Tuesday, May 28, 2013

मरवा देगा श्रीसंतवा

-अशोक मिश्र 
आफिस में बैठा खबरों की कतरब्योंत कर रहा था कि मेरा मोबाइल किसी हलाल होते बकरे की तरह चिंचियाया। मैंने लपककर उसे उठाया। अपने कर्ण पटल तक लाकर बड़े प्यार से कहा, ‘हेलो..!’ उधर से गुर्राती हुई आवाज कानों में इस तरह घुसी मानो कानों के पर्दे को फाड़ देगी, ‘कहां हो इस समय...और कौन-कौन कलमुहियां हैं तुम्हारे साथ?’ मैंने आम भारतीय पतियों की तरह गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘कोई तो नहीं है मेरे साथ...और फिर गॉटर की मम्मी...आॅफिस में कौन हो सकता है? तुम्हें ऐसा क्यों लगा कि इस समय मेरे साथ कोई हो सकता है?’ मैंने मामले की पूंछ पकड़ने की फिराक में पत्नी से दरियाफ्त किया। उधर से एक बार फिर गुर्राती हुई आवाज आई, ‘सुनो जी...अगर मैंने आपके बारे में कुछ ऐसा-वैसा किसी से सुना, अखबार या चैनल पर कुछ दिखाई पड़ा या मुझे ही कोई सुबूत मिल गया, तो एक बात याद रखना...मुझसे बुरा कोई नहीं होगा आपके लिए?’
‘यार मामला क्या है? यह तो बताओ... खामुख्वाह मुझ जैसे शरीफ आदमी पर तुम झांसी की रानी की तरह चढ़ाई किए हुए हो। मैं तुम्हें पहले भी कई बार बता चुका हूं कि मैं रसिक मिजाज का हूं, अय्याश नहीं हूं। हां, ससुराल में सालियों, सलहजों, मोहल्ले में भाभियों से हंसी-ठिठोली कर लेता हूं। कुछ मेरी फ्रेंड हैं, उनसे तुम्हारे ही सामने कुछ हल्के-फुल्के मजाक कर लेता हूं, इसका मतलब यह नहीं है कि तुम मेरी इज्जत का फालूदा बनाकर चौराहे पर बेचती फिरो। यार मैंने तुमसे शादी की है, कोई गुलामी का पट्टा नहीं लिखवा लिया है।’ मैं भी भगोने में चढ़ी दाल की तरह उबल पड़ा। मेरा मन हुआ कि मोबाइल का स्विच आॅफ कर दूं, लेकिन फिर अपनी स्थिति का ख्याल आया। भारत में ही नहीं, पूरी दुनिया में किसी पति नामधारी जीव की यह हिम्मत नहीं हो सकती है कि वह अपनी पत्नी की कॉल बीच में काट दे। दुनिया के सबसे श्क्तिशाली राष्ट्र के राष्ट्रपति बराक ओबामा से लेकर लाठी और लंगोट पहनकर ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला देने वाले महात्मा गांधी तक अपनी पत्नी से घिघियाकर बात करते हैं/करते थे। ‘ज्यादा भाव मत खाओ...आपको और आपकी रसिकता को मैं अच्छी तरह से समझती हूं। पिछले चौदह वर्षों से देख रही हूं आपकी रसिकता। रसिकता की आड़ में आप जो कुछ भी करते हैं, वह मैं बहुत अच्छी तरह से समझती हूं। मेरा मुंह मत खुलवाइए। मुझसे ज्यादा उड़िए भी मत...और यह बताइए कि सचमुच आॅफिस में ही हैं या कहीं और किसी कलमुंही के साथ गुलछर्रे उड़ा रहे हैं।’ अब शायद पत्नी का भी ब्लड प्रेशर हाई होने लगा। वह कूकर में लगी सीटी की तरह फुंफकारती हुई बोलीं, ‘अगर आपकी बात सच है, तो एक मरदूद मेरे पास पैसा लेकर क्यों आया है? कहता है कि ये पांच सौ बत्तीस रुपये आपके हैं। सच सच बताना, यह रुपये कैसे हैं और किस बात के हैं? अगर कहीं कोई गड़बड़-सड़बड़ बात हुई, तो समझ लेना...आपका भले ही कुछ न हो, लेकिन मैं तो जहर खाकर किसी कुएं-खाई में कूदकर जान दे दूंगी...हां।’ पत्नी की यह बात सुनकर मैं घबरा गया। आॅफिस में फुल वाल्यूम पर चल रहे एसी के बावजूद मुझे पसीना आ गया। मैंने जल्दी से हड़बड़ाते हुए कहा, ‘यार...तुम कह क्या रही हो? मेरी समझ में नहीं आ रहा है। कौन से पैसे और कैसे पैसे? और फिर...मान लो, यह पैसे मैंने ही भिजवाए हैं, तो इसमें कौन-सी आफत आ गई। तुम भी खामुख्वाह बात का बतंगड़ बना देती हो।’
‘सुनिए...जब तक पकड़ा नहीं गया था, तब तक श्रीसंतवा और चंदीलवा भी सारी दुनिया से यही कहता फिरता था कि मैं बहुत ‘आॅनेस्ट’ क्रिकेटर हूं। देश के लिए खेलता हूं, देश से बढ़कर कुछ नहीं है...पैसा तो हाथ की मैल है, इधर आता है, उधर चला जाता है...अब जब पकड़ा गया है, तो बाप रे...कैसे-कैसे कारनामे उजागर हो रहे हैं। पिद्दी भर का छोरा...और ऐसे-ऐसे कारनामे?’ उधर, पत्नी ने किस तरह आश्चर्य से मुंह फाड़ा होगा, इसकी मैं कल्पना कर सकता हूं। मैंने पत्नी की बात में संशोधन किया, ‘पिद्दी भर का नहीं... 23-24 साल का युवक...।’ पत्नी ने झिड़कते हुए कहां, ‘हां...हां...युवक...आप भी तो बड़े खिलाड़ी रहे हैं, कैसे-कैसे गुल खिलाते रहे होंगे, कौन जानता है। अब भी क्या आप अपनी हरकतों से बाज आते हैं।’ मैंने पत्नी को समझाते हुए कहा, ‘सुनो! गॉटर की मम्मी...यह पैसे किसी फिक्सिंग-विक्सिंग के नहीं हैं। राम बहल ने पिछले महीने पांच सौ कुछ रुपये मुझसे उधार लिए थे, वही लौटाने आया होगा। मैं नहीं मिला, तो वह तुम्हें दे गया होगा। तुम्हीं सोचो...मैं एक मामूली-सा व्यंग्यकार किसी से क्या फिक्सिंग कर सकता हूं। मैं अपनी सबसे सुंदर साली की कसम खाकर कह रहा हूं कि इस वक्त मैं आॅफिस में हूं, मेरे साथ कोई दुधमुंही या कलमुंही नहीं है। मुझे अब बख्शो...शाम को घर आता हूं, तो बातें होगीं।’ इतना कहकर मैंने बात खत्म की और चेहरे पर चुहचुहा आए पसीने को पोंछते हुए बुदबुदाया, ‘यह श्रीसंतवा...मरवा देगा किसी दिन हम जैसे सीधे-शरीफ लोगों को। करता खुद है...और शक के घेरे में रहते हम सब हैं।’

