Monday, January 5, 2026

कुपोषण के कारण हरियाणा में पैदा हो रहे हैं कमजोर बच्चे

अशोक मिश्र

दो दिन पहले ही हरियाणा में लिंगानुपात सुधरने की खबर आई थी। यह उपलब्धि खुश करने वाली थी, लेकिन इसके साथ ही साथ चिंताजनक बात यह है कि महिलाओं में पोषण की कमी के कारण कमजोर बच्चे पैदा हो रहे हैं। फरीदाबाद के बीके (बादशाह खान) अस्पताल के नीकू वार्ड में हर महीने पहुंचने वाले बच्चों में बहुत सारे बच्चे शारीरिक रूप से कमजोर पाए जा रहे हैं। इसका कारण गर्भवती महिलाओं में पोषण की कमी माना जा रहा है। 

बीके अस्पताल में हर हफ्ते सात से दस बच्चों का जन्म होता है। इनमें से तीन-चार बच्चे कमजोर पैदा होते हैं। इन कमजोर बच्चों को बाद में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। शिशुओं में कम वजन, सांस लेने में दिक्कत, खून की कमी, कुछ अंगों का सही से विकास न होना जैसी समस्याएं अब तो आम हो चली हैं। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि यदि गर्भवती स्त्री को ठीक ढंग से पोषण न मिले, तो उसका गर्भस्थ शिशु कमजोर रह सकता है क्योंकि शिशु को पोषण उसकी मां के माध्यम से ही मिलता है। 

अब अगर मां ही कमजोर होगी, तो गर्भस्थ शिशु कैसे हष्ट-पुष्ट हो सकता है। गर्भवती महिलाओं को सही पोषण न मिल पाने का सबसे पहला कारण उनकी गरीबी है। परिवार की आय कम होने की वजह से उनकी अनिवार्य  जरूरतें भी पूरी नहीं हो पाती हैं। सामान्य दिनों में भी महिलाओं और लड़कियों को भर पेट भोजन नहीं मिल पाता है। ऐसी स्थिति में यदि महिला गर्भवती हो जाए, तो हालात और बिगड़ जाते हैं। यह भी सच है कि राज्य सरकार आंगनबाड़ी, एएनएम और आशा वर्कर्स के जरिये गर्भवती महिलाओं को पौष्टिक आहार देने का प्रयास करती है। 

इस स्थिति से निपटने के लिए राज्य सरकार ने गर्भवती महिलाओं महीने में तीन दिन 9, 10, 23 और माह के अंतिम दिन गुड़ और चना बांटने का फैसला किया है। गुड़ और चना शरीर में रक्त आपूर्ति का बेहतरीन माध्यम माना जाता है। स्वास्थ्य विभाग ने प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत गुड़ और चना वितरण का फैसला लिया है। इसके बावजूद राज्य में गर्भवती महिलाएं एनीमिया और पौष्टिक आहार की कमी से जूझती हुई मिल जाती हैं। गरीबी, भुखमरी और कुपोषण जैसे तमाम कारणों से देश की आधी आबादी यानी महिलाएं एनीमिया से पीड़ित पाई जाती हैं। 

गर्भवती महिलाओं के मामले में यह आंकड़ा कुछ और बढ़ जाता है। आमतौर पर माना जाता है कि पांच में से एक गर्भवती महिला खून की कमी का शिकार होती है। यह कोई अच्छी स्थिति नहीं है। गर्भवस्था के दौरान पोषण युक्त भोजन करने की सलाह सरकारी अस्पतालों में अपनी जांच कराने आने वाली गर्भवती महिलाओं को डॉक्टर और नर्सें देती रहती हैं, लेकिन ज्यादातर महिलाएं इस बात पर ध्यान ही नहीं देती हैं। बाद में जब परेशानी होती है, तो पछताती हैं।

Sunday, January 4, 2026

आप मेरी झोपड़ी नहीं देख सकते क्या?

