Tuesday, August 27, 2013

मुस्टंडा डॉलर, पिलपिला रुपइया

-अशोक मिश्र 
भाई डॉलर! इन दिनों आप हमारे देश में बहुत भाव खा रहे हैं। सुना है, जब तक आपके आका इशारा नहीं करेंगे, आप इसी तरह भाव खाते रहेंगे। आपको शायद पता हो कि हमारे देश में एक बहुत पुरानी कहावत है, ‘खुदा मेहरबान, तो गधा पहलवान।’ ठीक है साहब! खा लीजिए भाव, जब तक आपके खुदा आप पर मेहरबान हैं। हां, एक बात आपको बतानी थी कि आपके भाव खाने से हमारे देश की अर्थव्यवस्था का हाजमा जरूर बिगड़ गया है। खाया-पिया सब कुछ बाहर आ रहा है। कहने का मतलब यह है कि हमारी अर्थव्यवस्था ने अब तक जितना भी डॉलर कबीरदास की सीख ‘खाए खर्चे जो बचे, तौ जोरिये करोर’ मानते हुए खाने-खर्चने के बाद बचा रखा था, वह भी खर्च होता जा रहा है। घर की भूजी-भांग भी खर्च होती जा रही है, इसी चिंता में बेचारी अर्थव्यवस्था दुबली होती जा रही है। मेरे प्यारे भाई डॉलर! आज तुमारे भाव चढ़ रहे हों, तो तुम इतरा रहे हैं, भाव खा रहे हो, खाओ। तुम्हारा समय है। आज तुम मुस्टंडों की तरह सीना तान कर इस देश में दनदनाते घूम रहे हो और मैं पिलपिलाया हुआ एक कोने में पड़ा सिसक रहा हूं।
भाई! एक बात बताऊं। यह वक्त-वक्त की बात है। कभी नाव पानी पर, तो कभी पानी नाव पर। यह वही देश है, जिसे तुम दुनिया वाले ‘सोने की चिड़िया’ कहते नहीं अघाते थे। हमारे यहां भिखमंगों की तरह आते थे और हम उदारतापूर्वक सोना, चांदी आदि को मिट्टी समझते हुए तुम्हें उपहार में देते थे। हमारे देश में इतना सोना, चांदी, जवाहरात भरा पड़ा था कि हमारे देश के बच्चे सोने-चांदी की गोलियां बनाकर खेलते थे। फिल्म ‘उपकार’ में मनोज कुमार ने जब गाया कि ‘मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती।’ तब तुम पश्चिमी देशों को पता चला कि तुम कितने गिरे हुए हो। तुम कितने गरीब हो। डॉलर भाई! एक बार सोचकर देखो, जब हमारे देश के खेतों में सोना, चांदी, हीरे-जवाहरात पाए जाते थे, तो क्या हमारे देश के लोग घर उठा ले जाते थे? नहीं...वे उसे भी मिट्टी समझकर खेतों में ही छोड़ आते थे। हमारे देश के लोग तुम पश्चिम वालों की तरह लालची नहीं हैं और न कभी थे। हमने सोने-चांदी में अन्न उगाए हैं। भाई मुस्टंडे डॉलर! यह बात तुम्हें शायद पता नहीं होगी? अगर पता होती, तो मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूं कि तुम अपनी औकात में रहते और हमें भी योगियों की तरह अलमस्त होकर भगवान का भजन करने देते। अगर हमारे देश का इतिहास उठाकर देखो, तो तुम अपने चढ़ते भाव पर इतराना छोड़ दोगे या अपने आका से बगावत कर जाओगे। यह देश वैसे भी ‘माया’ से दूर रहने वाला रहा है। हमारे यहां तुम्हारी क्या औकात रही है, इसको तुम इस बात से समझ सकते हो। हमारे देश में जितने भी समझदार लोग हैं, वे अपने रुपये-पैसे को पास रखकर अपने दीन-ईमान को खराब नहीं करना चाहते हैं, इसीलिए खाने और खर्च करने से जो भी माया अर्थात रुपये-पैसे बच जाते हैं, वह स्विस बैंक में एक दानखाता खोलकर जमा करा देते हैं। न रहेगी बांस, न बजेगी बांसुरी। जब माया-मोह का कारण बनने वाला रुपया-पैसा अपने देश में रहेगा ही नहीं, तो वे मोहग्रस्त कैसे होंगे। मोह-माया से बचने का इतना धांसू आइडिया आपके देश वालों को कभी सूझा? या कभी सूझ पाएगा? नहीं...न!
दरअसल, बात यह है कि आप थोड़े में ही इतरा जाने वाले लोगों के साथ रहते-रहते बिगड़ गए हैं। साठ पार क्या पहुंचे, सठियाने लगे? हमारे यहां साठ साल का आदमी जवान माना जाता है। विश्वास न हो, तो हमारे देश के साठ पार नेताओं, अभिनेताओं, साधु-संतों की करतूतों को देख लो। वे जवानों को भी मात करते हैं। हमारे देश के नौजवान जिन बातों और करतूतों पर शर्म महसूस करते हैं, उसे करने में हमारे ये साठ वर्षीय जवान तनिक भी नहीं लजाते। तुम पश्चिम वालों की यही तो खराबी है कि जरा सी बात पर इतराना शुरू कर देते हो। मुझे याद है, तुम्हारे एक राष्ट्रपति जरा-सा बौराए, तो तुम अमेरिकियों ने आसमान सिर पर उठा लिया था। हमारे यहां देखो। तुम्हारे राष्ट्रपति के भी बाप बैठे हैं। हमने कभी हो-हल्ला मचाया? यह सब तो हमारे जीवन का हिस्सा है। हमारे देश में यह कहावत सदियों पुरानी है कि ‘साठा, तब पाठा’ अर्थात आदमी जब साठ साल का होता है, तो वह किसी बछड़े-सा नौजवान हो जाता है। इस उक्ति को चरितार्थ करने वाले सिर्फ आपको हमारे ही देश में मिलेंगे। अगर बाकी देशों में कोई ऐसा करता है, तो जरूर उसके वंशज भारतीय रहे होंगे या फिर उन्होंने किसी भारतीय से ही प्रेरणा ली होगी। भाई डॉलर! इसलिए आपको बहुत ज्यादा इतराने की जरूरत नहीं है। मुझे साठ-सत्तर के स्तर तक पहुंचाकर कोई तीर नहीं मार लिया है। यह तो मेरी स्वाभाविक जवानी है। कभी अपने को जवान समझकर भिड़ने की कोशिश की, तो मुंह की खाओगे। इसलिए मेरी सलाह है, अब इतराना बंद करके अपनी औकात में आ जाओ, वरना अगर मैं तुम्हें औकात बताने पर तुल गया, तो तुम पर और तुम्हारे आका पर भारी पड़ेगा।