Tuesday, May 21, 2013

दिल बदतमीज...दिल बदतमीज

-अशोक मिश्र
मैं अपने दिल का क्या करूं? कई बार तो मुझे भी अपने-आप पर कोफ्त होने लगती है। सोचता हूं, भगवान ने भी क्या झंझट पाल दिया। अगर पंप हाउस की तरह सिर्फ रक्त इधर से उधर लाने-ले जाने का काम ही दिल का होता, तो गनीमत थी। लेकिन भगवान को पता नहीं क्या सूझी कि उन्होंने कुछ और भी काम सौंप दिए बेचारे दिल को। नामुराद दिल... किसी शोषित-पीड़ित श्रमिक की तरह उफ भी नहीं कर पाया। एक तो पहले से ही दिल पर काम का बोझ इतना ज्यादा है कि वह चौबीसों घंटे अनवरत काम करता रहता है। नो मेडिकल लीव, अर्नलीव, कैजुअल लीव या वीकली आॅफ। वह सारे अंगों की तरह सोते समय आराम भी नहीं कर सकता। खुदा न खास्ता! अगर वह आराम की सोचे भी, तो समझो कयामत आ गई। इधर दिल ने फुरसत से टांग फैलाई, उधर ‘राम नाम सत्य है’ कोरस गान शुरू हो जाता है। जब से भगवान ने दिल को रक्त प्रवाह के सनातनी कार्य के साथ-साथ ‘लगने और लगाने’ की छूट दी है, तब से गड़बड़ होने लगी है। हालात इतने खराब हैं कि अब किसी भी उम्र में किसी पर भी दिल आने लगा है। पहले तो यह बात नीम-हकीमों, ओझा-गुनियों, ज्ञानी-अज्ञानियों की समझ में नहीं आई। भला किसी का किसी पर दिल कैसे आ सकता है? लेकिन नहीं साहब! ...जिसका किसी पर दिल आया हो, वह दावे के साथ बता सकता है कि जनाब! सचमुच दिल किसी पर भी आ सकता है। हां, कुछ लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते हैं, कह देते हैं, ‘जाने दो यार...दिल तो बच्चा है जी, थोड़ा कच्चा है जी।’
मैं तो यह भी नहीं कह सकता हूं कि दिल तो बच्चा है जी।...बच्चा होता, तो दिल लगाता? दिल लगाना बड़ों का काम है, बच्चों का नहीं। हां, इधर कुछ सालों में ‘दिल बदतमीज...दिल बदतमीज...माने ना’ जैसा जरूर हो गया है। आप लाख समझाइए, लेकिन दिल है कि उसी ओर भागता है जिस ओर जाने से मना किया जाता है। बचपन से लेकर आज तक बड़े-बूढ़े समझाते आए हैं कि किसी को घूरना, उसे एकटक निहारना, गलत है, अभद्रता है। अब तो कानून भी पास हो गया है कि आधा मिनट से ज्यादा किसी महिला या लड़की को घूरने पर सजा हो जाएगी। अगर आप इस राज को राज रहने देने का वायदा करें, तो मैं आपको एक ऐसा नुस्खा बता सकता हूं जिससे आप इस कानून की गिरफ्त में आने बच सकते हैं। आप चाहें, तो उनतीस सेकेंड तक घूरने के बाद एकाध सेकेंड का ब्रेक लें और फिर अगले उनतीस सेकेंड तक बड़े प्रेम से घूरिए। ऐसा करने पर कानून क्या, कानून का बाप भी आपका बाल बांका नहीं कर पाएगा। यह क्रम आप तब तक चला सकते हैं, जब तक आपकी इच्छा हो या फिर जिसे आप घूर रहे हैं, वह चली न जाए।
मेरी इस दशा को देखकर पत्नी कई बार समझा चुकी हैं। कभी प्यार से, कभी तकरार से। सत्तर बार तो वे अपनी कसम दे चुकी हैं, तो बहत्तर बार मायके जाने का अल्टीमेटम। पत्नी की गुहार पर अड़ोसी-पड़ोसी भी समझा-बुझाकर थक चुके हैं। पत्नी का खैरख्वाह बनने के चक्कर में तो कई अड़ोसी मुझसे भिड़ चुके हैं, तो कई पड़ोसी लट्ठलट्ठा कर चुके हैं। बच्चे अभी छोटे हैं, लेकिन उन्हें भी अब लोगों के बीच बैठने-उठने में संकोच होने लगा है। वे बाहर खेलने भी नहीं जाते हैं, क्योंकि उनके दोस्त झगड़ा होने पर मेरा ही ताना देते हैं। आॅफिस का तो हाल ही मत पूछिए। थोड़ी-सी गलती होने पर संपादक जी तंज कसते हैं, ‘काम में तो दिल लगता नहीं है। हथेली पर दिल लिए घूमते हो। जब और जहां कोई सुमुखी, मृगनयनी, प्रीत पयस्विनी मिली, तो लगे दिल बांटने। ‘तू भी ले...तू भी ले’ वाली स्टाइल में। जब दिल सबको बांटते फिरोगे, तो काम के लायक दिल बचेगा ही कहां? काम में फिर दिल लगेगा कैसे?’
अब लोगों को कैसे समझाऊं कि यह किसी महिला या लड़की से दिल लगाने या घूरने का मामला नहीं है। अब आपको बताऊंगा, तो आप भी हंसेंगे। मेरे पड़ोस में रहता है कल्लू घोसी। उसकी एक नई नवेली दुल्हन है। कुछ ही दिन पहले हुए विवाह में उसे एक महिषी यानी भैंस दहेज में मिली है। उस भैंस को निहारना मुझे पता नहीं क्यों अच्छा लगता है। मैं घंटों उसे देखकर सोचता रहता हूं कि जब यह महिषी है, तो प्राचीन काल में राजाओं ने अपनी रानियों को राजमहिषी क्यों कहा? बस, इसी सवाल का जवाब पाने को घंटों उस महिषी को निहारता रहता हूं, पता नहीं कब कोई क्लू मिल जाए और राजमहिषी पदवी प्रदान करने की गुत्थी सुलझ जाए, लेकिन लोग हैं कि यही समझते हैं कि मैं कल्लू घोसी की नई नवेली दुलहन को घूरता रहता हूं। पत्नी भी यही समझती है। कोई बताओ कि मैं सबको यह बात कैसे समझाऊं?

Friday, May 17, 2013

दीदी! भांजे को मत लाना

अशोक मिश्र
मेरी पत्नी पिछले दो सप्ताह से कान खाए जा रही थीं, ‘सुनिए...आपको छुट्टी मिल जाएगी न! कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि पिछली बार की तरह आपका मुआ बॉस अपनी छुट्टियां बीवी-बच्चों के साथ मनाने हल्द्वानी चला जाए और आपको कलम घिसने के लिए सड़ी गर्मी में छोड़ जाए।’ मैंने चेहरे पर परमहंसी मुस्कान चिपकाते हुए कहा, ‘नहीं प्राण वल्लभे!...प्राण प्रगल्भे! इस बार ठोंक-बजाकर छुट्टी ली है। पूरे आॅफिस में घूम-घूमकर सबको बताया है कि फलां तारीख से अमुक तारीख तक आॅफिस में कोई छुट्टी नहीं लेगा। अभी कल ही साहब के सामने दांत चियारकर उन्हें याद दिलाया है कि सर इस बार छुट्टी पर जाने की बारी मेरी है। पिछली बार भाभी जी की जिद की वजह से आपको हल्द्वानी जाना पड़ गया था और मुझे ऐन वक्त पर अपना प्रोग्राम कैंसिल करना पड़ा था। इस बार कुछ लोचा हुआ, तो समझिए, सर...मैं हलाल हो जाऊंगा। मेरी बीवी इस बार अपने मायके जाना चाहती है।’
मेरी बात सुनकर घरैतिन आश्वस्त हो गईं। मैंने घरैतिन का हाथ पकड़कर बगल में बैठाते हुए कहा, ‘जानती हो, स्वसुर नंदिनी...! मेरी बात सुनकर संपादक जी ने पहले तो मुझे ऊपर से नीचे तक घूरा। फिर बोले थे, बीवी चाहे तुम्हारी हो या मेरी...प्रसन्न हों तो प्राणप्यारी। अगर तनिक भी ऊंच-नीच हो जाए, प्राणप्यासी। निश्चिंत रहो... इस बार लकी ड्रॉ तुम्हारे ही नाम निकला है। जाओ... मौज करो।’ मेरे स्वस्तिवचन सुनकर घरैतिन गदगद हो गईं। उन्होंने गले में बाहों का हार पहनाते हुए कहा, ‘तुम्हें वर माला पहनाकर मैंने शायद पहली बार कोई सही फैसला लिया था। अच्छा यह बताओ...मैं नीली वाली साड़ी रख लूं या फिरोजी वाली...तुम्हें कौन-सी अच्छी लगती है। अच्छा छोड़ो...यह बताओ...तुम क्या पहनकर चलोगे? तुमने तो अपनी तैयारी की ही नहीं। पिछली बार की तरह बस यों ही मुंह उठाकर मत चल देना। इन दिनों अंबाला वाले जीजा और जीजी भी आए हुए हैं। कुरुक्षेत्र वाले जीजा भी बस कल शाम तक पहुंच जाएंगे। इस बार कोई बढ़िया-सा सूट बनवा लो..अभी तीन दिन बाकी हैं जाने में। न हो, तो अभी चलो मार्केट से कुछ कपड़ों की खरीदारी कर ली जाए।’ पत्नी ने प्यार की अविरल गंगा बहाते हुए कहा था।
मैंने परिहास करते हुए कहा,‘रहने दो यार! यह सब कुछ करने को...मैं लाल वाली शर्ट पहन लूंगा और तहमद (लुंगी) बांध लूंगा। दुनिया की नजर में मैं भले ही कुछ होऊं, लेकिन तुम्हारे लिए तो मैं कुली ही हंू। सूटकेस, बैग और थैले हमेशा की तरह मुझे ही उठाकर ले जाने हैं। गाड़ी रुकते ही तुम्हारे बेटी-बेटे तो बाहर की ओर भाग लेते हैं। बैग या थैला पकड़ने को कहो, तुम कहती हो... मेरा मायके में इस तरह सामान उठाकर जाना शोभा नहीं देता। अब बचा मैं, तो मैं कुली की तरह सारा सामान उठाकर रेलवे स्टेशन से तुम्हारे मायके तक ढोना पड़ता है। साले भी...मेरा मतलब...तुम्हारे भाई भी मुझे सामान से लदा-फंदा देख लपककर मदद नहीं करते। और नजदीक आ जाने का इंतजार करते हैं।’ मेरी बात सुनकर घरैतिन रूठ गईं।
जिस दिन हम सबको जाना था, उस दिन सुबह से ही घरैतिन हजार वॉट वाले बल्ब की तरह जलने-बुझने लगीं। बच्चों को सुबह ही उठाकर बैठा दिया। एक कप चाय के बदले मुझे भी इतने काम बताए कि मेरे होश फाख्ता हो गए। मुझे लगा कि हम लोग किसी यात्रा के बजाय रणभूमि की ओर तो नहीं प्रस्थान कर रहे हैं। घरैतिन का उत्साह देखते ही बनता था। आठ बजे घरैतिन के मोबाइल फोन की घंटी बजी, उन्होंने स्क्रीन पर नाम पढ़ते हुए मुझे बताया, ‘छोटे भइया का फोन है।’ उन्होंने मोबाइल कान में लगाते हुए कहा, ‘छोटे भइया! हम लोग बस निकलने ही वाले हैं। बारह बजे की ट्रेन है।’ उधर से छोटे भइया ने कहा, ‘दीदी! एक बात कहूं। आप लोग आएं, आपका स्वागत है। लेकिन एक रिक्वेस्ट है, भांजे को मत लाना। आजकल मामाओं की कुंडली पर भांजे की शनि ढइया भारी है। भांजा यहां आएगा, तो अनर्थ ही अनर्थ कराएगा। पता नहीं कब और कहां किसी से सेटिंग कर बैठे और मामा की भट्ठी बुझ जाए। वैसे, दीदी...अब तक मामा ही भांजे पर भारी पड़ते रहे हैं। कंस मामा...शकुनि मामा...मामा मारीचि...ये जगप्रसिद्ध मामा हैं, जिनकी कुंडली का राहु भांजे के बृहस्पति पर भारी पड़ा था, लेकिन इस कलियुग में सब उल्टा-पुल्टा हो गया है। अब मामाओं को भांजे से खतरा हो गया है। भांजा खुद तो जेल जा ही रहा है, मामाओं की भी थू-थू करा रहा है। प्लीज दीदी..इस बार गुट्टू को मत लाना..जब शनि का ढइया खत्म हो जाए, तब देखा जाएगा।’ फोन सुनते ही घरैतिन सोफे पर पसर गईं, ‘रहने दो..कहीं नहीं जाना है..जहां मेरा बेटा नहीं जा सकता, वहां मैं भी नहीं जाऊंगी।’ घरैतिन की बात सुनकर मैंने संतोष की सांस ली।