 

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

धन का अहंकार हो या सत्ता का, कभी अच्छा नहीं माना गया है। धन हो या सत्ता इस दुनिया में किसी के पास स्थायी नहीं रही है। धन या सत्ता आज है, कल कोई दूस
रा उसका मालिक हो जाएगा। इसलिए किसी भी स्थिति में अहंकार को अच्छा नहीं माना गया है। अरब देश में कोई राजा था। वैसे वह बड़ा दयालु और प्रजापालक था। वह अपनी प्रजा का बहुत ख्याल रखता था। मृदुभाषी भी था। 

एक बार की बात है। वह अपने राज्य में एक बार घूमने निकला। उसे एक जगह बहुत पसंद आई। उसने उस जमीन पर अपना महल बनाने का फैसला किया। उसने जिस स्थान पर महल बनाने का निर्णय लिया था, उस जमीन के मालिकों को अच्छे दाम देकर जमीन खरीद ली। बस एक छोटा सा टुकड़ा बचा था जिसकी मालकिन एक बुजुर्ग महिला थी। वह अपनी उस जमीन पर झोपड़ी बनाकर रहती थी। 

बाकी बची जमीन पर थोड़ा बहुत कुछ अनाज सब्जी उगाकर अपना गुजारा करती थी। जब महल बनकर तैयार हुआ, तो राजा बहुत खुश हुआ। लेकिन सुबह उठने के बाद जब भी वह और उसके परिवार वाले महल के बगल में बनी झोपड़ी को देखते तो उन्हें बहुत बुरा लगता था। राजा ने अपने दरबारियों को उस बुजुर्ग महिला को समझाने को भेजा, लेकिन वह नहीं मानी तो उसे दरबार में तलब किया। 

राजा ने उस बुजुर्ग महिला से कहा कि मैं चाहता तो आपकी जमीन छीन सकता था। उस महिला ने जवाब दिया, आप राजा हैं। आपके पास शक्ति है। उस शक्ति का उपयोग मुझ जैसी शक्तिहीन पर करना क्या आपको शोभा देता। जब मैं आपके महल को रोज देख सकती हूं, तो क्या आप मेरी झोपड़ी को नहीं देख सकते। यह सुनकर राजा बहुत लज्जित हुआ। उसने ससम्मान महिला को वापस भेज दिया।

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ मुहिम से सुधरा हरियाणा में लिंगानुपात

अशोक मिश्र

हरियाणा के संदर्भ में बहुत दिनों बाद एक अच्छी खबर पढ़ने-सुनने को मिली। काश कि भविष्य में भी यह प्रक्रिया इसी तरह चलती रहे। हरियाणा ने वर्ष 2024 के मुकाबले में वर्ष 2025 में लिंगानुपात के मामले में 13 अंकों की बढ़ोतरी हासिल की। वर्ष 2025 में लिंगानुपात का आंकड़ा 923 पहुंचा है। सच कहा जाए, तो यह आंकड़ा भी कम है, लेकिन राज्य ने लिंगानुपात के मामले में जिस मील के पत्थर को पार किया है, तो उम्मीद की जानी चाहिए कि वह लिंगानुपात के मामले में आगे ही बढ़ता रहेगा। 

जिस प्रदेश को आज से कई दशक पहले तक कुड़ीमार प्रदेश कहा जाता था, उस संदर्भ में देखें, तो यह उपलब्धि गौरवान्वित करने वाली है। यह उपलब्धि बता रही है कि अब राज्य के लोगों की मानसिकता बदल रही है। वह अब अपनी लड़कियों को लेकर सकारात्मक ढंग से सोचने लगे हैं। उन्हें अब बेटियां-बहनें बोझ नहीं लगती हैं। जिस तरह राज्य की लड़कियां आगे बढ़कर हर क्षेत्र में कामयाबी हासिल करती जा रही हैं, खेलकूद, पढ़ाई-लिखाई में वह उत्तरोत्तर आगे बढ़ती जा रही हैं। 

