बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
महिला संत कवयित्रियों में मीरा बाई का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। मीरा बाई ने भगवान कृष्ण की आराधना करके अपने जीवन को सार्थक कर लिया था। ठीक उसी तरह कश्मीर की संत कवयित्री लाल देद का नाम भी जम्मू-कश्मीर में बड़े आदर और सम्मान के साथ लिया जाता था। उनकी रचनाओं-पदों को वाख कहा जाता है। संत कवयित्री लाल देद को विभिन्न नामों से जाना जाता है।उन्हें लल्लेश्वरी और योगिनी कहकर भी संबोधित किया जाता है। कहा जाता है कि श्रीनगर के दक्षिण पूर्व के एक छोटे से गांव में लाल देद का जन्म 1320 में हुआ था। इनके माता-पिता काफी गरीब थे। बारह साल की उम्र में लाल देद का विवाह पंपूर के एक परिवार में हुआ था।
कहते हैं कि इनकी सास को इनकी शिवभक्ति पसंद नहीं थी। वह इन्हें हर समय प्रताड़ित करने का मौका खोजती रहती थी। आधा पेट भोजन मिलता था, लेकिन इसके बावजूद इनकी शिवभक्ति को खत्म करने में सास को सफलता नहीं मिली। जब इनकी सास शिवभक्ति के मार्ग में अत्यधित बाधक बनने लगी, तो 24 साल की उम्र में इन्हें घर छोड़ दिया। साधना पथ पर निकलने के बाद कुछ लोगों ने लाल देद को मंदबुद्धि कहकर उपहास भी किया क्योंकि यह नग्न घूमने लगी थीं। सूफी संत श्रीकांत के संपर्क में आने के बाद इनकी साधना और निखरती गई। जब इनकी रचनाओं को कश्मीरियों ने सुना, पढ़ा तब उन्हें पता लगा कि लल्लेश्वरी महिला सशक्तिकरण, जातिगत रूढ़ियों और कुप्रथाओं का विरोध करती हैं। उन्होंने सबको समान समझने की शिक्षा दी। सन 1392 में इस संत कवयित्री की कश्मीर में मृत्यु हो गई।

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