Wednesday, August 21, 2013

दंगों में लहूलुहान होती है इंसानियत

बनारस में हुआ था देश का संभवत: पहला सांप्रदायिक दंगा

-अशोक मिश्र 
सांप्रदायिक दंगों के दौरान इंसानियत होती है शर्मसार। उस देश का इतिहास इंसान के भीतर छिपे बैठे हैवान की करतूत देखकर किसी कोने में बैठकर सिसकता है। समाज और राष्ट्र की इज्जत को हत्या, लूट और बलात्कार जैसी घटनाएं तार-तार कर देती हैं। सांप्रदायिक दंगे इंसान के विवेक को हर लेते हैं। वह पड़ोसी जो कल तक भाई था, दोस्त था, हमदम था, जिसकी थाली से रोटी खाते समय कोई दुराग्रह नहीं था। जरूरत पड़ने पर जो पड़ोसी किसी सच्चे हमदर्द और मित्र की तरह संकट की घड़ी में चौबीस घंटे खड़े रहने को तैयार था, लेकिन धार्मिक कट्टरता की एक मामूली सी चिंगारी इन मानवीय संवेदना को जलाकर खाक कर देती है। जो हिंदू-मुसलमान कल तक एक अच्छे पड़ोसी थे, आज एक दूसरे के कट्टर शत्रु नजर आते हैं। देश के कुछ हिस्सों में इन दिनों यही हो रहा है। मानवता के दामन पर इतने बड़े-बड़े और घिनौने दाग लगाए जा रहे हैं कि लोग त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। 
वैसे, अगर हम इतिहास पर गंभीर और गहरी नजर डालें, तो पाते हैं कि भारत में सांप्रदायिक दंगों का इतिहास काफी पुराना है। हिंदू-मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक हिंसा की घटना आज से दो सौ चार साल पहले सन 1809 में भी घट चुकी है। इसे आधुनिक भारत का संभवत: पहला हिंदू-मुस्लिम दंगा भी कहा जा सकता है। इस दंगे की आधारशिला बनी थी वाराणसी जिले में स्थित ईदगाह और हनुमान टीले के बीच की विवादित जमीन। इस विवादित जमीन को कोई भी पक्ष छोड़ने को तैयार नहीं था। तत्कालीन ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्ता-धर्ता भी नहीं चाहते थे कि यह मामला सुलझे। वे बराबर इस प्रयास में थे कि किस तरह जमीन विवाद रूपी चिंगारी को हवा देकर विशाल दावानल का रूप दिया जाए। और उन्हें अपने इस प्रयास में सफलता भी मिली, क्योंकि भारतीय इतिहास में इस घटना को प्रथम हिंदू-मुसलमान दंगे के रूप में दर्ज जो होना था। हिंदुओं और मुसलमानों ने एक दूसरे के खून से 1809 में पहली होली खेली। दोनों पक्ष के कई लोग मारे गए, काफी संख्या में लोग घायल हुए और दंगा शांत कराने के नाम पर ईस्ट इंडिया कंपनी ने हिंदू-मुसलमानों का भरपूर दमन किया। इस घटना से हिंदू और मुसलमानों ने शायद सबक सीखा और सन 1857 के गदर में एक दूसरे का भरपूर साथ दिया। वे कंधे से कंधा मिलाकर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लड़े। उनका यह सांप्रदायिक सद्भाव अंग्रेजों को खटकने लगा। इस गदर के बाद वे बराबर इस प्रयास में रहे कि किसी तरह हिंदू-मुसलमानों की एकता को तार-तार किया जाए।
उन्हें सफलता मिली सन 1905 में। लार्ड कर्जन ने हिंदू-मुस्लिम एकता को विखंडित करने के लिए सबसे पहले देश के वृहद प्रदेश बंगाल के विभाजन की घोषणा की। 16 अक्टूबर 1905 को लार्ड कर्जन ने बंगाल विभाजन की घोषणा करते हुए कहा, बंगाल में हिंदुओं को अल्पसंख्यक और मुसलमानों को बहुसंख्यक बनाने के लिए प्रदेश विभाजन जरूरी था। मालूम हो कि पूर्वी बंगाल में मुसलमानों की आबादी हिंदुओं की अपेक्षा ज्यादा थी। घोषणा के एक साल पूर्व से ही पूर्वी बंगाल का गर्वनर बैम्फाइल्ड पूरे बंगाल में यह कहता घूम रहा था कि उसके दो बीवियां हैं। एक हिंदू और दूसरी मुसलमान। मैं दूसरी को सबसे अधिक प्यार करता हूं। यह स्पष्ट रूप से हिंदुओं और मुसलमानों को आपस में लड़ाने की घृणित चाल थी। लार्ड रोनाल्डशे के मुताबिक, इस विभाजन से बंगाली राष्ट्रीयता की बढ़ती हुई शक्ति को चकनाचूर करने का प्रयास किया गया। प्रसिद्ध इतिहासकार एसी मजूमदार के मुताबिक, लार्ड कर्जन के भड़काने पर पूर्वी बंगाल में भीषण दंगे हुए। इस दंगे की साजिश रची ढाका के नवाब सलीमउल्ला खान ने। उसने ढाका के कारागार में सजायाफ्ता मुजरिमों की सजा माफ करते हुए कहा कि वे जाकर ढाका में बदअमनी फैलाएं। कारागार से रिहा किए गए एक मुसलमान अपराधी ने ढाका की भीड़ भरी सड़कों पर मुसलमानों को संबोधित करते हुए नवाब की तरफ से यह सूचना पढ़ी कि ब्रिटिश सरकार और ढाका के नवाब बहादुर सलीम उल्ला की आज्ञानुसार यदि कोई मुसलमान हिंदुओं को लूटने, उनकी हत्या करने, उनकी महिलाओं से बलात्कार करने का दोषी पाया जाता है, तो उसे दंडित नहीं किया जाएगा। नतीजा यह हुआ कि इस भीड़ ने काली मंदिर पर हमला करके मूर्तियों को तहस-नहस करने के साथ-साथ आसपास के हिंदू व्यापारियों को लूट लिया। हिंदू स्त्रियों का अपहरण कर उनके साथ बलात्कार किया गया और हिंदू व्यापारी मुसलमानों पर जवाबी हमला करने में भी लापरवाही बरतते रहे। इस मामले में ढाका नवाब सलीम उल्ला खां का स्वार्थ यह था कि उसे अंग्रेजों ने एक लाख पौंड का ब्याज रहित कर्ज दे रखा था। भविष्य में भी एक मोटी रकन देने का आश्वासन अंग्रेजों ने दिया था। इससे साथ ही साथ वह अंग्रेजों से मिलकर अपनी रियासत बचाए रहना चाहता था। इस दंगे ने हिंदू-मुसलमानों के बीच एक ऐसी दरार डाल दी, जो कालांतर में मुस्लीम लीग, अकाली दल, हिंदू महासभा, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के गठन का आधार बनी। ढाका दंगे के एक साल बाद 1906 में ढाका नवाब सलीम उल्ला खां और दूसरे मुस्लिम नेताओं ने मिलकर मुस्लिम लीग का गठन किया और बाद में यही संगठन द्विराष्ट्र के सिद्धांत के प्रचार-प्रसार में सहायक बना।
इसके बाद हुआ सन 1931 में कानपुर में दंगा। इस दंगे ने यशस्वी पत्रकार, स्वाधीनता   संग्राम सेनानी गणेशशंकर विद्यार्थी की बलि ले ली। कानपुर में भड़की सांप्रदायिक हिंसा की आग को बुझाने की कोशिश में ही गणेश शंकर विद्यार्थी शहीद हो गए। कानपुर में दंगे का कारण बना महात्मा गांधी द्वारा आहूत सविनय अवज्ञा आंदोलन। सन 1931 में महात्मा गांधी के निर्देश पर अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन के तहत कानपुर बंद का आह्वान किया था। उन दिनों कानपुर की कॉटन मिलों में हड़ताल के कारण उत्पादन ठप पड़ा था। व्यापारियों के गोदामों में जमा माल ही बेचा जा रहा था। जब सविनय अवज्ञा आंदोलन के चलते काफी दिनों तक दुकानों को बंद करने की नौबत आई, तो व्यापारियों को घाटा होने लगा। मालूम हो कि उन दिनों कानपुर में कपड़े के ज्यादातर व्यापारी मुसलमान थे। मुस्लिम व्यापारी जब ज्यादा घाटा सहने की स्थिति में नहीं रहे, तो उन्होंने दुकानें खोल दीं। इससे कांग्रेसी भड़क उठे। मुस्लिम व्यापारियों से ‘तू-तू, मैं-मैं’ से शुरू हुई बातचीत, बाद में झड़प, मारपीट में तब्दील हुई और फिर सांप्रदायिकता की आग में पूरा कानपुर जल उठा। हजारों दुकानें लूट ली गईं, सैकड़ों दुकानों को आग के हवाले कर दिया गया। काफी संख्या में हिंदू-मुसलमान मारे गए, सैकड़ों घायल हुए। और इसी सांप्रदायिकता की आग ने ओजस्वी पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी को निगल लिया।
बीसवीं सदी में शायद दुनिया का सबसे बड़ा दंगा भारत-पाक विभाजन के दौरान हुआ था। कहा जाता है कि इस दंगे में लगभग दस लाख लोग मारे गए थे, तीस लाख लोग घायल हुए थे। अरबों रुपये की संपत्ति तहस-नहस या लूट ली गई थी। कई सौ सालों से भाई-भाई की तरह रह रहे लोग एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए। 15 अगस्त 1947 की सांप्रदायिक हिंसा की आग में झुलसने वालों और उसे अपनी आंख से देखने वालों ने कालांतर में जो संस्मरण, उपन्यास, कहानी आदि लिखे, उससे पता चलता है कि उस दौरान मानवता को हैवानों ने पैरों तले बर्बरतापूर्ण तरीके से रौंदा था। कहा जाता है कि भारत और पाकिस्तान से आने-जाने वाली रेलगाड़ियों, ट्रकों, बसों और दूसरे वाहनों में सिर्फ लाशें ही भरी रहती थीं। लाखों महिलाओं और लड़कियों से बलात्कार किए गए, उनके स्तन काट लिए गए, उनके निजी अंगों में नोकीले और धारदार हथियार भोंके गए। लाखों लड़कियों का इस पार और उस पार रहने वालों ने अपहरण कर लिया। यह बर्बर अत्याचार देखकर मानवता भी कराह उठी। खुशवंत सिंह के उपन्यास ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ और भीष्म साहनी के उपन्यास ‘तमस’, यशपाल का ‘झूठा सच’, सआदत हसन मंटों की कहानी ‘खोल दो’ पढ़कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। जिन लोगों ने यह त्रासदी भोगी होगी, उनकी पीड़ा का अंदाजा लगाया जा सकता है। दंगे किसी के लिए भी सुखद नहीं होते हैं। दंगे किसी तरह की सुखानुभूति नहीं कराते, दंगे देते हैं सिर्फ घाव, पीड़ा, अपमान और जलालत। अब भी समय है, अगर दंगों का होना रोका जा सकते, तो यह मानवता की सबसे बड़ी सेवा होगी।

Tuesday, August 20, 2013

सियासत में तो गुंडे मस्ट हैं

-अशोक मिश्र
दिल्ली के लुटियन जोन के किसी सुनसान पार्क में सर्वगुटीय बैठक हो रही थी। किसिम-किसिम के ठग, उठाईगीर, चोर-उचक्के, गुंडे और पॉकेटमार जमा थे। गली-कूंचे के टुटपुंजिया टाइप के छुटभैय्ये पॉकेटमार, उठाईगीरों से लेकर अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त एक भाई के प्रतिनिधि सलमान खिर्ची भी बैठक में भाग ले रहे थे। आतंकवादी संगठनों को अमानवीय और देशद्रोही मानते हुए बैठक में नहीं बुलाया गया था। बैठक में भाग ले रहे लोगों का मानना था कि वे कानून भले ही तोड़ते हों, लेकिन आतंकवादियों की तरह मानव और राष्ट्र विरोधी नहीं है। वे अपने देश से उतना ही प्यार करते हैं, जितना एक राष्ट्रभक्त। भारत के प्रख्यात पॉकेटमार उस्ताद मुजरिम को बैठक का अध्यक्ष मनोनीत किया गया था। सभा की कार्रवाई शुरू होने से पहले सभी प्रतिनिधियों और पदाधिकारियों ने ‘भारत के कानून विरोधी तत्वों एक हो!..एक हो’ के नारे लगाए। अध्यक्ष महोदय के मंचासीन होते ही बैठक की कार्रवाई शुरू हुई।
कार्यक्रम के संचालन का भार दाउद इब्राहिम के प्रतिनिधि सलमान खिर्ची को सौंपा गया। जर्मन मेड टेलिस्कोपिक गन से बीस राउंड फायरिंग करने के बाद सलमान खिर्ची ने कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए कहा, ‘राजनीति के अंग-संग रहने वाले मेरे अराजक साथियो! इन दिनों हम सभी भाइयों पर एक बड़ा संकट मंडरा रहा है। इस देश की न्यायपालिका कहती है कि समाज में चोर नहीं चाहिए, उचक्के नहीं चाहिए, पॉकेटमार नहीं चाहिए, ड्रग पैडलर नहीं चाहिए, माफिया नहीं चाहिए, हत्यारे नहीं चाहिए। हम इस बैठक के माध्यम से अदालत से विनम्रतापूर्वक पूछना चाहते हैं, अगर समाज में ये सब नहीं चाहिए, तो फिर चाहिए क्या? अगर हम सबको इस देश और समाज से निकाल दिया जाए, तो बचेगा ही समाज में क्या? अगर देश में समाज, व्यवस्था और सद्भावना नाम की कोई चीज है, तो हम उठाईगीरों, पाकेटमारों, चोर-उचक्कों और गुंडों की ही बदौलत है, वरना इस देश में हमारे भी बाप नेता हैं और या फिर नपुंसक जनता। इन्हीं मुद्दों पर विचार-विमर्श करने के लिए हम सब लोग आज देश की राजधानी दिल्ली के दिल लुटियन जोन में इकट्ठा हुए हैं। इन सब बातों पर प्रकाश डालने के लिए मैं प्रख्यात पॉकेटमार और बैठक के अध्यक्ष उस्ताद मुजरिम के पट्टशिष्य उस्ताद गुनाहगार को आमंत्रित करता हूं।’
अगली कतार में बैठे उस्ताद गुनाहगार ने माइक संभाला, ‘मेरे प्रिय साथियो! सचमुच... खिर्ची भाई ने एक बहुत ही गंभीर मुद्दा उठाया है। पूरा समाज तीन हिस्सों में बंटा हुआ है। पहले हिस्से में हम जैसे लोग हैं। हम जैसे लोगों से मतलब है, जिन्हें समाज में चोर, उचक्का, बटमार, पॉकेटमार, अपराधी, गुंडा, माफिया, हत्यारा कहा जाता है। हम लोग सच में कानून का उल्लंघन करते हैं। पैसा मिलने पर हथियार, नशीले पदार्थ और हर वह वस्तु बेचते हैं, जिनको बेचने पर कानून रोक लगाता है। हम जो भी करते हैं, बड़ी ईमानदारी से करते हैं। अगर हमारे शूटर भाई किसी की हत्या की सुपारी लेते हैं, तो फिर उसे शूट करके ही मानते हैं। उनके लिए सिर्फ टारगेट होता है, वह टारगेट कोई भी हो सकता है। यह तो धंधा है, लेकिन धंधे में दगाबाजी हमारी फितरत नहीं है। दूसरे हिस्से में आते हैं नेता, मंत्री और नौकरशाह। कुछ मामलों में ये हमारे भी बाप हैं। हम तो प्रतिबंधित वस्तुओं को ही बेचकर अपना पेट भरते हैं। इन्हें जब भी मौका मिलता है, तो संसद और विधानसभाओं में सत्यनिष्ठा, गोपनीयता और ईमानदारी की कसम खाने वाले अपना ईमान तक बेच देते हैं। खुद ही गोपनीय फाइलों को लीक करवाकर विरोधी को घेरते हैं। आस्था और प्रतिबद्धता को कौड़ियों के भाव बेच देना, नेताओं का शगल है। बेईमानी और लूट-खसोट तो इनकी रगों में खून बनकर दौड़ता है। इस समुदाय के लोग खुद ही भ्रष्टाचार को प्रश्रय देते हैं और खुद ही हल्ला मचाते हैं। आज से दो-तीन दशक पहले नेता गुंडों को पालते थे, उनके सहारे सत्ता पर काबिज होते थे। आज ये खुद गुंडे और नेता की दोहरी भूमिका में हैं। नेता जब तक गुंडा पालने की स्थिति में रहता है, तब तक पालता है। बाद में वह खुद दोहरी भूमिका में आ जाता है। इस बात को आप लोग इस तरह से समझें कि राजनीति में गुंडे तो मस्ट हैं, राजनीति और गुंडई का चोली-दामन का संबंध है। एक के बिना दूसरा अधूरा है। दोनों के बीच अन्योनाश्रित संबंध है। कहने का मतलब नेता ही गुंडा है और गुंडा ही नेता है।’
इतना कहकर गुनाहगार सांस लेने के लिए रुके, ‘बाकी हिस्से में नपुंसक जनता आता है। मैं नपुंसक इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि भगत सिंह, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारियों को इस जनता पर बहुत भरोसा था कि आजादी के बाद नेताओं, नौकरशाहों, पूंजीपतियों के कान पकड़कर जब चाहेंगे, इनकी औकात बता देंगे। अफसोस कि क्रांतिकारियों की अपेक्षाओं पर जनता खरी नहीं उतरी। पिछले छाछठ सालों से नेता और उनके लगुए-भगुए अपनी मनमानी करते आ रहे हैं और वह जनता हर पांचवें साल सांप नाथ या नाग नाथ में से किसी एक को चुनकर अपना नपुंसक दायित्व पूरा कर लेती है। जब पूरी व्यवस्था भ्रष्ट है, तो क्रांति क्यों नहीं करती यह नपुंसक जनता? यह आज का सबसे बड़ा सवाल है।’ इसके बाद पूरी बैठक इसी मुद्दे के   इर्द-गिर्द घूमती रही।