अच्छे अंकों से परीक्षाएं पास कर रही हैं, राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर की खेल प्रतिस्पर्धाओं में मेडल हासिल कर रही हैं, उससे लोगों को अपनी बहन-बेटियों पर गर्व हो रहा है। अंतरमन में जरूर उन्हें अपने पूर्वजों की बेटियों को जन्म लेते ही मार देने की प्रवृत्ति पर अफसोस हो रहा होगा। वैसे भी समाज को आगे बढ़ाने के लिए स्त्री की जरूरत होती है। प्रकृति ने यह गुरुत्तर दायित्व स्त्रियों को ही सौंप रखा है। ऐसी स्थिति में यदि लड़कियों की संख्या लड़कों के मुकाबले में कम रह गई, तो स्वाभाविक तौर पर कुछ लड़के कुंवारे रह जाएंगे। 

यह भी एक तरह की सामाजिक विकृत्ति है, जिस तरह लड़कियों की संख्या का कम होना एक सामाजिक बुराई है। संतोष की बात यही है कि अब जनमानस में  लड़कियों को लेकर चेतना पैदा हो चुकी है। लिंगानुपात सुधार में सबसे अहम भूमिका बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान की मानी जा रही है। जब से यह मुहिम शुरू हुई है, लोग ने इसे गंभीरता से लेना शुरू कर दिया है। प्रदेश सरकार और स्वयंसेवी संस्थाओं ने इसका प्रचार भी बहुत किया है। पूरे प्रदेश में जहां भी जाइए, आपको बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के स्लोगन लिखे हुए मिल जाएंगे। जब कोई बात या विचार बार-बार आंखों के सामने आता है, तो वह मन के दरवाजे पर दस्तक जरूर देता है। 

वैसे भी लिंगानुपात में सुधार के लिए अवैध गर्भपात को रोकने के लिए राज्य सरकार ने कठोर कदम उठाए हैं। गर्भवती महिलाओं का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य करके अवैध गर्भपात पर एक तरह से रोक लगा दी है। सरकार ने एएनएम, आशा वर्कर्स आदि की जिम्मेदारी भी तय कर दी थी। इसका भी लिंगानुपात मामले में सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

Saturday, January 3, 2026

जो हुआ, बहुत ही अच्छा हुआ


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कहा जाता है कि प्रकृति में जितनी भी घटनाएं होती हैं, वह अकारण नहीं होती हैं। उसके पीछे कोई न कोई कारण छिपा होता है। इसी बात को धार्मिक लोग यह कहते हैं कि भगवान जो कुछ भी करता है, वह अच्छे के लिए करता है। भगवान के हर काम के पीछे कोई न कोई भलाई छिपी होती है जिसे हम पहचान नहीं पाते हैं।
इसी संदर्भ में एक कथा पेश करने जा रहा हूं। कहते हैं कि एक राजा शिकार खेलने के लिए अपने मंत्री के साथ वन को गया। शिकार करने का उस राजा को बहुत शौक था। वह जब भी फुरसत मिलती, वह शिकार खेलने के लिए वन को निकल जाता था। 

इस बार उसे काफी भटकने के बाद एक हिरन दिखाई दिया। उसने उस हिरन पर अपना तीर छोड़ने ही वाला था कि तभी पता नहीं कहां से एक सुअर आया और उसने राजा पर छलांग लगा दी। इसी चक्कर में राजा की अंगुली कट गई। राजा की अंगुली से खून निकलने लगा। यह देखकर मंत्री ने कहा कि जो हुआ अच्छा हुआ। यह सुनकर राजा को बहुत गुस्सा आया। एक तो वह संकट में था। उसकी अंगुली से खून बह रहा था। ऊपर से मंत्री कहता है कि जो हुआ अच्छा हुआ। 

