बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
हार और जीत जीवन के दो पहलू हैं। दोनों का समान रूप से स्वागत करना चाहिए। हारने पर निराश होकर बैठ जाना कतई उचित नहीं है, लेकिन सफलता मिलने पर इतराना और घमंड करना भी गलत है। एक बार की बात है। एक लड़का हाई स्कूल की परीक्षा में फेल हो गया।फेल होने पर उसके सहपाठियों ने उसका खूब मजाक उड़ाया। स्कूल से जब वह घर लौटा तो बहुत हताश था। साथियों का उपहास उड़ाना उससे बर्दाश्त नहीं हो रहा था। इसके चलते वह भारी तनाव में आ गया। उसके पिता ने जब उसकी हालत देखी तो समझाया कि बेटा! जीवन में उतार-चढ़ाव आते ही रहते हैं। ऐसी परिस्थितियों से विचलित होकर जो हताश हो जाते हैं, वह जीवन में कुछ नहीं कर पाते हैं।
तुम फेल होने पर इतने दुखी मत हो। विफलता सिखाती है कि जीवन में कैसे सफल हुआ जाए। इसलिए तुम परेशान होने की जगह नए जोश के साथ जुट जाओ और अगली परीक्षा में सफल होकर दिखाओ। लेकिन इतने से भी लड़के को संतोष नहीं हुआ। एक दिन आत्महत्या करने के इरादे से घर से निकल गया। रास्ते में उसे एक बौद्ध मंदिर दिखाई पड़ा जिसके अंदर से आवाज आ रही थी।
वह उत्सुकतावश मंदिर के अंदर गया। मंदिर में एक भिक्षुक कह रहा था कि पानी गंदा क्यों नहीं होता है, क्योंकि वह बहता रहता है। पानी की बूंदें झरने से निकलकर नदी में, नदी से महानदी में और महानदी से समुद्र में मिल जाती हैं क्योंकि वह बहता रहता है। कोई भी बाधा पानी को नहीं रोक पाती है क्योंकि पानी बहता रहता है। बहना और चलना ही जीवन है।
यह सुनकर लड़के ने आत्महत्या का विचार त्याग दिया और मन में ठान लिया कि वह सफल होकर दिखाएगा। आगे चलकर वह एक बहुत प्रसिद्ध राजनेता बना।

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