Tuesday, May 7, 2013

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रोमांचक रेल यात्रा

अशोक मिश्र 
मैं हांफता-कांपता गोंडा जाने के लिए नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंचा, तो वहां पहले से मौजूद वरिष्ठ पत्रकार सुखहरण जी ने बताया कि हम दोनों में से किसी का भी टिकट कन्फर्म नहीं हो पाया है। मैं गुस्से से चीख पड़ा, ‘आपने तो कहा था, पीएमओ से हो जाएगा, रेलमंत्री कार्यालय से हो जाएगा। ये मंत्री करा देंगे, वे विधायक करा देंगे...अब क्या हुआ?’ सुखहरण जी ने झुंझलाते हुए कहा, ‘एक बात समझो, नहीं हो पाया...तो नहीं हो पाया। प्रधानमंत्री जी कनाडा गए हैं गिल्ली डंडा मैच का उद्घाटन करने, रेल मंत्री जी चार्ट तैयार होने तक छुट्टी पर थे। मंत्री-विधायक सभी टूर पर गए हुए हैं।’ मैंने चारों ओर नजर दौड़ाई, लगता था कि पूरी दिल्ली सिर्फ उसी प्लेटफार्म पर जमा हो गई है। अगर सरसों भी उछाल दो, तो जमीन पर नहीं जाने वाली। मैंने खीझते हुए कहा, ‘आपने प्रयास ही नहीं किया होगा।’ मुझे भीड़ देखकर घबराहट होने लगी। मैंने सुखहरण जी से कहा, ‘आइए, लौट चलें।’ उन्होंने नाक-भौं सिकोड़ते हुए कहा, ‘बेटा प्यारे लाल! अपने तो जीवन का फलसफा भी खूब है, सौ-सौ जूते खाओ, तमाशा घुस कर देखो।’ तभी ‘धड़...धड़’ करती वैशाली एक्सप्रेस आती दिखाई दी, प्लेटफार्म पर ऐसी भगदड़ मची, मानो कहीं हालाडोला (भूकंप) आ गया हो।  मैं घबड़ाया, तो सुखहरण जी ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘बस... इतने में ही घबड़ा गए। इब्तदा-ए-सफर है रोता है क्या, आगे-आगे देखिए होता है क्या?’
किसी शायर के शेर की जिस अंदाज में उन्होंने मैय्यत निकाली, मैं दहल गया। ट्रेन आई, स्लीपर क्लास में भी भीड़ ऐसे टूट पड़ी, मानो कोई फौज सामने खड़ी दुश्मन की फौज पर टूट पड़ती है। मेरे मित्र सुखहरण जी ने बड़ी चतुराई से अपने को भीड़ प्रवाह में डाल दिया और बीस सेकेंड में वे बहते हुए डिब्बे के अंदर पहुंच गए। ‘मैं बपुरा बूढ़न डरा, रहा किनारे ठाढ़’ की तरह किनारे खड़ा भकुराता रहा। तभी एक ‘हट्टा-कट्ठा, उल्लू का पट्ठा’ टाइप का युवक आया और उसने बोगी के बाहर लगे दोनों हत्थों को पकड़ा और ‘जय बजरंग बली’ कहकर बोगी में घुसी भीड़ को धकियाया कि अंदर घुसे सारे लोग वैसे ही ‘लमलोट’ (एक दूसरे पर गिरना) हो गए, जैसे बहुत ज्यादा आंधी-पानी आने से खेत में खड़ी धान या गेहूं की फसल बिछ जाती है। अंदर पैंतालिस वर्षीया एक महिला चिल्लाई, ‘ई कौन नासाकाटा आय, हमका धक्का दिहिस है...मरी आवै वहिका। अरे...उठाव हमका।’ उस महिला ने अपने ऊपर गिरे युवक के मुंह पर अपनी दायीं टांग का प्रहार किया, तो वह युवक बिलबिला उठा। इसके बाद तो बोगी में जो कौउवा रोर मचा कि पूछिए मत। मैं अपना बैग उठाकर उस युवक के पास पहुंचा और गिड़गिड़ाया, ‘भाई साहब! आप तो बोगी में घुस ही जाएंगे, इसमें कोई शक ही नहीं है। अगर आप मुझे पहले घुस जाने दें, तो बड़ी मेहरबानी होगी।’ पहले तो उस आदमी ने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा। उसे पता नहीं मेरी दीन-हीन दशा पर रहम आया, या फिर वह वाकई दयावान था। उसने मुझे अंदर घुस जाने का इशारा किया। मैं किसी तरह अंदर पहुंचा और अपने मित्र सुखहरण जी को खोजने लगा। काफी अंदर जाने के बाद वे मुझे सफाई कर्मियों को दी जाने वाली बर्थ पर ऊपर जमे नजर आए। मुझे ऊपर आने का इशारा किया, तो मैं भी भीड़ को धकियाकर ‘जय बजरंग बली’ कहता हुआ ऊपर जाकर जम गया। ऊपर पहुंचने पर सुखहरण जी कान में फुसफुसाए, ‘दोनों लोगों का एक हजार रुपये देना होगा। इस भीड़ में तो एक हजार रुपये में जाना भी सस्ते का सौदा है।’
सुखहरण जी अपनी सफलता पर फूले नहीं समा रहे थे। सफलता की इस खुशी को बीस मिनट भी नहीं हुए थे कि काला कोट पहने कोच अटेंडेंट जी पधारे और सुखहरण जी से बोले, ‘अरे!..आप लोग ऊपर कैसे बैठ गए। खाली कीजिए बर्थ...वह बर्थ मैंने इन्हें दे दी है।’ सुखहरण जी बिगड़ गए, ‘आप कौन होते हैं यह बर्थ किसी को एलॉट करने वाले। यह बर्थ इस सफाई कर्मी को रेलवे देती है...और फिर मैं कोई फोकट में तो बैठ नहीं रहा हूं। मैं भी पत्रकार हूं, देखता हूं...कैसे कोई यह बर्थ एलॉट करता है।’ सुखहरण और कोच अटेंडेंट में खूब ‘हत्तेरे की, धत्तेरे की’ हुई, लेकिन अंतत: जीत काले कोट वाले की ही हुई। सुखहरण ने कोच अटेंडेंट को ‘चोट्टा...क्रिमिनल...’ जैसे न जाने कितनी उपाधियों से नवाजा और कोच अटेंडेंट विजयी मुद्रा में यह कहता हुआ चला गया, ‘बहुत देखे हैं, तुम जैसे पत्रकार...।’ इसके बाद मेरी और सुखहरण जी की यात्रा कैसी रही होगी, इसकी कल्पना आप कर सकते हैं। यदि आपको स्लीपर क्लास में बिना कन्फर्म टिकट लेकर रेल यात्रा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ हो, तो...?