राजा ने गुस्से में मंत्री को अपने राज्य से निकाल दिया। राजा का आदेश मानकर मंत्री एक ओर को चल दिया। राजा आगे बढ़ा, तो उसे कबीलों ने घेरकर बंदी बना लिया और अपने सरदार के पास ले गया। सरदार ने पुजारी से राजा की बलि देने को कहा। पुजारी ने राजा की कटी अंगुली देखी तो उसे छोड़ दिया। अब राजा को मंत्री को निकाल देने को लेकर पछतावा हुआ। उन्होंने उसे खोजना शुरू किया, काफी दूर जाने के बाद एक जगह मंत्री भजन करता हुआ मिला। राजा ने माफी मांगी, तो मंत्री ने कहा कि आपने मुझे निकाल दिया था, तो अच्छा किया वरना आपकी जगह मेरी बलि दे दी जाती।

लाडो लक्ष्मी योजना की लाभार्थी महिलाओं का बढ़ा दायरा


अशोक मिश्र

महिलाएं परिवार की अर्थव्यवस्था की रीढ़ होती हैं। जब भी परिवार पर संकट आता है, तो महिलाएं उस धन को संकट से निपटने के लिए अपने पति, पुत्र या पिता को सौंप देती हैं जिसे उन्होंने परिवार को चलाने के लिए मिले पैसे में से कटौती करके बचाया होता है। भारतीय महिलाओं की यह परंपरागत आदत है कि वह अपने पिता, पति और पुत्र के सामने अर्थाभाव का रोना रोती रहती हैं। 

घर खर्च के लिए दिए गए पैसे पूरे नहीं पड़ते हैं, लेकिन भीतर ही भीतर वह उस रकम में भी कुछ न कुछ हर महीने बचा ही लेती हैं। यह हर महीने बचाया हुआ पैसा एक दिन परिवार के संकट के समय काम आता है। महिलाएं अब स्वयं अपने पैसे में कटौती करके बचा सकें या परिवार की सुख-सुविधाओं में योगदान दे सकें, इसके लिए सैनी सरकार ने लाडो लक्ष्मी योजना की शुरुआत की है। 

1 नवंबर को हरियाणा दिवस पर सीएम नायब सिंह सैनी ने प्रदेश की 5,22,162 महिलाओं के बैंकखातों में 109 करोड़ रुपये डाले थे। प्रत्येक महिला के खाते में 21सौ रुपये आए थे। 21 सौ रुपये उन महिलाओं के बैंक खाते में डाले गए थे जिनके परिवार की वार्षिक आय एक लाख रुपये से कम थी। लेकिन अब सैनी सरकार ने लाडो लक्ष्मी योजना में विस्तार किया है। इस योजना में अब उस परिवार की महिलाओं को भी शामिल किया गया है जिनके परिवार की वार्षिक आय एक लाख अस्सी हजार से कम है। लेकिन इस मामले में एक शर्त भी है। 

विस्तारित योजना में उस परिवार की महिला को ही शामिल किया जाएगा जिसने सामाजिक विकास में योगदान दिया है। अर्थात जिसने अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और उनके विकास पर ध्यान दिया है। दसवीं और बारहवीं कक्षा में जिन बच्चों ने अस्सी प्रतिशत से ज्यादा अंक हासिल किए हैं, उन्हीं महिलाओं को 21 सौ रुपये मासिक प्रदान किए जाएंगे। इसमें से 11 सौ रुपये तो महिला के बैंकखाते में सीधे डाले जाएंगे। बाकी बचे एक हजार रुपये की एफडी या आरडी खाता खोला जाएगा और पांच साल या सरकार द्वारा तय की गई अवधि के बाद ब्याज सहित रकम महिला के खाते में ट्रांसफर कर दी जाएगी। 

यदि किसी कारणवश महिला की बीच में ही मौत हो जाती है तो आरडी या एफडी की रकम उसके नामिनी को उसी समय सौंप दी जाएगी। यही नहीं, बच्चों की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर ध्यान देने के लिए भी भारत सरकार के निपुण मिशन के तहत कक्षा एक से चार तक ग्रेड लेवल निपुणता प्राप्त करने वाले बच्चों की माताओं को भी लाडो लक्ष्मी योजना में शामिल किया जाएगा। 

