अशोक मिश्र
आए दिन अखबारों में खबरें छपती रहती हैं कि सरपंच पति ने बैठक में भाग लिया और लोगों को आश्वासन दिया कि पंचायत के अंतर्गत आने वाली सड़कों की मरम्मत कराई जाएगी। ऐसी ही कुछ खबरें पार्षद पति के संबंध में आती रहती हैं। सरपंच पति या पार्षद पति कोई संवैधानिक पद नहीं है। जब किसी पंचायत की सरपंच कोई महिला चुनी जाती है, तो लोग उसके पति को सरपंच पति कहने लगते हैं।यही हाल वार्डों में किसी महिला के पार्षद चुने जाने पर होता है। आमतौर पर देखने में यह आता है कि जब कोई महिला सरपंच या पार्षद अथवा अन्य पदों पर चुनी जाती है, तो प्राय: उसके पति ही सारा कामकाज संभालते हैं। कई मामलों में महिला सरपंच के पति स्वयं को सरपंच प्रतिनिधि बताकर सरकारी बैठकों, प्रशासनिक कार्यों और सुनवाई की प्रक्रिया में भाग लेते हैं। सच तो यह है कि ऐसी स्थिति महिलाओं को मिले सांविधानिक अधिकारों और पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण देने की मूल भावना के विपरीत है।
दरअसल, पंचायतों में महिला आरक्षण की पहल का श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी को जाता है जिन्होंने 1989 में पहली बार संसद में 64वां संविधान संशोधन विधेयक पेश कर पंचायतों और नगर पालिकाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रस्ताव रखा था, लेकिन यह राज्यसभा में पारित नहीं हो सका था। बाद में पंचायती राज में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण, पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने 73वें संविधान संशोधन (1992) के माध्यम से दिलवाया, जो 24 अप्रैल 1993 से लागू हुआ था। ग्राम पंचायतों और नगर पालिकाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का निहितार्थ यह था कि देश में सबसे ज्यादा पिछड़ी स्त्री जाति को भी उनकी उन्नति के मार्ग पर चलाने का प्रयास किया जाए।
घरों से निकल जब महिलाएं कार्य क्षेत्र में आएंगी, तो वह अपने अधिकारों के प्रति सचेत होंगी और महिलाओं को भी जागरूक करेंगी। लेकिन कुछ मामलों में ऐसा नहीं हुआ। पुरुषों ने अपनी पत्नियों को घर पर बिठा दिया और उनका पति होने के नाते शासन करने लगे। अभी हाल ही में हरियाणा राज्य सूचना आयोग ने महिला सरपंच की जगह उनके पति द्वारा सरकारी बैठकों और सूचना का अधिकार में पैरवी करने पर कड़ा संज्ञान लिया था।
आयोग ने स्पष्ट किया था कि महिला प्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पतियों या प्रॉक्सी की भागीदारी पूरी तरह से गैर-कानूनी है। हरियाणा में ऐसे मामले अक्सर सामने आते रहते हैं। गुरुग्राम जैसे नगर निगमों ने भी महिला पार्षदों की जगह उनके पतियों के बैठक में बोलने या हस्तक्षेप करने की प्रथा के खिलाफ सख्त कदम उठाए हैं। महिलाओं को यदि अपनी स्थिति में सुधार लाना है, तो उन्हें अपने अधिकारों और कर्तव्यों का खुद पालन करना होगा। तभी महिला सशक्तिकरण का सपना साकार होगा।
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