Monday, May 6, 2013

कोई पुरस्कार दिलाओ, यार!

अशोक मिश्र 
बताओ भला...दोस्त ऐसे होते हैं, जैसे मेरे हैं? मेरे दोस्त किसी काम के नहीं हैं। सबके सब नकारा हैं। मेरे एक दोस्त हैं...कुछ-कुछ लंगोटिया यार टाइप के। लखनऊ में हम दोनों एक साथ ही कवितागीरी किया करते थे। यह दोस्त मुझे अपना दोस्त कहते नहीं थकता था। कवि गोष्ठियों और कवि सम्मेलनों में हम दोनों एक साथ ‘अनामंत्रित’ किए जाते थे। (क्योंकि हमारे सत्कर्मों के चलते कोई अपना कार्यक्रम चौपट नहीं कराना चाहता था।) फिर भी हमारी हिम्मत तो देखिए, हम सुबह उठते ही अखबारों में प्रकाशित होने वाले ‘आज के कार्यक्रम’ को देखते और जहां कहीं भी कोई कवि गोष्ठी या कवि सम्मेलन आयोजन की सूचना होती, हम वहां पहुंच जाते। हमें देखते ही आयोजक का दिल बड़ी जोर से धड़कने लगता, लेकिन उसके चेहरे से मुस्कान नहीं जाती। कई आयोजक तो बत्तीस इंची मुस्कान चेहरे पर चिपकाकर कहते, ‘आओ...आओ...मैं आप दोनों को बुलाना भूल गया था। अच्छा हुआ आप दोनों आ गए।’ लेकिन धीरे से कान में कहता, ‘कार्यक्रम चौपट मत करना।’ इसके बाद जो भी कवि आता, मेरा दोस्त ‘वाह...वाह...मरहबा...मरहबा’ ऐसे झूम-झूम कर कहता, मानो कविता का सबसे ज्यादा मजा वही उठा रहा हो। जब काव्य पाठ की मेरी बारी आती, तो उसे पता नहीं क्या हो जाता। उसके मुंह पर ऐसे ढक्कन लग जाता कि कुछ पूछिए मत! कई बार तो मुझे शुबहा होता कि कहीं वह गूंगा तो नहीं हो गया है। मैं उसकी ओर याचक निगाह डालता कि अबे...एक बार तो तालियां पीट, ‘वाह...वाह’ कह, दूसरों की तो सड़ी से सड़ी कविता पर तालियां पीट रहा था, वाह-वाह कह रहा था, लेकिन नामुराद कुछ बोलता ही नहीं था।
अभी हाल ही में वह दोस्त नोएडा की सड़कों पर भुने चने खाता मिल गया। मैंने कहा, ‘यार...मुझे भी कोई पुरस्कार-फुरस्कार दिलाओ। लोग अपने दोस्त के लिए क्या-क्या नहीं करते। तुम इतना ही कर डालो कि एकाध पद्मश्री, पद्म विभूषण, ज्ञानपीठ, यश भारती दिला ही दो।’ वह बोला, ‘यों ही दिला दें। अच्छा चल...मैं नहीं दिलाता, तो तू ही मुझे दिला दे।’ मैंने रूठते हुए कहा, ‘अबे...जा...बहुत देखे हैं तेरे जैसे दोस्त। एक तुम हो मेरे दोस्त, जो मेरी प्रसिद्धि से जलते हो। ...और एक मेरे पड़ोसी मुसद्दीलाल और उनका दोस्त नासपीटे हैं। पता है...अभी कुछ ही दिन पहले उन्होंने अपने दोस्त की प्रोफाइल साहित्य के नोबेल पुरस्कार के लिए जमा कराई है। वे अपने पैसे पर ही नोबेल चयन समिति के सदस्यों से मिलने गए। अपने दोस्त की एक मात्र कविता ‘दुख गड़ता है’ की चार-पांच हजार फोटोस्टेट प्रतियां साथ ले गया। वह तो यूपीए सरकार में बैठे एक प्रभावशाली मंत्री के माध्यम से पद्मश्री का भी जुगाड़ लगा रहा है। यदि इस बार जुगाड़ नहीं लग पाया, तो अगली जो भी सरकार बनेगी, उसमें उसका टांका एकदम फिट है। वैसे, वह कई सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं में भी अपना जाल बिछा रहा है। कल मेरे पड़ोसी मुसद्दीलाल कह रहे थे कि इस साल के अंत तक कम से कम एक दर्जन सरकारी और गैर सरकारी पुरस्कार उसे मिलने वाले हैं। वह अपने मित्र नासपीटे की इतनी प्रशंसा कर रहा था कि अब क्या बताऊं। मेरा भी मन करता है कि मैं तुम्हारी इसी तरह प्रशंसा करूं, लेकिन तुम मौका तो दो।’
‘यह बताओ...मैं तुम्हें कोई भकुआ दिखाई देता हूं? मेरे सिर पर कोई सींग उगी हुई है? मुझे तुम क्या समझते हो? अगर मुझमें इतनी ही कूबत होती, तो मैं तुम्हारे लिए भागदौड़ करने के बजाय अपने लिए भागदौड़ करता। मनमोहन चच्चा से अपनी सिफारिश करवाता, बंगाल, बिहार से लेकर कर्नाटक तक अपनी गोटी फिट कराता, ताकि इन प्रदेशों में जितने भी साहित्यिक पुरस्कार हैं, वह मुझे मिलते। और फिर कोई सूखा-सूखा सम्मान ही तो नहीं मिलता, उसके साथ रोकड़ा भी तो मिलता है। सम्मान और रोकड़ा मुझे बुरा लगता है? यह बताओ बीस साल की दोस्ती में कभी तुमसे ऐसा कहा?’ इतना कहकर मेरा दोस्त फिर चने खाने लगा। मुझे कुछ बोलता न पाकर उसने कहा, ‘फिर भी तुमने कहा है, मैं देखता हूं मेरे मोहल्ले की कमेटी तुम्हें कोई पुरस्कार दे दे, लेकिन रोकड़ा खर्च करना पड़ेगा...हां।’ इतना कहकर वह चलता बना।