विस्तारित योजना से कुछ महिलाओं को लाभ जरूर होगा। लेकिन जो शर्तें लगाई गई हैं, उसके चलते लाभार्थी महिलाओं की संख्या काफी कम होने की उम्मीद है। हालांकि यह भी सही है कि इससे कम से कम कुछ महिलाओं को तो लाभ मिलेगा।

Friday, January 2, 2026

क्लास में हमेशा अव्वल रहे सत्येंद्र नाथ बोस

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

गॉड पार्टिकल बोसान का नाम इधर कुछ वर्षों से काफी चर्चा में है। बोसान नाम जिस वैज्ञानिक के नाम पर दिया गया था, वह भारतीय थे। उनका नाम सत्येंद्र नाथ बोस था। यह प्रतिभाशाली वैज्ञानिक एक जनवरी 1894 को कोलकाता में पैदा हुआ था। इन्हें दुनिया के महान वैज्ञानिकों में गिना जाता है। बोस की प्रारंभिक शिक्षा घर के पास ही चल रहे एक साधारण स्कूल में हुई थी। 

स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद सत्येंद्र नाथ कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कालेज में पढ़ने गए। बोस स्कूली शिक्षा से लेकर उच्चतर कक्षाओं में सर्वाधिक अंक हासिल करने वाले विद्यार्थियों में रहे। कहा जाता है कि जब वह स्कूली शिक्षा ग्रहण कर रहे थे, तो उन्होंने गणित के हर प्रश्न के कई तरीके से हल किया था। 

उनकी प्रतिभा से प्रसन्न होकर उनके गणित के अध्यापक ने सौ में से एक सौ दस अंक प्रदान किए। जब स्कूल के प्रिंसिपल ने अध्यापक से इसका स्पष्टीकरण पूछा, तो अध्यापक ने सारी बात बताते हुए कहा कि एक दिन यह लड़का बहुत बड़ा वैज्ञानिक बनेगा। उस अध्यापक की बात सच निकली। उन्होंने भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में क्रांतिकारी शोध किए। उनकी खोज से मानवता की काफी सेवा हुई। 

गणितज्ञ और भौतिकशास्त्री बोस को तार्किक भौतिकी में काफी प्रसिद्धि प्राप्त हुई। बोस को दुनिया के महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन के साथ काम करने का भी मौका मिला। अपने वैज्ञानिक कार्यों की वजह से वह रायल सोसाइटी के सदस्य बनाए गए। भारत सरकार ने भी 1954 में उन्हें पद्म विभूषण अलंकरण से सम्मानित किया। शांति निकेतन में विश्व भारती विश्वविद्यालय के कुलपति रहते हुए उन्होंने 4 फरवरी 1974 को देह छोड़ दिया था। यह विज्ञान की बहुत बड़ी क्षति थी।

बाढ़ से निपटने की सैनी सरकार ने अभी से शुरू की तैयारियां

अशोक मिश्र

इन दिनों पूरे उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड पड़ रही है। पिछले कई दिनों से उत्तर भारत कोहरे की सफेद चादर से ढका हुआ है। ऐसे मौसम में अगर सूखा और बाढ़ राहत के संदर्भ में बात की जाए, तो जरूर अटपटा लगेगा। बाढ़ या सूखा लाने वाला मौसम आने में अभी लगभग छह महीने बाकी है। लेकिन हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने अभी से सूखा और बाढ़ राहत के मामले से निपटने की अभी से तैयारियां शुरू कर दी है। पिछले साल पंजाब और हरियाणा में आई बाढ़ की वजह से एक बहुत बड़ी आबादी प्रभावित हुई थी। 