Sunday, August 18, 2013

दंगा

कौन हो तुम?
दंगा..
कहीं दूर से आए हो?
मेरे लिए कुछ लाए हो?
हां
गरीबी, बेकारी, भुखमरी, तबाही, खून का सैलाब
साथ में हैं मेरे
नरमुंड बेहिसाब।
क्योंकि जब मैं भड़कता हूं,
शहर का शहर साफ कर देता हूं
इसीलिए तो नेताओं का चेहता हूं।
मगर
तुम तो नंगे हो?
हमाम में तो सभी नंगे हैं
इसीलिए गली-गली, शहर-शहर, गांव-गांव दंगे हैं।
-अशोक मिश्र

Wednesday, August 14, 2013

‘टीटी’ मतलब टोपी ट्रांसफर

-अशोक मिश्र 
बढ़ती तोंद से चिंतातुर होकर मैंने सुबह-सुबह उठकर पार्क में टहलना क्या शुरू किया, मानो मुसीबत मोल ले ली। घरैतिन सुबह चार बजे सज-धज कर निकलता देख सशंकित हुईं और बोली, ‘किसी से मिलने का वायदा किया है क्या सुबह-सुबह?’ घरैतिन की बात सुनकर मैं झल्ला उठा। उसी झल्लाहट में मैं बाहर निकल आया। पार्क जाने के बजाय सड़क पर ही बड़बड़ाता हुआ टहलने लगा। तभी एक दस वर्षीय बच्चा मेरे सामने आ खड़ा हुआ। उसने पूछा, ‘अंकल! टोपी पहनने का क्या मतलब होता है?’ बच्चे की मासूमियत पर मेरा गुस्सा काफूर हो गया। मैंने बत्तीस इंची मुस्कान बिखेरते हुए कहा, ‘बेटा! यह एक मुहावरा है। टोपी पहनने का मतलब है कि किसी की मुसीबत को ‘आ बैल मुझे मार’ की तरह अपने सिर पर ओढ़ लेना।’ मेरी बात सुनकर बच्चा किसी नामुराद की तरह मुंह ताकने लगा। बोला, ‘अंकल! उदाहरण सहित समझाते तो और अच्छा था।’
मैंने प्राइमरी स्कूल के अध्यापक की तरह समझाने का प्रयास किया, ‘बेटा! मैं अपना उदाहरण दूं। मेरी एक अदद घरैतिन है। घरैतिन का मतलब समझते हो न! बीवी। इस दुनिया में बीवी वह शै है, जो अपने पति को जब तक दिन में तीन-चार बार टोपी न पहना दे, तब तक उसे खाना ही हजम नहीं होता। बढ़ती तोंद को कम करने के लिए मैं पिछले चार-पांच हफ्ते से रोज मार्निंग वॉक पर निकलता हूं। पता नहीं क्यों? उसे विश्वास ही नहीं होता कि मैं वाकई वॉक पर निकलता हूं। मैं अपनी बीवी की फितरत को जानता था, लेकिन इसके बावजूद मार्निंग वॉक पर निकलने की टोपी मैंने पहन ली। और नतीजा यह हुआ कि आज बीवी ने टोक ही दिया।’ मेरी बात सुनकर बच्चे ने बात को समझ जाने वाले अंदाज में सिर हिलाते हुए कहा, ‘टोपी पहनाना भी कोई मुहावरा है, अंकल? जरा इसको भी समझाइए।’
घरैतिन द्वारा सुबह-सुबह किए गए व्यंग्य को भूलकर मैं उसे समझाने लगा, ‘इसका मतलब टोपी पहनने से मिलता जुलता है। इसमें फर्क इतना है कि टोपी पहनने में जाने-अनजाने कोई व्यक्ति मुसीबत अपने सिर पर ओढ़ता है, टोपी पहनाने में कोई घुटा हुआ कांइया व्यक्ति अपनी मुसीबत दूसरे के सिर पर लाद देता है। अब तुम इस बात को राजनीतिक घटनाक्रमों से समझने का प्रयास करो। तुम्हारे ‘मामा’ को गोल टोपियों से दूर रहने की नसीहत उनकी ही पार्टी के कई पुरोधा नेता दे चुके थे। एक नेता तो उनके सामने एक आदर्श भी पेश कर चुके थे। उनकी पार्टी के एक मुख्यमंत्री ने जब चार दिन का सद्भाव उपवास रखा था, तो कुछ गोल टोपी वाले पहुंच गए थे टोपी पहनाने। लेकिन मजाल है, कोई उस मुख्यमंत्री को टोपी पहना सके। गोल टोपी को देखते ही उस मुख्यमंत्री ने अपने दोनों हाथ सिर पर इस तरह रख लिया कि कोई उन्हें टोपी पहना ही न सके। टोपी पहनने वालों ने उनसे टोपी पहनने की अपील की, तो उन्होंने मीडिया के ही सामने टोपी पहनने से मना कर दिया। लेकिन ‘बच्चों के मामा’ यह नहीं समझ पाए और एक फिल्मी अभिनेता से टोपी पहन ली। अब उनकी ही पार्टी के नेता उनको पानी पी-पीकर गरिया रहे हैं। कोस रहे हैं। फिल्मी अभिनेता को नामुराद बताकर छाती पीट रहे है। दूसरी पार्टी वाले ‘आग लगाकर जमालो बी दूर खड़ी’ वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए तमाशा देख रहे हैं।’
मेरी बात सुनकर बच्चा मुस्कुराया और बोला, ‘अंकल! मैं ‘टोपी पहनने और पहनाने’ का खेल समझ गया। अब देखता हूं, स्कूल में मेरे दोस्त कैसे मुझे टोपी पहनाते हैं। उल्टा अब मैं ही उन्हें टोपी पहनाऊंगा।’ बच्चे की बात सुनकर मैंने गहरी सांस ली और कहा, ‘लेकिन बेटा! टीटी से सावधान रहना।’ बच्चा चौंका, ‘टीटी मतलब?’ मैंने बताया, ‘टीटी मतलब टोपी ट्रांसफर।’ बच्चे के चेहरे पर उत्सुकता के भाव देखकर मैंने समझाया, ‘अब तुम इस बात का मतलब इस तरह समझो। जब देश आजाद नहीं हुआ था, तो अंग्रेजों के लिए इस देश के क्रांतिकारी मुसीबत साबित हो रहे थे। क्रांतिकारी देश की जनता में अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति की अलख जगा रहे थे। अंग्रेज इस बात को समझ गए कि अब ज्यादा दिन उनका दाना-पानी इस देश में संभव नहीं है। जाते-जाते अंग्रेजों ने टीटी करने की सोची। उन्होंने भ्रष्टाचार का एक नन्हा-सा पौधा रोपा। जब पौधा फल देने की स्थिति में हुआ, तो भ्रष्टाचार रूपी मुसीबत की टोपी को वे कांग्रेस के सिर पर ट्रांसफर करके चले गए। तब से वह पौधा फल-फूल रहा है। कांग्रेसियों और अन्य दलों ने टोपी ट्रांसफर की कला का कालांतर में काफी विकास किया और तब से देश के सभी राजनीतिक दल टोपी ट्रांसफर करते चले आ रहे हैं। मेरे कहने का मतलब है कि इस देश में जो भी पार्टी सत्ता में आती है, वह झट से मुसीबत की टोपी दूसरे के सिर पर ट्रांसफर कर देती है और खुद पांच साल तक रबड़ी छानती है। मेरा ख्याल है कि अब तुम्हें टीटी का मतलब अच्छी तरह से समझ में आ गया होगा?’ बच्चे ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘आपका यह सबक जिंदगी भर याद रखूंगा, अंकल। थैक्स यू।’ और वह अपने रास्ते चल गया।