Thursday, April 25, 2013

...आज पर्चा सही होगा

अशोक मिश्र 
जैसे ही आफिस के मोड़ पर गाड़ी पहुंची, तो सीधी सड़क पर काफी दूर एक गधे को खड़ा देखकर संपादक जी ने कहा,‘आज का पर्चा (प्रश्नपत्र) सही होगा?’ मैं चौंक गया। प्रतिक्रियास्वरूप तत्काल मेरे मुंह से निकला, ‘क्या मतलब?...’ संपादक जी ने गहरी मुस्कान बिखेरते हुए कहा, ‘बचपन में परीक्षा देते जाते समय अगर रास्ते में कोई गधा मिल जाता था, तो हम लोग मानते थे कि आज का पर्चा ठीक होगा।’ मैं भी गधे पर दांव खेल गया। बड़ी जोर की आवाज निकाली, ‘हूं...ऊ...तो आप भी गर्दभराजों की बदौलत पास होते रहे हैं?’ संपादक जी ने तत्काल फुलटॉस फेंकी, ‘नहीं...गधों के बल पर नहीं...पास तो मैं अपनी मेहतन और लगन के बल पर होता रहा हूं, लेकिन बात बताऊं। गधे उस समय के दौर में परीक्षार्थियों के लिए ‘चीयरगर्ल्स’ जैसी भूमिका निभाते थे। हम परीक्षार्थियों को देखते ही जिस लय और ताल में तत्कालीन गधे दुलत्तियां झाड़ते थे, गर्दभ राग अलापते थे, वह हम लोगों में नई ऊर्जा का संचार करता था। तुमने कभी क्रिकेट मैचों में चीयरगर्ल्स को कमर मटकाकर दर्शकों को उत्साहित करते देखा है? अगर नहीं, तो देखो। तब तुम्हें चीयरगर्ल्स की उपयोगिता समझ में आएगी। अच्छा, हमारे जमाने की कल्पना करो और बताओ, हम विद्यार्थियों को चीयरअप करने वाला कौन था। बापू को अपने काम-धंधों से ही फुरसत नहीं थी। फुरसत भी मिली, तो उनके अपने ऐब थे। डंड-बैठक लगाना, जमकर दूध पीना और दिन भर में सेर भर भांग खाकर मस्त रहने के सिवा उन्हें कुछ आता नहीं था। अम्मा के लिए यही बहुत था कि उनका बेटा स्कूल-कॉलेज जाता है। प्रेरक कौन था उस जमाने में? यही गर्दभराज ही न! स्कूल जाते समय मिल गए, तो आज मास्साब नहीं पीटेंगे। पर्चा देने जाते समय गधे से मुलाकात हो गई, तो पर्चा अच्छा होगा। पथप्रदर्शक कहो या प्रेरक, गधे महाराज ही थे न! अगर इन्हें देखकर हमारे कोमल मन को यह विश्वास न होता कि आज मास्साब नहीं पीटेंगे, तो क्या रमुआ, बुधई, प्रीतो, कांति जैसे लोग साक्षर हो पाते? सरकार की शिक्षा योजनाएं धूल-धूसरित हो गई होतीं और साक्षरता दर घड़ी के पेंडुलम की तरह आज भी उसी तरह झूल रही होती, जिस तरह आज से चार-पांच दशक पहले झूल रही थी।’
इतना कहकर संपादक जी सांस लेने के लिए रुके, ‘भारत में शिक्षा के प्रचार-प्रसार में जितना महत्वपूर्ण योगदान इन गधों का है, उतना किसी का नहीं। गधे टाइप विद्यार्थियों और शिक्षकों का भी नहीं।’ मैंने पूछा, ‘अच्छा एक बात बताइए, सर। क्या राजनीति में ‘चीयरगर्ल्स’ या ‘चीयरलीडर्स’ टाइप के गधे पाए जाते हैं?’
संपादक जी ने कार का शीशा गिराकर थूकने के बाद कुछ देर सोचा और फिर बोले, ‘देखो, प्रवृत्ति और पेशे के हिसाब से कहूं, तो पूरी राजनीति में ऐसे ही लोग भरे पड़े हैं। ये बडका नेता को देखकर तो चारों पैर उठाकर लोट लगाते हैं, ढेंचू-ढेंचू करके प्रशस्तिगायन करते हैं, लेकिन उन्हें जहां अपनी बिरादरी का दूसरा गधा टाइप का नेता दिखा, दुलत्तियां झाड़ने लगते हैं। किसी पार्क या चारागाह में ये मुंह मार रहे हों और दूसरा गधा आ जाए, तो फिर देखो इनका रवैया। न खुद खाएंगे, न अपनी बिरादरी वाले को खाने देंगे। दूसरा भले ही खाए भी और जाते समय चारागाह में आग लगाकर चला जाए, इन्हें संतोष रहेगा।’
‘लेकिन इनकी संख्या तो बहुत सीमित होगी?’ अब मेरी उत्सुकता चरम पर थी। गधे के पास से गुजरते समय मुझ पर पता नहीं क्या खब्त सवार हुई, मैंने हाथ निकालकर गधे की पीठ पर फेर दिया। हाथ लगते ही गर्दभराज भड़क गए। उन्होंने तिरछे होकर पता नहीं किस स्टाइल से दुलत्ती झाड़ी की कि कार की विंडो का ग्लास ‘चटाक’की आवाज करता हुआ शहीद हो गया। ऐसा होते ही संपादक जी अगिया बैताल हो गए, ‘नामाकूल, नालायक...गधे...गधे से प्यार जताने की क्या जरूरत थी? बहुत ज्यादा बिरादराना मोह जाग गया था, तो गाड़ी से उतरकर उसको गले लगाते, उससे लाड़ जताते। करवा दिया न...दो हजार का नुकसान। यह नुकसान तेरी तनख्वाह से काटकर पूरा करूंगा।’ आॅफिस के सामने गाड़ी से उतरा, तो बुदबुदा रहा था, ‘सर जी! गधे को देखने से भले ही बचपन में आपका पर्चा सही हुआ हो, लेकिन मेरा पर्चा तो बिगड़ गया। कसम खाता हूं, जो आज के बाद घर या बाहर किसी गधे को भाव दिया तो...।’ ...और महीने बाद जब तनख्वाह मिली, तो उसमें से दो हजार रुपये काट लिए गए थे।