हरियाणा के कई जिलों में बाढ़ ने भारी तबाही मचाई थी। फसलों को काफी नुकसान हुआ था। ऐसी स्थिति दोबारा न पैदा हो, इससे निपटने के लिए सैनी सरकार ने बंदोबस्त करने शुरू कर दिए हैं। मुख्यमंत्री ने बुधवार को हरियाणा राज्य सूखा राहत एवं बाढ़ नियंत्रण बोर्ड की बैठक में साफ तौर पर कहा कि बाढ़ नियंत्रण से जुड़ी सभी परियोजनाओं की नियमित मानीटरिंग की जाए और जो कार्य पिछले साल के अधूरे रह गए हैं, उन्हें जल्दी से जल्दी पूरा किया जाए। 

इसके साथ-साथ मुख्यमंत्री ने प्रदेश की 388 बाढ़ नियंत्रण योजनाओं के लिए 637 करोड़ की मंजूरी भी प्रदान कर दी है। इसमें जिला उपायुक्तों द्वारा प्रस्तावित की गई 102 करोड़ रुपये की 59 परियोजनाएं भी शामिल हैं। मुख्यमंत्री ने बैठक में मौजूद अधिकारियों से कहा भी कि वर्ष 2023 और 2025 में राज्य के विभिन्न इलाकों में जलभराव और बाढ़ ने लोगों का जीवन अस्तव्यस्त कर दिया था। लोगों और किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा था। ऐसी स्थिति भविष्य में न आए, इसके लिए जरूरी है कि बाढ़ से निपटने की तैयारियां अभी से शुरू कर दी जाएं। ड्रेनों की सफाई की व्यवस्था तत्काल की जाए। 

जहां भी जरूरत हो, ड्रेनों की सफाई अभी से शुरू कराई जाए, ताकि समय आने पर किसी किस्म की अफरातफरी का सामना न करना पड़े। इतना ही नहीं, नदियों के तटबंधों को भी मजबूत करने के निर्देश दिए गए हैं। नदियों के तटबंधों को मजबूत करने के लिए स्टोन स्टड नई तकनीक से लगाए जाएं ताकि बाढ़ की स्थिति में तटबंधों में कटाव न हो। इसके लिए जरूरत हो तो उत्तर प्रदेश की तर्ज पर ही स्टोन स्टड लगाए जाएं। सैनी सरकार इस बार समय से पहले सूखा राहत और बाढ़ नियंत्रण को लेकर सतर्क हो गई है। 

बजरी से भरे बोरों की भी व्यवस्था करने के निर्देश अभी से ही दिए गए हैं। इस दौरान उन परियोजनाओं पर भी निगाह डाली गई जो पिछले साल पूरी नहीं हो पाई थीं। इन परियोजनाओं को जल्दी से जल्दी पूरा करने को कहा गया है। भविष्य में जिन परियोजनाओं पर काम होना है, वह उसके टेंडर जनवरी माह में ही निकालने के भी दिशा-निर्देश दिए जा चुके हैं। बाढ़ से निपटने के लिए हरसंभव उपाय किए जाएं।

Thursday, January 1, 2026

मौत के बाद प्रसिद्ध हुए फ्रांज काफ्का


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बीसवीं सदी में कहानियों, लघु कथाओं और उपन्यास के मामले में जर्मनी के लेखक फ्रांज काफ्का महान माने जाते हैं। 3 जुलाई 1883 को  काफ्का का जन्म एक जर्मन यहूदी परिवार में हुआ था। काफ्का के पिता हरमन्न काफ्का जर्मनी में एक दुकान चलाते थे। वह बहुत क्रूर किस्म के दुकानदार थे। उनकी मां जूली दुकान में अपने पति का हाथ बंटाती थीं। 

