अशोक मिश्रएक नवंबर को दिल्ली में इंडिया गठबंधन की रामलीला मैदान वाली महारैली और एनडीए की पश्चिमी दिल्ली में निकाली गई पदयात्रा, दोनों एक साथ चलीं। दोनों पक्षों ने अपने-अपने नैरेटिव को मजबूती से पेश करने की कोशिश की। इंडिया गठबंधन का मुख्य नैरेटिव ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ या ‘चलो दिल्ली’ के इर्द-गिर्द घूमता रहा, जिसमें कथित वोट चोरी, मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन में अनियमितताएं और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग प्रमुख थी। राहुल गांधी, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव समेत कई बड़े नेताओं ने खुली गाड़ियों में मार्च किया, झंडे-बैनर लहराए गए और नारे गूंजे।
आयोजकों ने लाखों की भीड़ का दावा किया जबकि पुलिस अनुमान करीब पचास हजार का रहा। वैसे इस महारैली में कई प्रदेशों के लोग भारी संख्या में शामिल हुए जिसमें युवा, बुजुर्ग, महिलाएं और हर समुदाय के लोगों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। रैली ने विपक्षी एकजुटता का प्रदर्शन जरूर किया। महारैली ने मीडिया में अच्छा कवरेज पाया, लेकिन वास्तविक संख्या पर विवाद रहा। कुछ सहयोगी दलों की दूरी (खासकर आम आदमी पार्टी) ने पूर्ण एकता की तस्वीर को थोड़ा धुंधला किया। यह नैरेटिव अपने मूल समर्थकों और विपक्षी खेमे में तो मजबूत हुआ, लेकिन व्यापक जनता या तटस्थ वर्ग तक कितना पहुंचा, यह अभी स्पष्ट नहीं।
चुनाव आयोग या सरकार पर तत्काल दबाव बनाने में यह सीमित रहा। इंडिया गठबंधन ने इस दिन को प्रतीकात्मक तौर पर चुना। रामलीला मैदान वही जगह है जहां से आंदोलन राष्ट्रीय चर्चा बनते हैं। गठबंधन का आरोप था कि देश में 'वोट चोरी' और वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की आड़ में लोकतंत्र को कमजोर किया जा रहा है। इसी मुद्दे पर मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे तक की मांग उठाई गई। कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष ने इसके लिए 10 लाख तक लोगों के जुटने का दावा किया और राहुल गांधी सहित गठबंधन के सभी बड़े चेहरों को मंच पर उतारा। सुबह मिंटो रोड-कनॉट प्लेस चौराहे से मार्च निकालकर भीड़ को मैदान तक लाने की योजना बनाई गई, ताकि रैली सिर्फ एक सभा न होकर एक शक्ति प्रदर्शन लगे। इंडिया गठबंधन का नैरेटिव आंशिक रूप से मजबूत था, लेकिन पूरी तरह निर्णायक या व्यापक रूप से प्रभावी नहीं कहा जा सकता।
वोट चोरी, मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन में कथित गड़बड़ी और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग—यह मूल संदेश साफ, भावनात्मक और विपक्षी खेमे के लिए आकर्षक था। वहीं एनडीए ने पश्चिमी दिल्ली के हरि नगर से तिलक नगर की ओर पदयात्रा निकाली, जिसमें 1984 के सिख विरोधी दंगों के पीड़ितों को याद करने और कांग्रेस पर संवेदनहीनता का आरोप लगाने पर जोर दिया गया। हरदीप सिंह पुरी, दिल्ली मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता समेत नेताओं और सिख समुदाय के लोगों ने इसमें हिस्सा लिया। यह ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ अभियान का हिस्सा था। एनडीए का नैरेटिव इतिहास की याद दिलाते हुए विपक्ष को दोहरे मापदंड का आरोप लगाते हुए चलाया गया कि वे उसी तारीख के आसपास राजनीतिक रैली कर रहे हैं, जब सिख समुदाय के घाव ताजा हो जाते हैं। यह कदम इंडिया गठबंधन की रैली को अकेले समाचार चक्र पर हावी होने से रोकने में सफल रहा और एक समानांतर चर्चा खड़ी कर दी।
सिख समुदाय और अपने कोर बेस में यह नैरेटिव प्रभावी रहा, क्योंकि यह भावनात्मक और ऐतिहासिक स्मृतियों से जुड़ा था। पूरे देश में इसी थीम पर कार्यक्रमों की श्रृंखला चलाने की योजना ने इसे स्थानीय घटना से आगे बढ़ाया। अब सवाल है कि कौन किस पर भारी रहा, तो इसका जवाब संख्या से ज्यादा संदेश में छिपा है। इंडिया गठबंधन भारी रहा नैरेटिव और सेंट्रलाइजेशन में। एक ही मैदान, एक ही मंच, एक ही मुद्दा-वोट चोरी। इससे मीडिया का पूरा फोकस दिल्ली पर केंद्रित हो गया, कैमरे रामलीला मैदान पर रहे और विपक्ष एकजुटता दिखाने में सफल रहा। इस तरह के केंद्रीकृत आयोजन से कार्यकर्ताओं में भावनात्मक उभार ज्यादा आता है, जो आने वाले चुनावों में बूथ तक ले जाने लायक ऊर्जा देता है।
भाजपा भारी रही विस्तार और काउंटर-मोबिलाइजेशन में। उसने विपक्ष की रैली को दिल्ली तक सीमित नहीं रहने दिया। जिस दिन विपक्ष दिल्ली में भीड़ जुटा रहा था, उसी दिन भाजपा ने रोहतक, फरीदाबाद, दिल्ली के हरी नगर और देश के अन्य जिलों में पदयात्रा का आयोजन किया। भाजपा का तर्क सीधा था कि विपक्षी गठबंधन के मुद्दे को वह स्थानीय स्तर पर 'अराजकता' बनाम 'स्थिरता' की बहस में बदल देगी। पदयात्रा का मॉडल संघ और भाजपा के पुराने जनसंपर्क अभियान की याद दिलाता है, जहां छोटे-छोटे संपर्कों से बड़ा जनमत बनता है। एक महीने तक चलने वाला यह अभियान एक दिन की रैली की चमक को फीका करने की दीर्घकालिक रणनीति है। कुल मिलाकर देखा जाए तो 1 नवंबर को सुर्खियों पर कब्जा इंडिया गठबंधन का रहा, क्योंकि रामलीला मैदान की महारैली का दृश्य और पैमाना पदयात्रा के बिखरे हुए दृश्यों से ज्यादा टेलीविजन फ्रेंडली था। लेकिन जमीन पर असर के लिहाज से भाजपा की पदयात्रा ने विपक्ष के नैरेटिव को सिर्फ दिल्ली तक सीमित रखने से रोक दिया और उसे हर राज्य में चुनौती देने का आधार तैयार कर दिया। एक ने भीड़ से ताकत दिखाई, दूसरे ने सड़कों से घेराबंदी की।


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