Wednesday, April 24, 2013

पीड़ा को आवाज देती कहानियां

सुभाष झा                                                     
कोई रचनाकार तभी सफल माना जाता है, जब उसकी रचनाएं पाठकों को अपनी लगें। अपनी जैसी लगें। आस-पड़ोस की लगें। रचनाएं भी वही मौजूं होती हैं, जिससे कोई संदेश समाज को मिलता हो। जो देशकाल का प्रतिनिधित्व करता हो। इस लिहाज से दयानंद पांडेय समर्थ रचनाकार हैं। उनकी सबसे बड़ी खासियत यही है कि वे अपनी रचनाओं में नाटकी
यता को हावी नहीं होने देते। सीधे-सीधे पाठकों से संवाद करने में उनकी कलम समर्थ है। बेहतरीन शिल्प के साथ रोजमर्रा घटित हो रही घटनाओं को वे बड़ी तल्खी से उजागर करने में माहिर हैं। ऐसे ही तमाम पक्षों को समेटते हुए उनकी पुस्तक है ‘फेसबुक में फंसे चेहरे’।
कहानी संग्रह ‘फेसबुक में फंसे चेहरे’ शीर्षक कहानी की सबसे पहले बात की जाए, तो इसमें लेखक ने बाजार में स्याह होती संवेदनाओं को पुरजोर तरीके से पाठकों के सामने रखा है। इस कहानी के मुख्य पात्र राम सिंगार की इस चिंता से ही शुरू होती है कि आदमी के आत्म विज्ञापन की यह राह (फेसबुक) क्या उसे अकेलेपन की आह और आंधी से बचा पाएगी? अपनी कहानी में कथाकार स्वयं बताते हैं कि रामसिंगार भाई यह जानकर मुदित होते हैं कि बड़े बाबू ने अकेले ही गांव के विकास में बहुत योगदान दिया, जिससे गांव में बिजली, सड़क स्कूल आदि सुलभ हो गए हंै। राम सिंगार भाई सोचते हैं कि यह फेसबुक पर नहीं है। फेसबुक पर वे लोग हैं, जो आत्म विज्ञापन के चोंचले में डूबे हुए हैं। वहां अतिरिक्त कामुकता है, अपराध है, बेशर्मी है। ऐसे लोगों के मुखौटे उधेड़ती यह कहानी वहां खत्म होती है, जहां एक मॉडल की कुछ लिखी हुई नंगी पीठ की पोस्ट लगाते ही सौ से ज्यादा कमेंट आ जाते हैं, लेकिन जब जन सरोकार संबंधी गांव की पोस्ट लगाई जाती है, तो उस पर सिर्फ दो कमेंट आते हैं, वह भी शिकायती अंदाज में। मजे की बात यह है कि सब जानने के बाद भी राम सिंगार भाई फेसबुक पर उपस्थित हैं।
झूठे रंग-रोगन में चमकते चेहरे और बाजार मनुष्यता को किस प्रकार लील रहे हैं, उस पर तल्ख टिप्पणी कथाकार ने ‘सूर्यनाथ की मौत’ शीर्षक कहानी में की है। इस कहानी में वे बताते हैं कि एक आदमी जिस परिवेश को अपने अनुकूल नहीं समझता है, उसी में रहने के लिए किस तरह विवश होता है। इसमें मॉल कल्चर की अमानवीयता को दिखाया गया है। इसमें यह दिखाने की कोशिश की गई है कि इतना बड़ा बाजार, इतने अधिक उत्पाद मनुष्य को बौना बना रहे हैं। उनकी मौलिकता के पंख को नोचकर उनमें केवल क्रेता या विक्रेता का भाव भर रहे हैं। कहानी का नायक सूर्यनाथ है, प्रकाशमान, न्यायी और खरा है, इसीलिए वह धीरे-धीरे मौत की ओर खिसक रहा है। कहानी में एक बार नायक के मन में आता है कि ‘बिरला भवन’ में ‘गांधी स्मृति’ चला जाए, जहां महात्मा गांधी को गोडसे ने गोली मारी थी, वहीं खड़ा होकर प्रार्थना के बजाय चीख-चीख कर कहे कि ‘हे गोडसे आओ, हमें और हम जैसों को भी मार डालो।’ दरअसल, इस कहानी मेंकथाकार दयानंद पांडेय देश की जनता की सबसे कमजोर और दुखती रग पर अंगुली रखते हैं। कहानी के अंत में स्वयं वे कहते हैं, ‘कोई गोडसे गोली नहीं मारता। सब व्यस्त हैं, बाजार में दाम बढ़ाने में व्यस्त हैं। सूर्यनाथ बिना गोली खाए ही मर जाते हैं।’
‘घोड वाले बाऊ साहब’ खोखले अहंकार और नैतिकता के टूटने की कहानी है। इस कहानी में झाड़-फूंक, संन्यासी, आश्रम, पुलिस स्टेशन आदि के दोगलपन का वर्णन है। ‘एक जीनियस की विवादास्पद मौत’ में कथाकार ने बड़े ही साफगोई के साथ स्वार्थ पर टिके हुए विवाहेत्तर संबंध को बयां किया है। कभी-कभी जीनियस से जीनियस किस कदर पतन के गर्त में चला जाता है, जहां मौत भी पनाह नहीं देती, उसे हत्या या आत्महत्या के दौर से गुजरना होता है, इस बात को बड़ी बेबाकीपन से बयां किया है। ‘बर्फ में फंसी मछली’ कहानी में नायक को कई लड़कियों से प्रेम, फ्लर्ट, चैटिंग और उनसे पीछा छुड़ाते हुए आखिर उसे एक रशियन लड़की से प्यार हो जाता है। रशियन पुरुषों से अतृप्त रीम्मा भारतीय पुरुष से प्यार पाना चाहती है, वह हिंदुस्तान आना चाहती है। इस कहानी का नायक देखता है कि समूचा अंतरजाल सेक्स को समर्पित है। कहानी संग्रह की सबसे लंबी कहानी ‘मैत्रोयी की मुश्किलें’ है। इसकी नायिका जितना ही प्रेम, सम्मान और सुरक्षा पाना चाहती है, उतनी ही मुश्किलों में फंसती जाती है। इसमें कथाकार ने बड़ी ही खूबी से पल-पल बदलते स्त्री-पुरुष के संबंध को पाठकों के समक्ष पेश किया है।
इस सबके बीच यदि कहानी संग्रह की पहली कहानी की जिक्र नहीं की जाए, तो पुस्तक और कहानीकार के साथ न्याय नहीं होगा। ‘हवाई पट्टी के हवा सिंह’ नामक शीर्षक कहानी में दयानंद पांडेय ने अपनी खिलदंड़े अंदाज को पाठकों से रू-ब-रू कराया है। हालांकि, इसमें अशिक्षित, बेलगाम युवाओं की समस्या उठाई गई है। गांव का चित्रण, ग्रामीण परिवेश के लोगों की सोच को लोगों के सामने रखा है। संग्रह की तमाम कहानियों और उसके कथ्य को समष्टीय में देखा जाए, तो पहली कहानी पाठकों को औरों से अलग दिखती है। यदि यह कहा जाए, तो संग्रह की सबसे कमजोर कहानी पहली कहानी ही है, तो गलत नहीं होगा।
कुछ मिलाकर कहानी संग्रह की सभी कहानियां उत्तम हैं। सही मायने में अपने पास-पड़ोस की घटनाओं पर लेखनी चलाने में दयानंद पांडेय सिद्धहस्त हैं। उनकी भाषा में प्रवाह है। प्रांजलता है। शिल्प के स्तर पर वह सशक्त हैं। संवाद अदायगी प्रभावपूर्ण है। इन सबसे बड़ी खूबी है उनकी किस्सागोई, जो उन्हें समकालीन कहानीकारों से अलग करती है। आम आदमी की पीड़ा को आवाज देने में काफी सफल हुए हैं।
पुस्तक: फेसबुक में फंसे चेहरे
लेखक: दयानंद पाण्डेय
जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि., मूल्य: रु. 350/-
पता: 5/7, डालीबाग आफिसर्स कालोनी, लखनऊ, मो. 09450246765, मो. 09450246765