Saturday, August 10, 2013

प्रश्नपत्र में सौ टंच माल

अशोक मिश्र 
कल आफिस से निकला, तो चाय पीने का मन हुआ। आफिस के सामने ही स्थित चाय की दुकान पर गया। चाय वाले ने बाहर रखे स्टूल पर बैठने का इशारा किया और चाय बनाने में मशगूल हो गया। स्टूल के पास ही नोएडा के ही किसी स्कूल की रद्दी में बेची गई उत्तर पुस्तिकाएं पड़ी हुई थीं। उत्सुकतावश एक उत्तर पुस्तिका मैंने उठा ली। बारहवीं कक्षा के कॉमर्स विषय के परीक्षार्थी ने उत्तर के ऊपर प्रश्न भी लिखा था। सबसे ज्यादा आश्चर्य तो मुझे तीसरे प्रश्न पर हुआ। परीक्षा में पूछा गया था, ‘सौ टंच माल की उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए और वर्तमान संदर्भों में सौ टंच माल की उपयोगिता बताइए।’ प्रश्न पढ़कर मैं जितना चौंका था, उससे ज्यादा मजेदार उत्तर परीक्षार्थी ने दिया था। अपने पाठकों के लिए परीक्षार्थी द्वारा लिखे गए जवाब को बिना संपादित किए प्रस्तुत किया जा रहा है।
परीक्षार्थी ने लिखा था, ‘वैसे तो ‘सौ टंच माल’ शब्द का ज्यादातर उपयोग उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, बिहार, छत्तीसगढ़ इलाके में व्यवसाय करने वाले सुनार सोने की शुद्धता के संदर्भ में करते हैं। सौ टंक माल का निहितार्थ यह है कि अमुक सोना सौ फीसदी शुद्ध और खरा है। इसमें मिलावट नहीं की गई है। सामाजिक जीवन में इस शब्द का उपयोग महिलाओं के ‘टनाटन’ होने या न होने के अर्थ में किया जाता है। अब आप मेरे पड़ोस में रहने वाली छबीली आंटी को ही लें। मेरी दृष्टि से वे ‘बहत्तर टंच माल’ हैं। वैसे, तो वे सुंदर हैं, जवान हैं, सबसे हंस कर बोलती हैं। मोहल्ले के सारे जवान उनसे बतियाने को लालायित रहते हैं। बतरस (किसी सुंदर महिला से मीठी-मीठी बातें करके रस लेना) की लालच में मेरे पिता जी भी कई बार आॅफिस से आते या आॅफिस जाते समय उनके घर के सामने अपना खटारा स्कूटर खड़ा करके दस-पंद्रह मिनट गुजार ही लेते हैं। खुदा न खास्ता, अगर उसी समय मेरी मम्मी बाहर निकल आती हैं, तो वे स्कूटर को आड़ा-तिरछा करके ऐसा जाहिर करने लगते हैं, मानो वह चलते-चलते बंद हो गया हो या फिर पेट्रोल खत्म हो गया हो अथवा कोई दूसरी खराबी आ गई हो। उस समय छबीली आंटी भी मुस्कुराती हुई अंदर चली जाती हैं। मम्मी पहले तो दुर्गा की तरह पापा को घूरती हैं और पापा के खटारा लेकर आगे बढ़ जाने पर अंदर चली जाती हैं। अब अगर मेरी दृष्टि से देखा जाए, तो छबीली आंटी सत्तर टंच माल हैं। वैसे, मेरे पापा से अगर पूछा जाए, तो उनके मुताबिक छबीली आंटी सौ टंच माल ही होंगी। मेरी बात से एक बात यह साबित होती है कि ‘टंच’ वह शब्द है, जिसका अर्थ, संदर्भ और प्रसंग बदल जाने पर बदल जाता है। कोई भी माल कितना टंच है, यह जौहरी द्वारा मुनाफा कमाने की दर और ‘बट्टे’ पर निर्भर करता है। कुछ जौहरी किसी माल पर पांच फीसदी बट्टा काटते हैं, तो कोई दस। कुछ ऐसे भी जौहरी हैं, जो पूरा माल ही बट्टे में हजम कर जाते हैं। अगर मैं जौहरी होता, तो छबीली आंटी के मामले में तीस फीसदी ‘बट्टा’ वसूलता। यही वजह है कि मैंने सत्तर टंच माल ही छबीली आंटी को माना है।’
इसके बाद नया पैराग्राफ बनाकर लिखा गया था, ‘मेरे घर के पीछे की साइड में रहने वाली ‘कल्लो भटियारिन’ सौ टंच माल है। आप मोहल्ले के किशोर से लेकर बुजुर्ग तक राय शुमारी करवा लें, कल्लो को कोई भी सौ टंच से नीचे नहीं कहेगा। वैसे, तो उसकी उम्र अभी बाइस साल ही है, एकदम पटाखा है, लेकिन उसके दर्शन को मेरे घर की दायीं तरफ रहने वाले बासठ वर्षीय मुंहबोले नाना जी, मेरे घर के सामने रहने वाले सत्तर वर्षीय ताया जी, एकदम पड़ोस में रहने वाले चालीस वर्षीय चाचा जी किसी न किसी बहाने चावल, चना, मक्के का दाना, गेहूं भुजाने चले जाते हैं। दरअसल, कल्लो घर पर ही भाड़ झोंकने (भड़भूजे का काम) का काम करती है। मेरा चचेरा भाई दुखहरन कल्लो के घर के सामने से गुजरते हुए यह जरूर गाता है, ‘गोरी करौ न गुरूर, गोरी करौ न गुरूर, तुहैं लै चलब जरूर...दुपहरिया मा।’ एक दिन मैंने उससे पूछा, तो उसने खिलखिलाते हुए कहा, कल्लो पांच सौ टंच माल है। 
उत्तर पुस्तिका निरीक्षक महोदय, मैं अभी नाबालिग हूं, इस वजह से मैं भाई दुखहरन के इस अपहरण गीत का भावार्थ नहीं समझ सका। मैंने उससे पूछा, तो उसने मेरे गाल पर दो कंटाप जमाने के बाद भगा दिया। मैं कंटाप के चलते लाल हो गए गाल को सहलाता हुआ घर लौट आया था। यही वजह है कि मैं इस अपहरण गीत की व्याख्या नहीं कर सकता। वैसे, एक बात बताऊं, उत्तर पुस्तिका निरीक्षक महोदय। मेरी गर्लफ्रेंड कुकू (कोकिला) भी नब्बे टंच माल है। उत्तर पुस्तिका निरीक्षक महोदय, अगर आप बुरा न मानें, तो मैं पूछना चाहता हूं कि आपकी भी कभी न कभी कोई न कोई गर्लफ्रेंड जरूर रही होगी। आपकी गर्लफ्रेंड कितने टंच माल है? अगर नब्बे से सौ टंच के बीच में हो, तो आपको उस प्रेमिका की कसम, मुझे नब्बे से सौ टंच के बीच में अंक भी दीजिएगा।’

Wednesday, July 31, 2013

खतरे में हैं ‘हम’