काफ्का ने भी बड़े होने पर बीमा कंपनी में नौकरी की थी। जिस दौर में काफ्का का जन्म हुआ था, प्रगतिशीलता धीरे-धीरे जन्म ले रही थी। उनके लेखन में भी आधुनिकता काफी देखने को मिलती है। उनके समकालीन समीक्षकों ने काफ्का को बीसवीं सदी के महान साहित्यकारों में से एक माना है। दुनिया के साहित्यकारों में काफ्का शायद पहले व्यक्ति हैं जिनको मरने के बाद प्रसिद्धि मिली। 

अपने जीवनकाल में वह बहुत कम चर्चित रहे। वह जीवन भर अपने लेखन को छापने और पढ़ने के अयोग्य मानते रहे। उनका मानना था कि उनके लेखन में कोई नई और विशेष बात नहीं है। यही वजह है कि उन्होंने अपने घनिष्ठ दोस्त इस्राइली लेखक, संगीतकार और पत्रकार मैक्स ब्राड से जीवन के अंतिम दिनों में अपनी पांडुलिपियां सौंपते हुए कहा था कि इसे जला देना, यह पाठकों के पढ़ने योग्य नहीं है। 

असल में काफ्का को जीवन के अंतिम दिनों में तपेदिक रोग हो गया था। उनकी मौत के बाद ब्राड ने मित्र के अनुरोध को अस्वीकार करते हुए साहित्य को प्रमुखता दी। उन्होंने उनकी पांडुलिपियों को संशोधित करके प्रकाशित किया। द ट्रायल, अमेरिका और द कैसल जैसे उपन्यासों ने पूरी दुनिया में धूम मचा दी। लोगों ने उनकी मौत के बाद उनके लेखन को पहचाना। वह मरने के बाद प्रसिद्ध हो गए।

नए साल पर वही संकल्प लें जिसको पूरा कर सकें

अशोक मिश्र

नया साल 2026 आपके दरवाजे पर दस्तक दे चुका है। नई आशा, नए उमंग और उल्लास के साथ पूरी दुनिया नए वर्ष का स्वागत कर रही है। पहली जनवरी केवल तारीख बदलने का अवसर नहीं है। यह बीते वर्ष की समीक्षा का भी मौका होता है। पीछे मुड़कर पिछले साल की गई गलतियों को जानने और समझने का भी अवसर होता है। ऐसा नहीं है कि पिछले साल केवल गलतियां ही गलतियां हुई थीं। 

कुछ ऐसा भी हुआ होगा जिसने हमें प्रसन्नता दी होगी, खुश होने का मौका दिया होगा। कुछ ऐसी भी घटनाएं हुई होंगी, जो सुखद होने के साथ-साथ हमें जीवन भर याद रहेंगी। उपलब्धियों को यों ही बिसार पाना, इतना आसान नहीं है। ऐसे अवसरों को दिलोदिमाग में सहेज कर रखने की जरूरत है। ऐसे क्षण जीवन की थाती बनकर रह जाते हैं। नया साल हमें इस बात का भी अवसर उपलब्ध कराता है कि हम यह पता करें कि पिछले साल हमने जो संकल्प लिए थे, वे कितने पूरे हुए। 

अगर पूरे नहीं हुए, तो उसके कारण क्या थे? हमने कहां गलती की। किस वजह से हमारे संकल्प पूरे नहीं हुए। बीता हुआ वर्ष हमें यही सिखाता है कि इस साल हमें वो गलतियां नहीं करनी है जो पिछले साल कर चुके हैं। बीता साल भी हमें उतना ही प्यारा होना चाहिए जितना नया वर्ष है। बीते हुए साल ने हमें बहुत कुछ सिखाया है। विपरीत परिस्थितियों से लड़ना, हार न मानना और अपनी जिजीविषा को हर हालत में कायम रखना। एक शिक्षक की भूमिका निभाकर बीता साल चला गया। 