Tuesday, April 16, 2013

उपन्यास ‘चिरकुट’ का एक अंश

अशोक मिश्र                                                                                                                                                एक दिन शिवाकांत आफिस पहुंचा, तो देखा कि न्यूज रूम में मजमा लगा हुआ है। सहायक संपादक प्रतुल गुप्ता, रिपोर्टर गीतिका, क्राइम रिपोर्टर सागर दत्त शुक्ल, पहले पेज के इंचार्ज नमो नारायण भारद्वाज, फीचर डिपार्टमेंट का संजीव चौहान, डिप्टी न्यूज एडीटर सुकांत अस्थाना, आईटी डिपार्टमेंट के कुछ लड़के बैठे ठहाका लगा रहे हैं। निखिलेश निखिल कथा वाचक की तरह दोनों पैर सिकोड़कर कुर्सी पर बैठे हुए हैं। पास में रखे डस्टबिन में वे बार-बार गुटखे की पीक थूकते और फिर अपनी बातों में लग जाते। 
‘तुम मुझे क्या सिखाओगे न्यूज लिखना? पहले तो यह बताओ, तुम खुद क्या हो? यू आर टोटली क्रिमिनल। तुम्हें तो बीच चौराहे पर गोली मार देनी चाहिए। इस देश में दस लोग कंटेंट के मास्टर हैं, उनमें से एक मैं भी हूं। बाकी सब जगलर हैं, लाइजनर हैं, मैनेजर हैं, लेकिन पत्रकार कोई नहीं है। क्या...पत्रकार कोई नहीं है। खुद जिंदगी भर एसपी सिंह का जूठा खाते रहे, उनकी लंगोट धोते रहे और पूरी जिंदगी एसपी सिंह को बेचते रहे। इसके सिवा तुमने किया ही क्या है जी। मुझे चले हो न्यूज समझाने। मैंने भी एसपी सिंह के साथ काम किया है।’ निखिल जी हाथ नचा-नचाकर बमक रहे थे, ‘मैं सबकी असलियत जानता हूं। इस दिल्ली में जितने भी छोटे से लेकर बड़े अखबारों के संपादक और बड़े पत्रकार हैं, उन सबकी असलियत जानता हूं। मैं तो लिखने जा रहा हूं न...इन बड़े-बड़े संपादकों पर किताब लिख रहा हूं, उसमें लिख रहा हूं न..कौन किसकी रंडी है, कौन किसका भड़ुवा है?’
निर्धारित जगह पर अपना हेलमेट रखने के बाद शिवाकांत जा पहुंचा निखिल के पास, ‘क्या हुआ भाई साहब? आप कुछ खफा दिख रहे हैं?’
डस्टबिन में गुटखा थूकने के बाद शिवाकांत की ओर अंगुली उठाकर निखिल बोले, ‘यह सब तुम्हारी ही करतूत है? क्यों जी...मुझमें न्यूजसेंस नहीं है क्या? मेरी भाषा खराब हो सकती है, मात्रा-फुलस्टाप की गलतियां हो सकती हैं, लेकिन मेरी रिपोर्ट खराब है, यह कहने वाले तुम कौन होते हो?’
एकाएक हुए हमले से शिवाकांत घबरा गया, ‘मैंने कब कहा कि आपकी रिपोर्ट खराब है? मुझसे यह क्यों कह रहे हैं? जिसने कहा है, उससे जाकर कहिए। है हिम्मत? खामख्वाह मुझे धमका रहे हैं।’ धीरे-धीरे उसका स्वर तल्ख होता गया।
‘क्या...मुझमें हिम्मत नहीं है? मेरी हिम्मत को चुनौती तो दो ही नहीं। मैं क्या कर सकता हंू, इसकी तुम लोग कल्पना भी नहीं कर सकते हो। मैं अब तक कई संपादकों को पीट चुका हूं। डीडी वन पर बहुत पहले शालिनी सिंह का एक न्यूज प्रोग्राम आता था। एक दिन किसी बात पर उसने आफिस के एक कर्मचारी पर हाथ उठा दिया। बस, मुझे गुस्सा आ गया। मैंने पकड़े उसके बाल और उसे खीचते हुए न्यूज रूम तक लाया। आज भी शालिनी सिंह के सिर के बीचोबीच कुछ जगह बाल नहीं हैं। उसके काफी बाल उखड़कर मेरे हाथ में आ गए थे।’
‘लेकिन इसमें मैं कहां से आ गया?’ शिवाकांत पूछ बैठा। 
‘नहीं..तुम नहीं...लोग कह रहे हैं। मेरे सामने कहें, तो मैं गोली मार दूं। खुद तो चोट्टे हैं, कुछ इस खबर का हिस्सा, कुछ उस खबर का हिस्सा लेकर जोड़-गांठ कर किसी तरह खबर पूरी कर ली, इधर-उधर से कापी पेस्ट कर लिया और हो गए बड़का रिपोर्टर।’ निखिल धारा प्रवाह बोलते जा रहे थे। 
प्रतुल गुप्ता ने मानो हवन में जलता लोहबान डाला, ‘सर जी...सारे लोग ऐसे ही करते हैं।’
‘बिल्कुल..ऐसा ही करते हैं। मैं तुम्हें बताऊं। सन 98 या उसके एकाध साल बाद की बात है। उन दिनों मैं बेरोजगार था। एक दिन सुबह-सुबह मेरे पास इंडिया टुडे से एक मित्र का फोन आया। मित्र ने कहा कि संपादक जी ने बुलाया है। मैं पहुंचा, तो संपादक जी ने कहा कि मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले में बड़े पैमाने पर आदिवासी धर्म परिवर्तन कर रहे हैं। मुझे इस मुद्दे पर एक बढ़िया-सी मुकम्मल रिपोर्ट चाहिए। अगर आप कर सकें, तो मैं यह आपको एसाइन कर दूं। मुझे भी पैसे की जरूरत थी। मैंने हां कर दिया। उन्होंने दस हजार रुपये दिलाए भी। चलते समय सहारा के मैगेजीन डिपार्टमेंट के हेड ने भी अलग से एक रिपोर्ट मांगी। मैं किसी तरह लस्टम-पस्टम लोगों से पूछता-पाछता झाबुआ पहुंचा। देखा, एक चर्च के सामने सभी टीवी चैनलों ने अपने ओबी वैन लगा रखे हैं। चैनलों पर टिकर और फ्लैश चल रहे थे, ‘यही है वह चर्च, जहां हुआ धर्म परिवर्तन’..‘आदिवासियों के धर्म परिवर्तन के लिए आया विदेश से पैसा’...‘खतरे में है हिंदू धर्म’..‘पांच हजार से ज्यादा आदिवासी बने ईसाई..।’ बाद में मैंने तहकीकात की, तो पता चला कि जहां धर्म परिवर्तन हुआ है, वह गांव नवापारा तो यहां से चौदह पंद्रह किमी दूर घने जंगलों में है। टीवी चैलन वाले झुट्ठै..फर्जी खबर चला रहे हैं। मन नहीं माना। पहाड़, जंगल, नदी पार करके किसी तरह दूसरे दिन नवापारा गांव पहुंचा, जहां कथित रूप से धर्म परिवर्तन हुआ था। मन में एक डर भी था कि कहीं कोई जंगली जानवर न हमला कर दे, नक्सलियों के हाथ न लग जाऊं? फिर भी, पत्रकारिता का जुनून खींचे लिए चला जा रहा था। वहां पहुंचा, तो सब तरफ सन्नाटा। एक छोटे से बच्चे को पकड़ा, उसे दस रुपये दिए। उससे पूछा, तो उसने एक छोटे से चर्च की ओर इशारा किया।’
इतना कहकर निखिल ने डस्टबिन में फिर गुटखा थूका। बोले, ‘मैं इधर उधर झांकता उस ओर बढ़ा। तभी पता नहीं कहां से चर्च का फादर प्रकट हुआ। उससे बात की, तो वह भड़क उठा। काफी देर समझाने-बुझाने और यह विश्वास दिलाने के बाद कि जो भी घटना हुई है, उसको उसी रूप में छापा जाएगा, वह बात करने को तैयार हुआ। मैंने उसे बताया कि प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तो ईसाई मिशनरियों की छवि बिगाड़ रहे हैं। काफी ना नुकुर करने के बाद उसे जो बताया, वह हैरतअंगेज था। सच बताऊं...धर्मांतरण तो हुआ था, लेकिन असली बात तो मीडिया को पता ही नहीं थी। ईसाई मिशनरियों में काम करने वाली तीन ननों के स्तन काटे गए थे। दो तो गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती थीं। उनसे मारपीट की गई थी, उन्हें लूटने की कोशिश हुई थी।’
निखिल ने जैसे ही यह बात पूरी की, प्रतुल गुप्ता ने तालियां बजाते हुए कहा, ‘यह अच्छा हुआ था। ईसाइयों और मुसलमानों के साथ ऐसा ही किया जाना चाहिए। मैं तो होता, तो बहुत कुछ करता। उन लोगों ने सिर्फ स्तन ही काटे थे।’ 
पहले पेज के इंचार्ज नमो नारायम भारद्वाज ने प्रतुल को झिड़कते हुए कहा, ‘आप हर बात और घटना को हिंदूवादी चश्मे से देखना बंद कीजिए। आपको ऐसी बात कहते हुए शर्म आनी चाहिए। आप अपने को बुद्धिजीवी कहते हैं। यदि हिंदुत्ववादी होने का इतना ही शौक है, तो दीजिए इस्तीफा और चले जाइए भाजपा या संघ में।’ 
‘अरे जाने दो...ये लोग किसी औरत की पीड़ा को क्या समझेंगे। पत्रकारिता में ऐसे लोग घुस आए हैं या कहो कि पत्रकारिता में ऐसे ही लोगों का वर्चस्व होता जा रहा है, जो समाज विरोधी हैं, मानवता विरोधी हैं। ये कहते हैं कि हम तो न्यूज के व्यापारी हैं, हमें समाज से क्या लेना देना। समाज लेकर बैठे, तो अपनी दुकान ही लुट जाएगी। सच कहता हूं, ऐसे लोगों को तो बीच चौराहे पर खड़ा करके गांड पर गोली मार देनी चाहिए।’ निखिल अपनी रौ में फिर आ गए। यह उनकी आदत है। वे जब भी बोलने लगते हैं, तो यह भूल जाते हैं कि वे कहां बैठे हैं। 
नमो नारायण ने हस्तक्षेप किया, ‘हां तो ..भाई साहब! फिर क्या हुआ?’
निखिल ने फिर पिच्च से थूक दिया, ‘हां..तो मैं कह रहा था कि उसने सात ननों को लाकर मेरे सामने पेश कर दिया। मैंने देखा, सभी ननों के शरीर पर कोई न कोई चोट के निशान अवश्य थे। मैं घबड़ा गया। मैंने पूछा कि मामला क्या है? फादर बताने लगा, पिछले कई दशक से ईसाई मिशनरियां यहां काम कर रही हैं। इन मिशनरियों में काम करने वाली ननें आदिवासियों के गांव-गांव जाकर उन्हें शिक्षित करती हैं, उनमें जागरूकता पैदा करती हैं। उनकी हर तरह से मदद करती हैं। ऐसे में वे चाहती भी हैं कि आदिवासी ईसाई हो जाएं। तभी एक लड़की ने कराहते हुए कहा, मैं भगौर गांव में दवाइयां बांटने जा रही थी, टिहिया की पांच वर्षीय बेटी हिकरी बीमार थी। तभी दूसरे गांव के पंद्रह-सोलह भील आदिवासी लाठी, कुल्हाड़ी और तीर-धनुष लेकर आए और हम पर हमला बोल दिया। उन्होंने हमें मारा-पीटा, कुल्हाड़ी से हम तीन लड़कियों के सीने पर प्रहार किया। वे हमारे पास मौजूद खाने-पीने का सामान छील ले गए। दो अस्पताल में भर्ती हैं। इसी बीच कुछ लोग आ गए, तो हमलावर भाग खड़े हुए। बाद में हम अस्पताल गए। मैंने उन सबके नाम नोट किए। मैं फादर से कहा, मैं धर्म परिवर्तन करने वालों से भी मिलना चाहता हूं। फादर ने बताया कि वे लोग तो दंगे के भय से यहां से हटा दिए गए हैं। अगर कल दोपहर तक का मौका दें, तो उनसे मिलवा सकता हूं।’
‘फिर तो मेरे पास कोई विकल्प ही नहीं था। मैं रात में उसी चर्च की बाउंड्री में सो गया। थका हुआ था, सो नींद आ रही थी। मन में भय भी था कि कहीं कोई बदमाशी न करें। अनजान इलाका था। एक तरफ आदिवासियों का खतरा था, तो दूसरी ओर नक्सलियों का। अपनी कमजोरी बता रहा हूं, चर्चा वालों पर भी पता नहीं क्यों विश्वास नहीं हो रहा था। खैर..नींद आई, तो सुबह तक सोता रहा। सुबह उठा, तो चर्च वालों ने ही चाय-नाश्ता करवाया। दोपहर डेड़-दो बजे तक धर्मांतरण करने वाले आदिवासी भी आ गए।’ निखिल बता रहे थे, ‘मैंने एक आदिवासी से उसका नाम पूछा।’
उस आदिवासी ने कहा, ‘फादर ने नया नाम दिया है थॉमस, वैसे नाम है झीतरा।’
‘तुमने धर्म क्यों बदल लिया?’ मेरा सवाल था। 
झीतरा उर्फ थॉमस पहले तो चुपचाप सामने देखता रहा, फिर कुछ इस तरह बोला, मानो उसकी आवाज आसपास की पहाड़ियों से टकराकर लौट रही हो..एकदम भर्राई हुई सी, ‘धर्म न बदलता, तो मर जाता। जिंदा रहूंगा, तभी न धर्म रहेगा। लाश का भी कोई धर्म होता है क्या? जब से धर्म बदला है, भरपेट खाना खा रहा हूं। इससे पहले तो मुझे याद ही नहीं था कि मैंने भरपेट खाना कब खाया था? मिशनरी वाले खाना देते हैं, बीमार पड़ने पर दवा-दारू कराते हैं। जिस धर्म में पैदा हुआ था, वे हमें दुरदुराते थे। ये हमें दुरदुराते नहीं, हमें घृणित नहीं समझते। हमारी बहू-बेटियों से बलात्कार नहीं करते। अगर हम झीतरा से थॉमस नहीं बनते, तो क्या करते। सिर्फ धर्म के सहारे तो जिंदा नहीं रहा जा सकता है, साहब! पेट तो भरना ही है न।’