विलुप्त होते पशु-पक्षियों को बचाने की जद्दोजहद और कॉरपोरेट घरानों की मक्कारी

विलुप्त होने के कगार पर हैं कई जीव-जंतु और पेड़-पौधे। इससे असंतुलित हो रहा है प्रकृति का तानाबाना। अगर समय रहते नहीं चेते, तो धरती का संतुलन बिगड़ सकता है। इसके लिए जिम्मेदार होंगे सिर्फ और सिर्फ हम और आप...। इसी मुद्दे पर पढ़िए खास रिपोर्ट...
-अशोक मिश्र
चूं-चूं करती आई चिड़िया/चोंच में दाना लाई चिड़िया। शायद एकाध दशक बाद कोई भी बच्चा यह गीत गाता नहीं मिले। चिड़िया इतिहास की वस्तु हो जाए। हमारे जीवन में उसका स्थान ही न रहे। बच्चे किताबों और म्यूजियम में देखकर आश्चर्य से मुंह फैलाकर कहें, ऐसी होती थी चिड़िया। पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक दशक पहले तक छोटे बच्चों को खाना खिलाते समय माएं कहा करती थीं, ‘तिलोरी मौसी आओ, तो भैया को खिलाओ तो। दूध-बताशा लाओ तो।और इतना कहकर हाथ में लिया हुआ कौर बच्चे के मुंह में डाल देती थीं। खाते समय बच्चे का ध्यान खाने की मात्रा पर न जाए, इसके लिए कुछ न कुछ गाना या इसी तरह का कुछ करतब दिखाना अनिवार्य था। अब न अपने बच्चों को उस तरह गीत गा-गाकर दूध-बताशा खिलाने वाली माएं रहीं, न बच्चों की प्रिय तिलोरी मौसी ही बहुतायत में रही। बच्चों को अपने पर्यावरण से जोड़ने, चिड़िया, कबूतर, कुत्ता, बिल्ली, मेंढ़क, सांप, छछूंदर, झींगुर आदि का महत्व बताने के लिए इनका मानवीकरण कर दिया जाता था। सभी जानते हैं कि किसी बच्चे के लिए मौसी कितनी प्रिय होती है, क्योंकि वह मा-
सी’ होती है। हमारी संस्कृति के पुरोधाओं ने तिलोरी को बच्चों को मौसी कहकर उसे मानवीय रिश्तों से जोड़ दिया। वे इस बात को अच्छी तरह से समझते थे कि प्रकृति में जितने भी जीव पाए जाते हैं, उनका आपस में संबंध अन्योनाश्रति है। एक के रहने से ही दूसरे का जीवन संभव है। हमारे आस-पास से अगर एक भी जीव खत्म होता है, तो उसका प्रभाव पूरे मानव समाज पर पड़ता है। तिलोरी, एक तरह की मैना पक्षी होती है, जो उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, हरियाणा, पंजाब आदि प्रदेशों में बहुतायत में पाई जाती थी। रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों के फसलों में लगातार बढ़ते उपयोग, झाड़ियों, वनों की अवैध कटान और पिछले कुछ दशकों से लगातार बिगड़ते पर्यावरण की वजह से बहुतायत में पाई जाने वाली इस तिलोरी (तेलिया मैना) का दिखना कम हो गया है। खेती में अंधाधुंध और बिना सोचे बिचारे रासायनिक उर्वरकों के उपयोग ने इन पशु-पक्षियों, कीट-पतंगों को या तो नष्ट कर दिया है या फिर इनकी प्रजनन क्षमता को कम कर दिया है, जिसकी वजह से इनकी वंश वृद्धि लगातार घटती जा रही है। यदि यही हालात रहे, तो एक दिन तिलोरी भी विलुप्त प्राणियों में शामिल हो जाएगी।
और तिलोरी की ही बात क्यों करें। अगर हम अपने आसपास गंभीरता से देखें, तो न जाने कितनी वनस्पतियां, जीव-जंतु, पेड़-पौधे विलुप्त हो चुके हैं। आज से दो दशक पहले तो पाए जाते थे, लेकिन आज खोजने पर भी नहीं मिलते हैं। कहां गए ये? अब क्यों नहीं पाए जाते? इनको हमारे विकास की अमानवीय विकासवादी अवधारणा खा गई। हजारों वनस्पतियों, जीव-जंतुओं, पेड़-पौधों के विलुप्त होने का कारण दुनिया में चल रही एकांगी विकासवादी नीतियां हैं। इस पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में जब आदमी की कोई कीमत नहीं रही, तो भला विलुप्त हो गईं या विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई वनस्पतियों को लेकर कौन चिंतित होगा। मुनाफा कमाने की होड़ में लगी बहुराष्ट्रीय कंपनियां, एनजीओज, देशी-विदेशी पूंजीपतियों को सिर्फ अपने लाभ से मतलब है। विशालकाय कल-कारखानों, चमकती सड़कों, गगनचुंबी अट्टालिकाओं को देखकर पूंजीपति ही नहीं, हम सभी कितने मुग्ध हो जाते हैं। गर्व से सिर उठाकर कहते हैं, हमने कितनी तरक्की कर ली है, लेकिन इस तरक्की की हमने क्या कीमत अदा की है, इसकी ओर देखने, सोचने, समझने की कोशिश कभी नहीं की है। हमने विकास तो किया, इसमें कोई शक नहीं है, लेकिन हमने एकांगी विकास के चलते पूरी दुनिया की जैव विविधता को खतरे में डाल दिया है। हजारों जीव-जंतु या तो नष्ट हो गए या फिर निकट भविष्य में नष्ट होने वाले हैं। चिड़िया, गौरेया, फाख्ता, गिद्ध, कौवे जैसे पक्षी हमारे जीवन का हिस्सा थे। हमारे साहित्य में स्थान पाते थे। बच्चे इन्हीं को देख-देखकर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पर्यावरण को साफ-सुथरा रखने, इसकी हिफाजत करने का सबक सीखते थे। समाज के भावी नागरिकों को इसके बारे में बताने की जरूरत नहीं महसूस होती थी। वे जीवन संघर्ष के क्रम में सीखते जाते थे। गंगा में पाई जाने वाली डॉल्फिन सहित दूसरी कई प्रकार प्रजाति की मछलियां, मेंढक, सांप आदि हमारे जीवनचर्या में शामिल थे, लेकिन आज...? इन जीवों की ज्यादातर प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं। नील गाय, मोर, गीदड़, सियार, रोही बिल्ली, पाटा गोह, उड़ने वाली गिलहरी, कनखजूरे जल्दी ही हमसे विदा मांगने वाले हैं। मानव की लगातार बढ़ती सक्रियता, लिप्सा, विकास की होड़ के चलते खेत, जंगल, पहाड़, तालाब, नदियां, समुद्र, सब संकट में हैं। इसके साथ ही साथ संकट में हैं इन पर या इनमें रहने वाले लाखों-करोड़ों जीव। लगातार बढ़ते जल प्रदूषण ने सिर्फ इनसानों के सामने ही संकट नहीं खड़ा किया है, बल्कि जल में रहने वाले जीव-जंतुओं, पौधों, एक कोशकीय सूक्ष्म और बहुकोशकीय पादपों के सामने भी संकट खड़ा कर दिया है। अगर आंकड़ों पर नजर डालें, तो प्रकृति, पर्यावरण, पहाड़, नदियों, पशु-पक्षियों, जीव-जंतुओं आदि के प्रति संवेदनशील मन अवश्य विचलित हो जाएगा। मानव समाज ने अपनी आवागमन की सुविधा के लिए बड़े-बड़े और अत्याधुनिक हवाई जहाज, जलयान तो बना दिए, दूरसंचार माध्यमों में क्रांति करके मोबाइल   फोन का आविष्कार कर लिया, मोबाइल फोन की हर जगह संबद्धता के लिए बड़े-बड़े टॉवर खड़े कर लिया, लेकिन हवाई जहाजों, मोबाइल टॉवरों से निकलने वाली  रेडियो तरंगों का कोई विकल्प नहीं खोज पाए। ये तरंगे न केवल पशु-पक्षियों, बल्कि कीट-पतंगों से लेकर मानवों तक के लिए हानिकारक हैं, कई घातक और असाध्य रोगों की जनक हैं। इसके चपेट में आने वाले लोगों को बहुत कष्टमय जीवन बिताना पड़ रहा है।
विलुप्त होने का खतरा
थार की पाटा गोह हो या फोग का पौधा, गंगा की डाल्फिन हो, हिमालय के ग्लेशियर हों या तंजानिया का किहांसी स्प्रे मेंढक, सब पर संकट के बादल लगातार गहराते जा रहे हैं। भारत में 687 पौधों और इतने ही जीवों पर विलुप्त होने का संकट गहरा रहा है। आईयूसीएन की रेड लिस्ट बताती है कि 47,677 में से कुल 17,291 जीव प्रजातियां कब खत्म हो जाएं, कहा नहीं जा सकता है। इसमें 22 प्रतिशत स्तनधारी जीव हैं, 30 प्रतिशत मेंढकों की प्रजातियां हैं, इसमें 70 प्रतिशत पौधे और 35 प्रतिशत सरीसृप जैसे जीव हैं। भारत में ही पौधे और वन्य जीवों की विलुप्त होने की कगार में पहुंच चुकी कुल 687 प्रजातियां में से 96 स्तनपायी, 67 पक्षी, 25 सरीसृप, 64 मछली और 217 पौधों की प्रजातियां हैं।
प्रकृति संरक्षण के लिए काम कर रही संस्था अंतरराष्ट्रीय संघ की निदेशक जुलिया मार्टोन लेफेव्रे का कहना है कि जापान के नागोया में जैव संरक्षण की दशा-दिशा तय करने के लिए हमने बड़ी योजनाएं बनाई थीं, जिसके लक्ष्य एकदम जमीन से जुड़े हुए थे। हमें गति बनाए रखनी होगी। जैव विविधता लगातार कम हो रही है। यह सुरक्षित धरती के लिए जरूरी सीमा भी तोड़ चुकी है। धरती से खत्म हो रही प्रजातियों में 41 फीसदी उभयचर, 33 फीसदी प्रवाल, 25 फीसदी स्तनपायी, 13 प्रतिशत पक्षी और 23 प्रतिशत कोनफर वृक्ष हैं।
खतरे में समुद्री जीव-जंतु
आईयूसीएन के रिपोर्ट के मुताबिक, महासागरों की हालात भी काफी चिंताजनक है। रिपोर्ट से पता चलता है कि समुद्री प्रजातियों में से ज्यादातर जीव-जंतु अत्यधिक मछली पकड़ने, जलवायु परिव
र्तन, तटीय विकास और प्रदूषण की वजह से नुकसान का सामना कर रहे हैं। मछली पकड़ने में उपयोग किए जाने वाले मशीनचालित नावों (ट्रॉलरों) और जलयानों से समुद्र में रहने वाले दूसरे जीव-जंतु बहुत बड़ी संख्या में न केवल घायल होते हैं, बल्कि मर भी जाते हैं। समुद्र का लगातार दोहन करने से शार्क सहित कई समुद्री प्रजाति के जलीय जीव, छह-सात समुद्री प्रजाति के कछुए विलुप्त होने के कगार पर आ गए हैं। चट्टान मूंगों की 845 प्रजातियों में से 27 प्रतिशत विलुप्त हो चुकी हैं। इनमें से 20 प्रतिशत पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। पिछले कुछ दशकों से समुद्री पक्षियों पर खतरा कुछ अधिक है। रिपोर्ट के मुताबिक, स्थलीय पक्षियों के विलुप्त होने की दर 11.8 प्रतिशत है, वहीं 27.5 प्रतिशत की दर से समुद्री पक्षियों पर विलुप्त होने का खतरा है। निकट भविष्य में स्थलीय और समुद्री पक्षियों के विलुप्त होने के प्रतिशत में बढ़ोत्तरी की आशंका है।
डराने लगी है रिपोर्ट
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पशु-पक्षियों के संरक्षण को लेकर सक्रिय संस्था आईयूसीएन (इंटरनेशनल यूनियन कंजरवेशन फार नेचर) की रिपोर्ट चौंकाती ही नहीं, प्रकृति प्रेमियों और पयावरणविदों को डराती भी है। आईयूसीएन की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया में पाए जाने वाले जीवों में से एक तिहाई विलुप्त होने के कगार पर हैं। यह खतरा हर दिन बीतने के साथ बढ़ता जा रहा है। रिपोर्ट में किहांसी स्प्रे टोड के बारे में खास तौर पर चर्चा की गई है। आईयूसीएन की रिपोर्ट के मुताबिक, मेंढक की यह प्रजाति इसलिए विलुप्त हो गई, क्योंकि जिस नदी में इनका निवास था, उस नदी के ऊपरी हिस्से पर बांध बना दिया गया था। पानी के बहाव में कमी आने से ये मेंढक खत्म हो गए। हमारे देश में भी ठीक ऐसा ही हो रहा है। गंगा, यमुना, राप्ती और व्यास आदि नदियों पर बांध बनाने और बिजली उत्पादन करने की एक होड़-सी लगी हुई है। अभी एक महीने पहले उत्तराखंड में हुई व्यापक तबाही के कारण वहां से निकलने वाली नदियों के उद्गम क्षेत्र पर बनने वाले बांध, पहाड़ों को तोड़ने के लिए उपयोग में लाए जा रहे विस्फोटक हैं। उत्तराखंड की बहुगुणा सरकार इन बांधों के निर्माण के लिए विकास और बिजली उत्पादन का तर्क देकर अपने को बचाने की कोशिश कर रही है। संवैधानिक रूप से नदियों पर बांध बनाना, भले ही अपराध या गैरकानूनी न हो, लेकिन पर्यावरण और मानव जाति के प्रति किया गया अक्षम्य अपराध तो है ही। जिन इलाकों में बहने वाली नदियों पर बांध बनाए गए हैं, उन इलाकों में जल प्रवाह कम हो जाने से जल में रहने वाले जीव-जंतु या तो नष्ट हो गए या भविष्य में नष्ट हो जाएंगे। पिछले दशक में भारत ने कम से कम पांच दुर्लभ जानवर लुप्त होते देखे हैं। ये इंडियन चीता, छोटे कद का गैंडा, गुलाबी सिर वाली बत्तख, जंगली उल्लू और हिमालयन बटेर हैं। कई लोगों को हैरानी होगी कि अभी 2005 में अरुणाचल प्रदेश में दुर्लभ प्रजाति का बंदर मिला था। जियोलॉजिकल सर्वे आॅफ  इंडिया के अनुसार, 2011 में जानवरों की 193 नई प्रजातियां पाई गई थीं। भारत शेर, बाघ, हाथी और गैंडे को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। हालांकि इस बीच अफ्रीका से इंडियन चीते को लाने के प्रयास भी हुए हैं। लेकिन यह भी सच है कि देश शेरों के लिए उपयुक्त वैकल्पिक रिहाइश खोज पाने में सफल नहीं हो पा रहा है। यह सब इंसान के लालच और जंगलों के कटाव के कारण हुआ है। इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन आॅफ नेचर (आईयूसीएन) ने चेतावनी दी है कि इस समय पूरी दुनिया में 929 दुर्लभ प्रजातियां खतरे की जद में आ चुकी हैं। वर्ष 2004 में यह संख्या 648 थी। विश्व धरोहर को गंवाने वाले देशों की शर्मनाक सूची में भारत चीन के ठीक बाद सातवें स्थान पर है।
काम कम, चीख-पुकार ज्यादा
जैव विविधता को लेकर सबसे ज्यादा चीख -पुकार वही देश मचा रहे हैं, जो सबसे ज्यादा कार्बन डाई आक्साइड के उत्सर्जन के दोषी हैं। अभी पिछले साल अक्टूबर में हैदराबाद में जैव विविधता को सहेजने की चुनौती को लेकर सम्मेलन आयोजित किया गया था। भारत अपनी जैव विविधता को बचाने की हर संभव कोशिश कर रहा है। देश के 4.8 25 लुप्तप्राय जानवरों की सूची से हटा दिया है, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में इनकी संख्या में इजाफा हुआ है। हैदराबाद में आयोजित सम्मेलन इस पर होने वाले खर्च की बात उठी, तो ज्यादातर देशों ने अपने हाथ खींचने की कोशिश भी की। हैदराबाद में 193 देशों के हजारों विशेषज्ञ इसी बात विचार करते रहे कि इस पर होने वाले खर्च की पूर्ति कहां से होगी? पर्यावरण विशेषज्ञों और समाजसेवियों का मानना है कि इस पर लगभग 40 अरब डॉलर का खर्चा आएगा। कन्वेनशन आॅन बायोजॉजिकल डायवर्सिटी ट्रीटी में शामिल देशों को ही यह खर्च उठाना होगा, लेकिन इस संधि पर हस्ताक्षर करने वाले ज्यादातर देश अपनी कम से कम भागीदारी चाहते हैं। अमेरिका और सूडान जैसे देश पहले से ही अपना पल्ला झाड़ चुके हैं। इन सब विपरीत स्थितियों के बावजूद सुखद यह है कि अब पूरी दुनिया में जैव विविधता को लेकर चेतना जागृति होने लगी है। मानव समाज को लेकर चिंतित विचारकों और सामाजिक संस्थाओं ने इस दिशा में सोचना और पहल करना शुरू कर दिया है। उम्मीद है कि इन लोगों की मेहनत और भागीदारी रंग लाएगी।
प्रतिशत भौगोलिक हिस्से को इसके लिए सुरक्षित रखा गया है। भारत इस समय जैव विविधता पर दो अरब डॉलर खर्च कर रहा है। इसके परिणाम भी सामने आने लगे हैं। आईयूसीएन ने शेर जैसी पूंछ वाले बंदर को
कॉरपोरेट कंपनियों का हित
अमीर देशों की कॉरपोरेट कंपनियों का हित इन प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ा हुआ है। ये अपना हित साधने के लिए दुनिया भर के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन तो करना चाहते हैं, लेकिन जैविक असंतुलन को रोकने के लिए अपनी गांठ से दमड़ी भी खर्च करना नहीं चाहते। दोनों हाथों में लड्डू चाहने वाली कॉरपोरेट कंपनियों में से एक कंपनी भारत में भी सक्रिय है। सरकारी लापरवाही, लोगों की अनभिज्ञता और कॉरपोरेट कंपनियों की चालाकी इससे जाहिर होती है कि भारत के दक्षिण पूर्व में स्थित मन्नार की खाड़ी से करोड़ों रुपये का समुद्री शैवाल निर्यात करती है शीतल पेय बनाने वाली कंपनी पेप्सी। साल-दो साल पहले जब राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण ने कंपनी पर दबाव डाला, तो उसने भारत सरकार को सिर्फ 38 लाख रुपये की ही क्षतिपूर्ति दी थी। तब जयराम रमेश ने एक कार्यक्रम में बड़े गर्व से कहा था कि इस राशि का उपयोग स्थानीय समुदाय के विकास में किया जाएगा। सचमुच, करोड़ों रुपये के प्राकृतिक संसाधनों को गंवाकर सिर्फ 38 लाख रुपये वसूलना काबिलेतारीफ है। और फिर दक्षिण पूर्व स्थित मन्नार की खाड़ी के आसपास रहने वाले समुदायों के हिस्से में कितनी रकम आएगी, यह भी गौर करने लायक है। मजेदार बात यह है कि पेप्सी इन शैवालों का सिंगापुर, मलेशिया सहित कई यूरोपीय देशों को निर्यात करके वास्तविक लागत से दसियों गुना कमाई करती है। यह तो एक उदाहरण मात्र है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, दक्षिण अफ्रीकी देशों सहित अन्य विकासशील और अविकसित देशों के प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर दोहन करके मोटा मुनाफा कमाती हैं और इस निर्मम दोहन के चलते प्राकृतिक असंतुलन पैदा होता है। इन देशों की वनस्पतियों, जीव-जंतुओं, पादपों की अपूर्णीय क्षति होती है। प्राकृतिक असंतुलन, ग्लोबल वॉर्मिंग और वनस्पतियों के नष्ट होने से ऐसे इलाकों में महामारी, भुखमरी और गरीबी फैलती है और अमीर देशों की कॉरपोरेट कंपनियां गरीबी, बेकारी और भुखमरी से जूझ रहे लोगों को अपनी मोटी कमाई में से एक मामूली सा हिस्सा दान, अनुदान देकर और विभिन्न परियोजनाओं में निवेश करके दुनिया के सामने अपनी पीठ थपथपाती हैं।
विकसित देशों का रवैया निराशाजनक
प्रकृति में पादप, जीव-जंतुओं के जीनेम में आ रहे बदलाव और उनके विलुप्त होने के बारे में गंभीरता से सबसे पहली बार जून 1992 में सोचा गया। जून 1992 में ब्राजील के रियो द जेनेरो में हुए पृथ्वी सम्मेलन में जैव विविधता पर अभिसमयसंधि (कन्वेंशन आॅन बॉयोलॉजिकल डायवर्सिटी) के माध्यम से दुनिया का ध्यान इस गंभीर मुद्दे की ओर खींचा गया। उस समय तय किया गया कि पृथ्वी को ग्लोबल वॉर्मिंग और प्रकृति में रहने वाले उभयचरों, जलचरों, नभचरों और पादपों को विलुप्त होने से बचाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का कम से कम दोहन और ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन घटाने पर जोर दिया जाएगा। जो विकसित और विकासशील देश ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन ज्यादा करते हैं, उनसे उत्सर्जन कम करने को कहा जाएगा। रियो सम्मेलन के अगले साल दिसंबर 1993 से विश्व समुदाय को   प्रेरित और किसी हद तक बाध्य करने के लिए जैव विविधता पर अभिसमयलागू कर दिया गया। लेकिन अफसोस कि इस मुद्दे पर विकसित देशों ने ध्यान नहीं दिया। चीन, अमेरिका, जापान, सोवियत रूस, भारत जैसे विकसित और विकासशील देशों की प्रमुखता सूची में यह मुद्दा रहा ही नहीं। वे सिर्फ फर्ज अदायगी के तौर पर मामले को लेते रहे। संयुक्त राष्ट्र कन्वेनशन आॅन बायोलॉजिकल डायवर्सिटी (सीबीडी) संधि पर हस्ताक्षर करने से अमेरिका इनकार कर चुका है। वह 1994 से ही जैव विविधता के मुद्दे पर पृथकतावादी रुख अपनाए हुए है। अमेरिका को इस बात से आपत्ति है कि सभी देशों को इस संबंध में किए गए प्रयास का फायदा बराबर क्यों मिले। वह सीबीडी की कुछ दूसरी शर्तों का भी विरोध कर रहा है। सूडान भी अमेरिका का पिछलग्गू बना सीबीडी का विरोध कर रहा है। वहीं इस संधि पर दुनिया के 193 देश हस्ताक्षर कर चुके हैं। इनमें से ज्यादातर देशों ने अपने यहां इस पर अमल करना भी शुरू कर दिया है।
पिछले साल 2012 में बीस साल बाद जब रियो प्लस ट्वेंटी’ (रियो+ 20) सम्मेलन आयोजित किया गया, तो विकसित देशों को भी इसकी गंभीरता समझ में आई। इसके बावजूद विडंबना यह रही कि अमेरिका और ब्रिटेन के प्रधानमंत्रियों ने रियो प्लस ट्वेंटी पृथ्वी सम्मेलन में भाग नहीं लिया। इसमें अगर भाग लिया
, तो ज्यादातर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अधिकृत प्रतिनिधियों और उनके प्रमुखों ने । इस सम्मेलन की जो परिणति होनी थी, वही हुई। कंपनियों ने सबसे पहले अपने हितों पर ध्यान दिया। वे पर्यावरण असंतुलन, ग्लोबल वार्मिंग और जैविक असंतुलन के लिए एक दूसरे को दोष देती रहीं और खुद कोई जिम्मेदारी उठाने से बचती रहीं।
सम्मेलन के दौरान आए विशेषज्ञों ने तो यहां तक कहा कि आयोजित किया गया रियो+ 20 सम्मेलन वास्तव में संयुक्त राष्ट्र का वैश्विक पर्यावरणीय कॉन्फ्रेंस है। इस सम्मलेन में बातें तो लंबी चौड़ी की गईं, लेकिन वहां पेश किए गए दस्तावेजों में इस बात का कोई जिक्र नहीं है कि पूरे विश्व पर मंडरा रहे इस खतरे से निजात कैसे मिलेगी? दस्तावेज की कई बातों से तो यह ध्वनित होता है कि गरीब देशों के जल, जंगल, जमीन, हवा और जलीय जीवन आदि को बचाने और उसके संरक्षण के लिए जो कुछ दान देना पड़ रहा है, वह उनके साथ अन्याय है। ऐसा करके अमीर देशों की जनता का हक छीना जा रहा है। विकसित देश तो अब बात यहां तक कह रहे हैं कि अगर गरीब देश अपने हिस्से की जमीन, हवा, पानी, जंगल आदि की सुरक्षा और देखभाल नहीं कर सकते हैं, तो वे इसे या तो बेच दें या लीज पर दे दें। अमीर देश प्राकृतिक संसाधन को बिकाऊ बनाने पर तुले हुए हैं, ताकि वे उन पर कब्जा करके अधिकतम दोहन करने के साथ-साथ पूरी दुनिया में यह दंभ भर सकें कि वे धरती की सुरक्षा कर रहे हैं।

