Monday, March 31, 2025

रक्त और पानी अमूल्य, बहाना उचित नहीं

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

तथागत का जन्म 563 ईसा पूर्व शाक्य कुल के राजा शुद्धोधन के घर में हुआ था। इनकी मां का नाम महामाया था जिनकी मृत्यु बुद्ध के जन्म के सात दिन बाद हो गई थी। बचपन में इनका नाम सिद्धार्थ रखा गया था। 29 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपने नवजात पुत्र राहुल और पत्नी यशोधरा को त्यागकर लोगों को जरा, मरण और दुखों को दूर करने का मार्ग तलाशने के लिए घर से निकल गए थे। 

कई साल की तपस्या के बाद महात्मा बुद्ध को बिहार के बोध गया नामक स्थान पर उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ था। इसके बाद महात्मा बुद्ध जीवन भर भ्रमण करते रहे। कहा जाता है कि वह भ्रमण करते हुए एक गांव में पहुंचे जहां लोग नदी के पानी के बंटवारे को लेकर आपस में लड़ने जा रहे थे। किस्सा यह है कि उस गांव के बाहर एक नदी बहती थी। नदी के दोनों ओर गांव बसे थे। 

दोनों गांवों के लोग पीने और खेतों की सिंचाई के लिए इसी नदी के पानी का उपयोग करते थे। यह क्रम कई वर्षों से चला आ रहा था। दोनों गांवों के लोग आपस में मिलजुलकर रहते थे। एक साल ऐसा हुआ कि खूब गर्मी पड़ी। नतीजा यह हुआ कि नदी का पानी बहुत कम हो गया। दोनों गांवों की जरूरतें इतने पानी में पूरी नहीं हो पा रही थीं। तब एक गांव के लोगों ने सोचा कि नदी से नहर निकालकर पानी का उपयोग किया जाए। 

इस बात की खबर जब दूसरे गांव के लोगों को मिली तो उन्होंने इसका विरोध किया। मरने-मारने को उतारू हो गए। तभी उस गांव में महात्मा बुद्ध पहुंच गए। उन्होंने मामले को समझते हुए गांववालों से पूछा कि अच्छा, पानी की क्या कीमत होगी? लोगों ने कहा कि पानी तो अमूल्य है। प्रकृति प्रदत्त है। तब बुद्ध ने पूछा कि रक्त का क्या मूल्य होगा? गांववालों ने जवाब दिया कि रक्त भी अमूल्य है। 

बुद्ध के इन सवालों को सुनकर गांववाले समझ गए कि वे पानी के लिए रक्त न बहाने को कह रहे हैं। उन्होंने इसके बाद लड़ना छोड़ दिया। वह आपस में समन्वय बनाकर पानी का उपयोग करने लगे।





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