बीते साल ने जो कुछ दिया, उसके प्रति हमें कृतज्ञ होना चाहिए। बीते साल में जो कुछ दुख मिले, तकलीफें झेलीं, उसको भूलकर अब आगे बढ़ने का अवसर आ गया है। यही नए साल का संदेश भी है। बीती बातों को मन में बोझ की तरह ढोने से कोई फायदा नहीं है। उन्हें भुलाकर ही आगे बढ़ा जा सकता है। आत्ममंथन करके ही सपनों की नींव को रखा जा सकता है। अब बारी आती है नए साल पर संकल्प लेने की। कोई जरूरी नहीं है कि बड़े संकल्प लिए जाएं। संकल्प वही लिए जाएं, जिन्हें पूरा कर सकते हैं। 

लोगों को दिखाने या जोश में आकर बड़े-बड़े संकल्प ले लिए और बाद में पता चला कि इसे पूरा नहीं किया जा सकता है। ऐसे संकल्प लेने का कोई फायदा नहीं है। पहले लक्ष्य तय कीजिए। नए साल में हमें करना क्या है? जो हमें करना है, उसको कैसे किया जा सकता है। नया वर्ष केवल व्यक्तिगत बदलाव का समय नहीं, सामाजिक जिम्मेदारी का भी समय है। हम जिस समाज में रहते हैं, उसकी समस्याओं से हम अछूते नहीं रह सकते। छोटे-छोटे प्रयास—जैसे ईमानदारी, संवेदनशीलता, पर्यावरण के प्रति जागरूकता—समाज को बेहतर बना सकते हैं। अगर हर व्यक्ति नए साल में केवल एक अच्छी आदत अपना ले तो बदलाव अपने आप दिखने लगेगा।

Wednesday, December 31, 2025

राजेंद्र बाबू ने कर्ज लेकर किया भतीजी का विवाह

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

दहेज आज भी गरीब और मध्यम आय वाले परिवारों के लिए सबसे बड़ी समस्या है। आजादी से पहले और आज भी दहेज की वजह से बहुत सारी लड़कियां अविवाहित रह जाती हैं। इस समस्या से मुक्ति के लिए अब कुछ संस्थाओं ने सामूहिक विवाह का आयोजन करना शुरू कर दिया है, ताकि गरीब परिवार की लड़कियों का भी विवाह कराया जा सके।

ऐसे वैवाहिक आयोजनों में कुछ अमीर लोग और संस्थाएं आर्थिक मदद करती हैं ताकि आयोजन संपन्न हो सके। कुछ लोग तो भारी भरकम रकम कर्ज लेकर भी अपनी कन्या क विवाह करते हैं। ऐसी ही पीड़ा देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भी झेलना पड़ा था। 

बात तब की है, जब उनके पिता का निधन हो गया था। कुछ समय बाद उनकी मां भी चल बसीं। डॉ. राजेंद्र प्रसाद जिन्हें लोग बड़े प्यार से राजेंद्र बाबू भी कहते थे, दो भाई थे। बड़े भाई महेंद्र प्रसाद की बेटी विवाह योग्य हो चुकी थी। उन दिनों आमतौर पर लोग अपनी बेटियों का विवाह 14-15 साल की आयु में कर दिया करते थे। बड़े भाई महेंद्र प्रसाद को तीन महीने पहले ही अध्यापक की नौकरी मिली थी। 

जमींदारी थी, लेकिन उससे केवल इतनी आय होती थी कि रहने खाने की व्यवस्था हो जाए। नतीजा यह हुआ कि दोनों भाइयों को कर्ज लेकर बेटी की शादी करनी पड़ी। कर्ज लेकर भतीजी की शादी करने की पीड़ा राजेंद्र बाबू को आजीवन सालती रही। उन्होंने आगे चलकर दहेज प्रथा के खिलाफ सक्रिय अभियान चलाया।  उन्होंने युवकों से यह शपथ पत्र भरवाया कि वह दहेज लेकर विवाह नहीं करेंगे। यदि लेना भी पड़ा, तो 51 रुपये से अधिक दहेज नहीं लेंगे। दहेज का दानव आज भी न जाने कितनी महिलाओं की बलि ले रहा है।