सचमुच...बड़ा लुत्फ था जब...

अशोक मिश्र
(पिछले हफ्ते व्यंग्य छपते ही संपादक जी ने मुझे तलब किया और लगे डांट पिलाने। बोले, पत्रकारिता का पहला उसूल है कि खबर चाहे कितनी ही पक्की क्यों न हो, लेकिन दूसरे पक्ष का वर्जन (उसका पक्ष जाने बिना) लिए बिना खबर मुक्कमिल नहीं मानी जाती। उन्होंने आदेशात्मक लहजे में कहा, ‘जाओ, पत्नी का वर्जन लेकर आओ। नहीं तो मुझे व्यंग्य के लिए भी खंडन छापना पड़ेगा।’ सो, मरता क्या न करता। पत्नी जी के पास जाकर उनका पक्ष लिया। पेश है पत्नी द्वारा दिए गए बयान का असंपादित अंश।)
सचमुच...बड़ा लुत्फ था जब कुंवारी थीं हम सब। वे भी क्या दिन थे? सुख-दुख धूप-छांव की तरह लगते थे। बप्पा भले ही अपना फटा कुर्ता पहने सारा शहर घूम आएं, लेकिन मेरी गुÞड़िया लाना नहीं भूलते थे। गलती होने पर बप्पा तो महटिया (नजरअंदाज कर) जाते थे, लेकिन अम्मा तो अम्मा थीं, बिना कोसे उनको पानी भी हजम नहीं होता था। सुबह जागने में थोड़ी-सी भी देर हुई कि अम्मा पीठ पर ‘धप्प’ से एक धौल जमाती हुई कहती थीं, ‘बहुत नींद आवति है। पढ़िहौ-लिखिहौ ना, तो कौनो रिक्शावाले-चाट टिक्की वाले से ब्याह दी जाओगी। सुबह-शाम चूल्हा फुकिहौ, तो समझ मा आई जाई पढ़ाई का मतलब।’ मैं भी कम बदमाश नहीं थी, झट से कह बैठती, ‘मुंह झौंसे की गर्ज होगी, तो कमाकर खिलाएगा।’ तब अम्मा आंचर में मुंह छुपाकर हंसती थीं, लेकिन दिखावे में उनका गुस्सा बरकरार रहता था। सच्ची...उन दिनों नींद भी कितनी आती थी, मुए सपने भी कैसे...कैसे आते थे। सपने में ही देह फुरेहरी छोड़ने लगती थी। सुबह-सुबह जब सपने और नींद दोनों मधुर होते थे, तभी अम्मा की आवाज कानों में जैसे धमाका करती थी, ‘यह लड़की कितना सोती है। सुबह से काम करते-करते पीठ और कमर धनुष हुई जाती है, लेकिन यह निगोड़ी उठती ही नहीं।’ सच्ची कितने सुहाने दिन थे वे...। रोज सुबह होते ही किसी न किसी बात पर भाइयों से ‘ढिशुम..ढिशुम’ हो ही जाती थी। कई बार भाई पिट जाते, तो कई बार मैं। पिटने के बाद अगर छोटकू या बड़कू अम्मा के पास शिकायत लेकर पहुंच जाते, तो अम्मा ‘धाड़’ से कान के नीचे एक बजा देती थीं, ‘नासकाटे...पहले लड़त हैं, फिर चले आवत हैं शिकाइत लेकर।’
सचमुच... कई बार सोचती हूं, तो लगता है कि कहीं शादी के लड्डू में चीनी की जगह मिर्चा पीसकर तो नहीं मिलाया जाता? हाय...कितने याद आते हैं सहेलियों के साथ स्कूल-कॉलेज जाने के वे दिन। कई बार सहेलियों से तू-तू मैं-मैं और झोंटा नुचौव्वल सिर्फ इस बात को लेकर होती थी कि अभी पास से गुजरे छैलछबीले ने उसे देखा था या मुझे। लड़ने-भिड़ने के बावजूद सहेलियों की प्रेम कहानियां अकेले में भले ही बांची गई हो, लेकिन मजाल है कि किसी दूसरे को भनक भी लगी हो। कितने सपने संजोए थे हम सहेलियों ने शादी को लेकर, लेकिन अब कई बार तो लगता है कि इनसे शादी करके कोई गलती तो नहीं की। कई बार लगता है कि इनसे अच्छा तो शायद वह बनारस वाला था। बस, थोड़ा-सा एलएलटीटी था। एलएलटीटी नहीं समझे...लुकिंग लंदन, टॉकिंग टोकियो...मतलब...ऐंचातानी...भैंगा। अगर उसका यह अवगुण छोड़ दिया जाए, तो वह देखने-सुनने में इनसे तो लाख गुना अच्छा था। शादी के बाद इनके साथ शहर आई, तो लगा कि किसी पुरानी फिल्म में दिखाए गए भुतहे महल में आ गई हूं। इनका बिस्तर देखा, तो पहली बार लगा कि यह नहीं है राइट च्वाइस बेबी। यह तो महाम्लेच्छ है। साफ करने के लिए बेड पर पड़े गद्दे को उठाया, तो जितना हिस्सा पकड़ा था, वह हाथ में आ गया। दूसरा हिस्सा पकड़कर उठाया, तो परिणाम वही निकला। बाद में इन्होंने मुस्कुराते हुए बताया कि दस साल पहले जब यह गद्दा खरीदा गया था, तब से यह बेड पर वैसे ही पड़ा है, इसे उठाया या उठाकर झाड़ा-पोछा नहीं गया है। आज किसी तरह रात काटो, कल नया गद्दा आ जाएगा। जब भी हाथ-पैर धोकर बिस्तर पर चढ़ने को कहो, तो ऐसे मुंह बनाते हैं, मानो कुनैन की गोली खा ली हो।
किसी दिन इतने भारी-भारी चादर धोने पड़ जाएं, तो मैं किसी से भी शर्त बदने को तैयार हूं, अगर हफ्ते भर से पहले जो बुखार उतर जाए। यदि भूल से किसी दिन अपनी बनियान धो ली, तो ऐसे डींगें मारते हैं, मानो कोई पहाड़ उठा लिया हो। ये कई बार मुझसे कहते हैं कि तुम किसी मुनीम की तरह मुझसे दिनभर का हिसाब मत मांगा करो। अरे, जब इतनी लगाम लगा रखी है, तब तो यह हाल है। कहते हैं काबुल में हूं और होते बगदाद में हैं। दस साल की छोकरी से लेकर पचास साल की अम्मा तक को घूरने से बाज नहीं आते। इधर-उधर मुंह मारने की कोशिश करते रहते हैं, अगर छुट्टा छोड़ दिया, तो किसी सठियाए बछड़े की तरह पगहा ही तुड़ाकर भाग जाएंगे। हमें भी इनके पगहा तुड़ा लेने का डर नहीं है, लेकिन इन बच्चों का क्या होगा, यही सोचकर चुप रह जाती हूं। वरना गुलछर्रे उड़ाना सिर्फ पुरुषों को ही नहीं आता है।