Tuesday, July 30, 2013

पत्नी को प्रेम भरी पाती

-अशोक मिश्र 
आजादी से पहले अवध क्षेत्र के किसी शहर से कलकत्ता (अब कोलकाता) कमाने गए किसी पति ने हिंदी और अवधी मिश्रित भाषा में अपनी पत्नी को प्रेम भरा पत्र भेजा, ‘सर्व श्री सर्वोपमायोग लिखा कि चिट्ठी रमुआ की माई को पहुंचे। हम यहां ठीक से रहते हुए भगवान से नेक मनाया करते हैं कि तुम भी गांव मा अम्मा-बप्पा और रमुआ के साथ राजी-खुशी से होगी। रमुआ की माई! जब से हम यहां कलकत्ता कमाय आए हैं, तब से तुम्हारी याद बहुत आवत है। तुम्हारी सूरत आंखिन के आगे दिनभर नाचती रहती है। जानती हो, कल हम दाल मा लौकी डार के बटुली चूल्हे पर चढ़ाय दिये रही पकने की खातिर, लेकिन तुम्हारी याद आई, तो हम दाल की बटुली उतारना ही भूल गए। दाल जलकर कोइला होइगा। अब हम क्या करते, नोन भात खाकर काम पर गए। आवात समय जब तुम दरवाजे के पीछे हिचकी लेकर रोवै लागी, तो हमरा मन कहिस कि न जाई कलकत्ता। लेकिन गांव में भी तौ गुजारा नहीं हो सकता था। तो रमुआ की माई हमका आवै का पड़ा। रस्ता मा भी मन कई बार पिछरा कि लौट चलो। टरेन का तीन रुपये का टिकट भी कटवाय लिया रहा, इससे दिल कड़ा करिकै आना पड़ा। अब हम तौ यही कहेंगे, कि जी कड़ा करके कुछ महीना इंतजार करौ। फागुन मा हम आवै का बंदोबस्त कर रहे हैं। राम चाहेंगे, तो महीना-पंदरह दिन की छुट्टी भी मिल जाई।’
इसके बाद चिट्ठी पर दो जगह की एक छोटी सी जगह की स्याही फैल गई थी। इससे अनुमान होता है कि चिट्ठी लिखने वाला रो पड़ा था। चिट्ठी में आगे लिखा था, ‘रमुआ की माई! हमार चिंता मत करना। हम यहां काफी राजी-खुसी से रह रहे हैं। हमार चिंता मत करना। हां, तुम्हरी एक बात याद करकै हमका बहुत हंसी आवात है। चलते समय तुम डर रही थी कि कलकत्ता मा कोई मेहरारू हम पर मोहित होकर भेढ़ा न बनाय ले। धत्त पगली, हम लोगन की तरफ कलकत्ता आने वाले को जो डराया जाता है, वह बिल्कुल झूठ है। यहां की औरतें कोई जादू-टोना नाही करती हैं। सात-आठ महीना मा जो हमरी समझ में आवा है, वह यह कि यहां कमाने आने वाले लोग कई बार भटक जाते हैं। यहां की मेहरारुओं के चक्कर मा आ जात हैं। फिर वे अपने गांव-घर का भूलि जात हैं, अपने अम्मा-बप्पा, मेहरारू और लड़कन-बच्चन का भूलि जात हैं। तुम चिंता मत करौ। हम तोहार कसम खाई कै कहते हैं कि हम किसी के चक्कर मा न पड़ब। तू हमका जान से ज्यादा पियारी हो।’
इसके बाद पत्र की स्याही कुछ ज्यादा चटख हो गई थी। इसका निहितार्थ यही है कि स्याही खत्म होने के बाद दूसरे दिन स्याही लाने पर आगे पत्र लिखा गया था। पत्र में लिखा था, ‘रमुआ तौ अब अपने पैरन पर चलै लाग होई। उसकी भी बहुत याद आवत है। इस बार आऊंगा, तो उसके लिए यहां से कपड़े ले आऊंगा। अम्मा की रतौंधी की दवाई भी यहां के एक वैद्य महाराज से लैके रख लिया है। आऊंगा तौ लेता आऊंगा। बप्पा की खातिर जूता खरीदै का है, अबकी पइसा मिली, तो सबसे पहले वही खरीदब। शामसुंदर काका के हाथ जो चौतीस रुपया भिजवावा रहा, ऊ मिल गवा होई। बप्पा से कहना, कंधई बाबा का सतरह रुपया उधार चुकाय देहैं, उनकै नौ रुपया रहि जाई, जो हम फागुन मा आने पर चुकाय देबै। बाकी पइसा से अनाज-वनाज खरीदकर रख लें। अगर श्रीधर काका की भैंस दूध देती हो, तो रमुआ के लिए पाव भर दूध बंधाय दिहौ। रुपया-दुई रुपया जो भी दाम होगा, आने पर चुका दूंगा। एक बात कही, यहां की औरतें बहुत चालाक हैं। यहां जिस कोठरी मा हम रहते हैं, उसकी मालकिन के पास हर महीना अपनी बचत जमा करते रहते हैं कि जब गांव जाएंगे, तब लैइ लेंगे। हमरे हिसाब से उसके पास तेइस रुपया जमा होना चाहिए,  लेकिन ऊ कहती है कि उन्नैइस रुपया जमा है। हम मन मसोस कै उससे उन्नैइस रुपया लैके घोसाल बाबू के पास जमा कर दिया है। सुना है कि ऊ बहुत ईमानदार हैं। एक तौ मालिक काम ज्यादा करवाते हैं, मजूरी कम देते हैं। ऊपर से ई लुटेरा लोग हम सबका अलग से लूटि लेते हैं। तुम चिंता मत करना। हम गरीबन कै पइसा इनके पची ना (पचेगा नहीं)।’
‘रमुआ की माई! अम्मा-बप्पा की देखभाल अब तुम्हारे ही जिम्मे है। हम विशवास है, तू अपने जियत कोई कष्ट नाही होने दोगी। लेकिन का करैं, पापी मन मानता नहीं है यह बात कहे बिना। अम्मा से कहना, फागुन मा उनकी खातिर दो धोती और कुर्ती का कपड़ा लेता आऊंगा। बप्पा की खातिर भी कुर्ता-धोती का कपड़ा मोलवाया हूं। ढाई रुपये मा दो जोड़ी कुर्ता-धोती मिल जाई। तुम्हरे लिए एक पाजेब देखा है सोनार के दुकान पर। दाढ़ीजार! चार रुपया मांगत है। लेकिन चिंता मत करो, फागुन से पहले खरीद लेब। रमुआ की माई, जब पाजेब पहिनकै गांव मा निकली, तो देखै वालेन के सीने पर सांप लोटि जाई। अच्छा, अब चिट्ठी लिखब बंद करित है। अम्मा-बप्पा का पैलगी, रमुआ का आसीरवाद और तुहका पियार।-रिखीराम तेवारी।’

Tuesday, July 23, 2013

कहां जाएं मुसलमान?

