बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
किसी राज्य में एक संत रहते थे। उन्होंने सोचा कि एक भव्य आश्रम का निर्माण किया जाए ताकि उनके शिष्यों को किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े। आश्रम निर्माण में लगने वाले धन को इकट्ठा करने के लिए उन्होंने लोगों के बीच जाने का फैसला किया। उन्होंने सोचा कि लोगों से सहयोग मांगने पर इतना तो जरूर बच जाएगा जिससे आश्रम की जरूरतों को भी पूरा किया जा सकता है।वह कई राज्यों में घूमे, लोगों का यहयोग भी अच्छा मिला। एक दिन जब उन्हें भटकते-भटकते शाम हो गई, तो वह एक कुटिया के सामने रुक गए। उस कुटिया में एक बुजुर्ग महिला रहती थी। उसने संत और उनके शिष्यों का स्वागत किया। किसी तरह उसने सबके लिए भोजन की व्यवस्था की। सबने सुस्वादु भोजन किया। इसके बाद उसने एक तख्त पर दरी बिछाई और संत से उस पर लेटने का आग्रह किया।
वह महिला खुद एक चटाई बिछाकर जमीन पर सो गई। लेटते ही उसे गहरी नींद आ गई। रात में संत को बेचैनी महसूस होने लगी। वह उठकर बैठ गए। उन्हें नींद नहीं आ रही थी। उन्हें मुलायम गद्दे पर सोने की आदत थी। खुरदरी दरी पर सोने से उन्हें परेशानी हो रही थी। अगले दिन महिला सुबह उठी। उसने सबके लिए भोजन का प्रबंध किया। उसने थोड़ी देर पूजा-अर्चना की।
खाली समय में पड़ोस के बच्चों को बुलाकर उन्हें कहानियां सुनाई। संत ने उस महिला से कहा कि कल रात में मुझे दरी पर नींद नहीं आई, लेकिन तुम्हें जमीन पर कैसे नींद आ गई। उस महिला ने कहा कि मैं अपना भोजन जुटाने के लिए मेहनत करती हूं। मैं अपनी जरूरत से ज्यादा की कामना भी नहीं करती। मैं संतोष करती हूं। इस वजह से मुझे नींद आ जाती है।
संत ने मन में सोचा कि यह महिला जमीन पर सोकर भी सुखी है और मैं भव्य आश्रम बनवाने की फेर में दर दर भटक रहा हूं। उस रात संत को गहरी नींद आई और वह अपने आश्रम लौट गए।


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