी।

राष्ट्रीय जनता दल के मुखिया लालू प्रसाद यादव और उनके बेटे तेजस्वी यादव बार-बार नीतीश कुमार और निशांत कुमार पर डोरे उसी समीकरण को ध्यान में रखकर डाल रहे हैं जिस समीकरण के सहारे भाजपा अपने कील-कांटे दुरुस्त कर रही है। यदि इंडिया गठबंधन को पूर्ण बहुमत से कम सीटें मिलीं, तो नीतीश कुमार को अपने पाले में लाकर निशांत को डिप्टी सीएम पद सौंपा जा सकता है।

बहरहाल, बिहार की पूरी राजनीति में एक अजीब सी आपाधापी मची हुई है। एनडीए में भाजपा और जदयू एक दूसरे को परखने के लिए तैयार दिखाई देते हैं, तो वहीं इंडिया गठबंधन में कांग्रेस बिहार में अपना जनाधार बढ़ाने की कोशिश करके राजद के सामने चुनौती बनकर खड़ी होने की कोशिश कर रही है। जिस प्रकार कन्हैया कुमार के नेतृत्व में ‘पलायन रोको नौकरी दो’ पदयात्रा निकाली जा रही है, उससे राजद में बेचैनी है। भले ही राजद ने इस बारे में कोई नकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की है, लेकिन अंदर ही अंदर कांग्रेस की यह पहल उसे बेचैन किए हुए है। यदि यह मान लें कि पदयात्रा से कांग्रेस का जनाधार बढ़ता है, तो वह किसके वोट बैंक में सेंध लगाएगी? यह समझा जा सकता है।



Friday, March 21, 2025

किताबों के तस्कर थे जुर्गिस बिलिनिस

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जुर्गिस बिलिनिस को किताबों का तस्कर कहा जाता है। उनका जन्म 16 मार्च 1846 को लिथुआनिया के सर्फ परिवार में हुआ था। उन दिनों लिथुआनिया रूसी साम्राज्य का हिस्सा था। रूसी शासक जार ने उन दिनों लिथुआनिया में लिथुआनियाई भाषा की पुस्तकों को पढ़ने-लिखने पर प्रतिबंध लगा रखी थी। जो भी पढ़ाई लिखाई होती थी, वह रूसी भाषा में ही होती थी। 

लेकिन लिथुआनिया के लोग अपनी भाषा में पुस्तकें पढ़ना चाहते थे। बाइस साल की उम्र तक बिलिनिस अनपढ़ रहे। सन 1860 में उनके पिता की मृत्यु हो गई, तो उन्हें अपने भाई-बहनों की जिम्मेदारी उठाने पर मजबूर होना पड़ा। इतना ही नहीं, उनके पिता जिस जमीन पर खेती करते थे, वह भी छोड़नी पड़ी। 22 साल की उम्र में उनमें पढ़ने की ललक पैदा हुई, तो वह गांव से शहर आए।

 रास्ते में लुटेरों ने उनकी जमा-पूंजी लूट ली। अब बिलिनिस के सामने कोई चारा नहीं बचा। तब एक राहगीर ने उन्हें सुझाव दिया कि यदि वह पढ़ना चाहते हैं, तो वे एक काम कर सकते हैं जिससे उन्हें अच्छी आमदनी होगी और वह अपनी पढ़ाई कर सकते हैं। बस फिर क्या था? उन्होंने लिथुआनियाई भाषा की पुस्तकों को रूस से लाकर लिथुआनिया में बेचना शुरू कर दिया। 

हालांकि इसमें उन्हें खतरा भी बहुत था। यदि लिथुआनियाई भाषा की पुस्तकों को बेचते या पढ़ते पाए जाते, तो जारशाही उन्हें कठोर दंड देती। उन्होंने 32 साल तक पुस्तकों की तस्करी की यानी लिथुआनियाई भाषा की पुस्तकों को लाकर बेचा। वह इस काम को किसी भी तरह गलत नहीं मानते थे। लिथुआनिया के लोग इस बात से अच्छी तरह वाकिफ थे कि पढ़ने-लिखने से ही वह अपने देश को रूस से आजाद करा सकते हैं।