देश के सामने यक्ष प्रश्न 

-अशोक मिश्र
देश में मुसलमानों की आबादी हिंदुओं के बाद सबसे ज्यादा है। आंकड़ों के मुताबिक, भारत में 16 करोड़ मुसलमान रहते हैं, जो कि इंडोनेशिया के बाद सबसे अधिक है। यानी कि भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मुस्लिम देश है। इस बड़े वोट बैंक की तरफ राजनीतिक दलों का ध्यान जाना बहुत स्वाभाविक है। कुछ तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियां, जैसे- कांग्रेस, सपा, माकपा, भाकपा और बसपा सहित अन्य धार्मिक संगठन अपने पाले में रखना चाहते हैं। ये राजनीतिक दल तो इनका शोषण करते ही हैं, इनके धार्मिक संगठन भी स्वार्थ के लिए इनका सिर्फ उपयोग ही करते हैं। वे नहीं चाहते कि मुसलमानों में नई आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि पैदा हो, ताकि वे अंधविश्वास और रूढ़ियों से मुक्त हो सकें। इनके धार्मिक नेता जानते हैं कि जिस दिन वे इन रूढ़ियों और अंधविश्वासों से मुक्त हो जाएंगे, वे इनके हाथ से निकल जाएंगे। यही वजह है कि वे इनके जेहन में ऐसी कोई किरण पैदा ही नहीं होने देना चाहते, जो इन मुसलमानों को तरक्की की ओर ले जाता है।  दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना जैसे दल इतिहास का हवाला देकर मुसलमानों को खलनायक बताकर, हिंदुओं का ध्रुवीकरण करना चाहते हैं और इसका फायदा वे चुनाव में उठाना चाहते हैं। तभी तो दक्षिणपंथियों के बीच यह जुमला प्रसिद्ध है कि ‘हर मुसलमान आतंकी नहीं होते, लेकिन हर आतंकी मुसलमान क्यों होते हैं?’ अब उन्हें कौन समझाए कि आंतक का कोई धर्म नहीं होता। इसी तरह जब नरेंद्र मोदी कांग्रेस को कोसते वक्त बुर्का श्ब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो उनका इशारा साफ है कि कांग्रेस मुसलमानों का बंकर बन गई है। इसके जवाब में हिंदुओं को एकजुट होकर भाजपा के साथ जुड़ जाना चाहिए। तभी तो मोदी दिल्ली की सल्तनत से मुकाबला करने के लिए आतुर हैं। मोदी जब ‘दिल्ली के सल्तनत’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो उनका अभिप्राय होता है कि दिल्ली में अब तक मुगलों का ही शासन है। उनकी नजर में मुसलमानों का समर्थन लेने वाला मुगल ही तो कहलाएगा। वैसे इनका समर्थन तो भाजपा भी लेना चाहती है, लेकिन गुजरात के मुख्यमंत्री और भाजपा के केंद्रीय चुनाव प्रचार समिति के सर्वेसर्वा नरेंद्र भाई मोदी की माफी की शर्त पर नहीं। वैसे भी सन 2002 में हुए गुजरात दंगों की जिम्मेदारी लेने या माफी मांगने को नरेंद्र मोदी तैयार नहीं हैं। हां, पिछले साल संपन्न हुए गुजरात चुनाव में तीसरी बार जीत के बाद नरेंद्र मोदी ने यह कहना जरूर शुरू कर दिया है कि उनकी जीत में गुजराती मुसलमानों की भी भूमिका रही है। उन्हें गुजरात में रहने वाले मुसलमानों ने भी वोट दिया है। दरअसल, यह कहकर नरेंद्र मोदी यह जताने की कोशिश कर रहे हैं कि वे मुसलमान विरोधी नहीं हैं, लेकिन इस देश के मुसलमानों को ठीक से रहना होगा। ठीक से रहने का मतलब? मनु संहिता पर आधारित हिंदू राष्ट्र में दोयम दर्जे के नागरिक के तौर पर भाजपा की नीतियों और कार्यक्रम का विरोध किए बिना वे भारत में रह सकते हैं। यही वजह है कि भाजपा नेता अपने को हिंदू राष्ट्रवादी कहने से नहीं चूकते हैं। हिंदूवादियों के विचारों का अंतर्विरोध देखिए, एक तरफ तो वे कट्टर हिंदू राष्ट्र की कल्पना करते हैं, दूसरी तरफ राम राज्य की बात करते हैं, जिसका आदर्श वाक्य है, ‘दैहिक, दैविक, भौतिक तापा, राम राज्य काहू नहिं व्यापा।’ ऐसा तो है नहीं कि आज रामराज्य स्थापित हो जाए, तो इन तीनों प्रकार के तापों से सिर्फ हिंदुओं को ही मुक्ति मिलेगी और मुसलमान इसके दायरे से बाहर रहेंगे? हिंदू राष्ट्रवादी मोदी की इस बात से जाहिर है कि देश के मुसलमान लोकसभा और विधानसभा चुनावों के दौरान कुछ सीटों पर निर्णायक भूमिका निभा सकने की स्थिति में हैं। नरेंद्र मोदी के निकट सहयोगी और गुजरात के पूर्व गृहराज्य मंत्री रहे अमित शाह ने पिछले दिनों अयोध्या में जाकर जिस तरह से राम मंदिर को लेकर हुंकार भरी, उससे जाहिर है कि वे उत्तर प्रदेश के साथ-साथ मंदिर-मस्जिद मुद्दा उभारकर धुव्रीकरण की प्रक्रिया तेज करना चाहते हैं। अगर वे अपने मकसद में सफल हो गए, तो जाहिर है कि इससे हिंदू-मुस्लिम के बीच वैमनस्य बढ़ेगा, एकाध जगहों पर दंगे भी हो सकते हैं।
देश में जब भी कहीं कोई आतंकी घटना होती है, तो इसे पूरी मुस्लिम संप्रदाय द्वारा की जा रही गतिविधियों से जोड़कर देखा जाता है। यह भी सही है कि देश में होने वाली ज्यादातर आतंकी घटनाओं में पाकिस्तानी, बांग्लादेशी और कुछ दूसरे देशों के मुसलमानों के साथ-साथ देश के भी कुछ मुसलमानों की भी मिलीभगत होती है। बम विस्फोट या दूसरी किस्म की आतंकी गतिविधियों की योजना भले ही पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल आदि में बैठे आतंकवादी संगठन तैयार करते हों, आवश्यक संसाधन (विस्फोटक, बंदूकें, रुपये आदि) मुहैया कराते हों। वहां से कुछ अपने एजेंट भेजते हों, लेकिन उन्हें सहयोग देने, रेकी करने और स्लीपिंग सेल उपलब्ध कराने में निस्संदेह यहीं के लोगों का हाथ होता है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि देश का हर मुसलमान संदिग्ध है। सन 1980 से पहले और उसके बाद देश के ही एक महत्वपूर्ण हिस्से में जो खालिस्तानी आंदोलन चला, उसके लिए क्या देश के सभी सिखों को दोषी माना जा सकता है? कतई नहीं। सिखों की मेहनती,   स्वाभिमानी और जुझारू प्रवृत्ति पर कौन फिदा नहीं होगा! फेसबुक और ट्विटर पर हिंदू अस्मिता के नाम पर मुसलमानों के खिलाफ इन दिनों खूब विष वमन किया जा रहा है। कुछ लोग फेसबुक और ट्विटर पर ऐसे सक्रिय हैं, जो हिंदुत्ववादी संगठनों के पेड कार्यकर्ता लगते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो सोशल साइट्स पर सेक्युलरिज्म के नाम पर ऊलजुलूल बातों को पोस्ट करते हैं, उन पर कमेंट करते हैं। ऐसा लग रहा है कि मीडिया और सोशल साइट्स पर दो मोर्चे खुले हुए हैं और दोनों का एक ही लक्ष्य है, अपने विरोधियों को शिकस्त देना। आगामी लोकसभा चुनाव के बाद हो सकता है कि ये दोनों मोर्चे (हिंदुत्ववादी और सेक्युलरवादी) मीडिया, फेसबुक और ट्विटर से गायब हो जाएं, क्योंकि तब तक इनका अभीष्ट पूरा हो चुका होगा। हां, इसका खामियाजा भुगतेंगे इस देश के करोड़ों हिंदू और मुसलमान। सोशल नेटवर्किंग से धार्मिक कट्टरता का पाठ पढ़ चुके लोग जब समाज में बैठेंगे, तो वहां भी विष वमन ही न करेंगे? और नतीजा...? यह होगा कि हिंदू-मुसलमान एक दूसरे को फूटी आंखों से भी देखना पसंद नहीं करेंगे।
ऐसी हालत में दोनों धर्मों के लोगों को सिर्फ एक बात समझने की जरूरत है। हिंदुओं को यह बात अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए कि इस देश से मुसलमान कहीं नहीं जाने वाले हैं। 16 करोड़ मुसलमानों को क्या समुद्र में फिंकवाया जा सकता है? क्या उन्हें पाकिस्तान या बांग्लादेश भेजा जा सकता है? क्या इन मुसलमानों को इस्लामी मुल्क का ठप्पा लगाए बैठे किसी दूसरे देश में भेजा जा सकता है? निश्चित तौर पर नहीं। जब भारत के नागरिक इन मुसलमानों को हिंदुस्तान में ही रहना है, तो क्यों न उन्हें भी हिंदुओं की तरह जीने दिया जाए। उनके साथ दोस्ताना व्यवहार किया जाए, उन्हें अपना हमदर्द पड़ोसी मानकर उनके साथ मानवीय व्यवहार किया जाए। उन्हें अपने धार्मिक रिवायतों के साथ जीवन निर्वाह की सहूलियत दी जाए। और मुसलमानों को भी अपने दिमाग में एक बात अच्छी तरह से बिठा लेनी चाहिए कि इस देश के प्रति जितने जवाबदेह यहां रहने वाले हिंदू हैं, उतनी ही जवाबदेही उनकी भी बनती है। आज से आठ सौ साल पहले भले ही बाबर विदेशी आक्रांता रहा हो, लेकिन उसकी बाद के वंशजों ने इसे अपना ही मुल्क माना। यदि उनके वंशजों के दिलोदिमाग में विदेशी होने की बात होती, तो मुगलिया खानदान के शासकों ने हिंदुस्तान में इतनी खूबसूरत इमारतों को तामीर नहीं कराया होता। दिल्ली और आगरे का लाल किला, आगरे का ताजमहल जैसी विश्व प्रसिद्ध इमारतें वजूद में न आई होतीं। मुगल बादशाह हुमायूं के बाद की पीढ़ी ने यहां की प्रजा को अपनी प्रजा मानकर उनके सुख-दुख में एकसार होने का प्रयास किया, तो आज के मुसलमान ऐसा क्यों नहीं कर सकते? वे अपने पड़ोसी हिंदुओं से कटकर अपना विकास नहीं कर सकते हैं। उन्हें अगर किसी तरह की तकलीफ होती है, तो उसका निराकरण करने उनका पड़ोसी हिंदू ही आएगा। फिर यह जाति-धर्म का झमेला क्यों? अक्सर ऐसा देखा जाता है कि जब भी भारत-पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच होता है, तो कुछ शहरों के कुछ विशेष हिस्सों में तनाव की स्थिति पैदा हो जाती है। भारत जिंदाबाद के साथ-साथ पाकिस्तान जिंदाबाद के भी नारे गूंजते हैं। क्या ऐसा करना किसी भी दृष्टिकोण से जायज है? कोई भी वतनपरस्त मुसलमान इसको पसंद नहीं करेगा। टेनिस सनसनी सानिया मिर्जा की भले ही पाकिस्तानी नागरिक से शादी हो गई हो, लेकिन वे आज भी पाकिस्तान के बजाय हिंदुस्तान के लिए खेलती हैं। यह उनकी मादरेवतन के प्रति प्रेम और निराशा को दर्शाता है। हर देशवासी को यह बात समझ लेने की जरूरत है कि भारत-पाक बंटवारा एक हकीकत है। इसे कोई झुठला नहीं सकता है। सन 1947 में एक ही घर के दो टुकड़े हुए थे, तो क्या उनके आपसी रिश्ते खत्म हो गए थे? हां, दोनों देशों के सियासतदानों ने भौगोलिक बंटवारे के साथ-साथ दिल भी बांट लिया था। लेकिन आज जरूरत है कि हिंदू अपने मत और संप्रदाय के मुताबिक आचरण करें, मुसलमान अपने। अगर हिंदू और मुसलमानों के धार्मिक नेता उकसावे की राजनीति न करें, तो ऐसा संभव भी है। रोजी-रोटी, हारी-बीमारी और भुखमरी के दुष्चक्र में फंसी आम जनता को कहां इतनी फुर्सत है कि वह धार्मिक मुद्दों को लेकर अपने भाई-बंधुओं, टोले-मोहल्ले के लोगों से उलझता फिरे। यह उलझन पैदा करते हैं अपने वोट बैंक की राजनीति करने वाले सियासी दलों और धार्मिक संगठनों के नेता।
इस देश में सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि आजादी के बाद हिंदू, मुसलमान, सिख और ईसाई विभिन्न धर्म और मतावलंबी न होकर वोट बैंक में तब्दील हो गए हैं। सबको धार्मिक और जातीय आधार पर बंटे वोट बैंक के रूप में देखा जा रहा है। इस घिनौनी राजनीति ने तो हिंदुओं में भी कई विभेद पैदा कर दिए हैं, ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया, दलित। इतने पर भी संतोष नहीं हुआ, तो इनमें भी दलित, महादलित जैसे विभेद पैदा कर दिए गए। देश का नेतृत्व अगर मानवीय और सहिष्णु हो, तो हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई जैसे धर्मों के लोग बड़े प्रेम से रह सकते हैं। इसका सबसे बढ़िया उदाहरण सन् 1857 में हुए गदर के दौरान देखा गया। इतिहास गवाह है कि जब सन् 1857 का गदर चल रहा था, तो उत्तर भारत के पंडितों और मौलवियों का भाईचारा दुनिया के सामने सांप्रदायिक एकता का एक बेमिसाल उदारण बनकर   उभरा था। अवध, रुहेलखंड, झांसी, कानपुर, बनारस, पटना, दिल्ली आदि रियासतों के हिंदू-मुसलमान कितनी शिद्दत से एक दूसरे से कंधे से कंधा मिलाकर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लड़ रहे थे। अवध प्रांत की राजधानी लखनऊ का मूल निवासी पीर अली पटना में हिंदू विद्रोहियों का नेतृत्व कर रहा था। यही नहीं, उत्तर भारत के पंडित-पुरोहित अपने जजमानों से कहते थे कि वे चारों धाम की यात्रा पर जाएं। वहीं मौलवी अपने धर्मानुयायियों से हज करने जाने पर जोर दे रहे थे, ताकि लोग अपने घरों से निकलें और देश में हो रही विद्रोही गतिविधियों से परिचित हों। मंदिरों और मस्जिदों में पंडित और मौलवी अंग्रेजों के खिलाफ एक साथ मिलकर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जनता के भड़का रहे थे। उत्तर भारत में अंग्रेजी सेना पर ‘हर हर महादेव’ और ‘दीन दीन’ कहकर टूट पड़ने वालों ने कभी एक दूसरे से नहीं पूछा कि तुम्हारा मजहब या धर्म क्या है? फिर हम अपने देश की खुशहाली, समृद्धि और शांति के लिए एक होकर नहीं रह सकते हैं? रह सकते हैं, बशर्ते यह सियासत हमें एक रहने दे, तब। सत्ता की सीढ़ियां तो धर्म, जाति, संप्रदाय, भाषा और क्षेत्र की उठापटक और लड़ाई-झगड़े से होकर जाती है। आज यह समय आ गया है, जब इस देश के राजनीतिज्ञों से यह पूछा जाए कि अगर इस देश के मुसलमान अवांक्षित हैं, तो वे जाएं कहां?

बप्पा मर गए

-अशोक मिश्र
किसी बहुत पुराने समय में किसी गांव में रहते थे बप्पा। बप्पा का एक ही बेटा था। कलकत्ता शहर में रहता था। छह महीने बाद बेटा शहर से गांव आया, तो जाते समय उसने बप्पा से कहा, ‘बप्पा! इन दिनों खेत का भी काम नहीं है, क्यों न आप मेरे साथ शहर चलें। आपने जिंदगी भर शहर भी नहीं देखा है।’ बप्पा भी पता नहीं किस मूड में थे। उन्होंने कहा, ‘चलो...शहर ही घूम आते हैं।’ बप्पा शहर में करीब पंद्रह-बीस दिन रहे और अपने गांव की ओर रवाना हो गए। बेटे ने सोचा कि जब बप्पा शहर आ रहे थे, तो उसकी विवाहिता बहन भी वहीं थी। उसने कहा था, ‘भइया! बप्पा का हाल-चाल बताते रहना।’ जब बप्पा गांव रवाना हो गए, तो उसने सोचा कि दीदी को भी खबर कर दूं। उसने दीदी की ससुराल तार (टेलीग्राम) भेजा, ‘बप्पा घर गए।’ दीदी की ससुराल में तार पहुंचते ही हाहाकार मच गया। अब उस तार को पढ़ने के लिए किसी योग्य व्यक्ति की खोज होने लगी। गांव में सिर्फ हरीशर का बारह वर्षीय बेटा परमेसरा ही छठवीं तक पढ़ा था। परमेसरा की खोज की गई, वह डरता-सकुचाता आया। उसने हिज्जे मिला-मिलाकर पढ़ा, ‘बप्पा...म...र...ग...ए।’
इतना सुनना था कि बप्पा की बेटी दहाड़ मारकर रो उठी। उसने परमेसरा से बिलखते हुए तार छीना और धोती-कपड़ा उठाकर मायके की ओर चल पड़ी। मायके की डांड़ (चौहद्दी) पर पहुंचकर दहाड़ मारकर फिर रोने लगी, ‘हाय...हमार...बप्पा...आहाहहह...हाय...हमार...बप्पा...अब हम का करी...।’ गांव के बाहर बाग में खेल रहा बुधई दौड़ता हुआ बप्पा के घर पहुंचा और बप्पा की पत्नी से बोला, ‘काकी...काकी...बहिनी...गांव के बाहर रोती हुई आ रही हैं। लगता है...उनके बप्पा को कुछ हो गया है।’ बप्पा की पत्नी की समझ में आया कि उसके पति बेटे के साथ शहर गए थे, अभी तक लौटे भी नहीं हैं। वहीं उन्हें कुछ हो गया होगा, जिससे उनकी मौत हो गई है। बेटी को तार या चिट्ठी मिली होगी, तभी वह रोती-बिलखती हुई आ रही है। तब तक बप्पा की बेटी भी गांव में प्रवेश कर चुकी थी। गांव की कुछ महिलाएं उत्सुकतावश गांव के बाहर आ गईं। गांव की बेटी को रोती देखकर वे भी टसुए बहाने लगीं। उनको रोता देखकर बेटी ने फिर से छाती पीटते हुए कहा, ‘हाय...हमार बप्पा...हमका...अंतिम...समय...मां...आपन मुहौ (मुंह) नाही देखायव...हाय रे दइया...अब हम का करिवै...बप्पा।’ रोती बिलखती बेटी घर पहुंची, तो उसके आने की सूचना पहले ही पहुंच चुकी थी। गांव की अड़ोस-पड़ोस की महिलाएं और लोग दरवाजे पर जमा हो चुके थे। बेटी को देखते ही उसकी मां भी जोर-जोर से हिचकी लेकर रोने लगी। बप्पा की पत्नी भी छाती पीटती हुई रोने लगीं, ‘हाय...हमार...बपई...शहर...गए...रह्यो...घूमै टहरै का। हम का जानित रहै, अब न लौटिहौ..जौ जानि पाइत..तौ शहर काहे जाय देइत...।’
यह सुनते ही वहां मौजूद महिलाएं कोरस में रोने लगीं। बप्पा की बेटी या पत्नी में से कोई एक ऊंचे स्वर बैन (मरने वाले को याद करते हुए कुछ कहकर रोना) करती, तो मौजूद महिलाएं उसी को दोबारा कहकर फिल्म रुदाली वाले अंदाज में रोने लगतीं। सुबह आठ-नौ बजे पहुंची बेटी ने जब देखा कि दोपहर के दो बज गए हैं, तो वह धोती-ब्लाउज उठाकर रोती हुई गांव के बाहर स्थित तालाब की ओर चल दी। हिंदू समाज में यह परंपरा सदियों से चली आ रही है कि किसी की भी मौत होने पर उसके घर और भाई-पट्टीदारी की महिलाएं तालाब या नदी में नहाती हैं। इसके बाद ही पुरुष भी तालाब या नदी में नहाने जाते हैं। बेटी को नहाने जाते देखकर बप्पा की पत्नी और टोले-मोहल्ले की महिलाओं ने भी कपड़ा उठाया और तालाब की ओर चल दीं। रास्ते में और नहाते समय भी महिलाएं विलाप करती रहीं। घर के बाहर जमा पुरुष बप्पा के बारे में बात करके दुखी हो रहे थे। किसी ने कहा, ‘बप्पा बहुत दयालु थे।’ तो किसी ने पुराने दिनों को याद करते हुए कहा, ‘एक बार बप्पा नौरइया की बगिया से होकर शाम को कहीं जा रहे थे। बगिया में एक पीपल का पेड़ था। उस पेड़ पर बरम (ब्रह्म-पिशाच) रहता था। वह बप्पा के सामने आया और बोला, इधर से नहीं जाने देंगे। बप्पा भी अड़ गए। भइया...रात भर दोनों में मल्ल जुद्ध होता रहा। कभी बप्पा पटकनी देते, तो कभी बरम। न बप्पा हार मानें, न बरम। जब सुबह होने लगी, तो बरम यह कहते हुए गायब हो गया, कल फिर आना। तुमसे जुद्ध करके मजा आया। सुबह मैं उधर से जा रहा था। देखा, बप्पा बेहोस पड़े आंव-बांव बक रहे हैं। एक सौ चार-एक सौ पांच डिगरी बुखार चढ़ा हुआ था। बड़ी मुश्किल से उस बार बप्पा की जान बची थी।’
महिलाएं जब तालाब से नहाकर घर आईं, तो बेटी ने चूल्हा जलाया और अपनी मां से पूछा, ‘अम्मा...बप्पा मरे कब?’ मां ने कहा, ‘बिटिया ई तो तुमही बताइहौ। तुमही रोती-पीटती यहां आई थी।’ बेटी ने कहा,‘अम्मा! भइया का तार आवा रहा कि बप्पा मर गए। यह देखौ तार।’ इतना कहकर उसने अपने झोले में से तार निकाला और अम्मा को थमा दिया। अम्मा तार लेकर गांव के ही मथुरा प्रसाद के पास गईं। बप्पा के मरने पर लोगों के साथ नदी नहाकर वे लौटे थे। उन्होंने तार पढ़कर हंसते हुए कहा, ‘इसमें लिखा है, बप्पा घर गए।’ फिर बप्पा अभी तक घर क्यों नहीं पहुंचे? दरअसल, बात यह थी कि जब बप्पा घर की ओर आ रहे थे, तो उन्होंने सोचा, रास्ते में ससुराल है। बहुत दिन   हुए सलहज (साले की पत्नी) से हंसी-ठिठोली नहीं की है। सो, उससे भी मिलते चलें। और...रसीली सलहज ने उन्हें पंद्रह दिन तक आने नहीं दिया था।ं