Sunday, June 28, 2026

चल हट नासपीटे!

-अशोक मिश्र
जेठ की भरी दुपहरिया में पैदल डग भरते हुए रामभूल उपाध्याय कार्यालय की ओर चले जा रहे थे। उनका पूरा शरीर स्वेदयुक्त होकर चिपचिपायमान हो रहा था। आधी दूरी तय करने के बाद उनकी हिम्मत जवाब दे गई, तो वे नीम के एक पेड़ के नीचे खड़ा होकर सुस्ताने लगे। वायुदेव की कृपा से जैसे ही स्वेद बिंदु सूखे। उन्होंने काक प्रवृत्ति अख्तियार कर ली। उन्हें नीम वृक्ष से मात्र दस कदम की दूरी पर महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की अमर काव्य कृति ‘वह तोड़ती पत्थर’ की नायिका के दर्शन हो गए। वह पत्थर तोड़ने की बजाय सड़क के किनारे बोरी बिछाकर धूप में बैठी सब्जियां बेच रही थी। श्याम वर्णी काया पर चमकती पसीने की बूंदें, पैरों की फटी बिवाइयां, अस्त व्यस्त केश, तंबाकू या गुटखा चबाने से चितकबरी हो गईं दंतावलियां मिलकर पीड़ा और करुणा का एक कोलाज रच रहे थे। रामभूल के मन में उसके प्रति सहानुभूति की विलुप्त सरस्वती अनायास बह निकली।
रामभूल सोचने लगा। अगर यह महिला सुबह-शाम महकउवा साबून से नहाए, बालों में बढ़िया क्वालिटी का शैंपू लगाए, तो इसकी काया कैसी निखर उठेगी। अगर गोरेपन की क्रीम भी सुबह, दोपहर, शाम और रात को नियमित रूप से लगाए, तो यह गोरी दिखाई देने लगेगी। विज्ञापन में तो हीरोइन क्रीम लगाने से पहले तो एकदम उल्टे तवे जैसी दिखती है। मगर क्रीम बनाने वालों का कमाल देखिए, इधर क्रीम हाथ, पैर और चेहरे पर पुता, उधर कालापन संघनित कोहरे की तरह गायब होने लगता है। पैंतीस-चालीस सेंकेड के विज्ञापन में जितनी गोरी होती हीरोइन को दिखाया जाता है, अगर उसका चालीस फीसदी यह सब्जी बेचने वाली गोरी हो जाए, तो इसके चेहरे की लुनाई और त्वचा की चिकनाई थोड़ा और निखर उठेगी। और अगर कहीं यह एलेवेरा-फेलोवेरा का जेल लगाकर सुबह-शाम मुंह धोए, कुछ तेल-फुलेल, इत्र-वित्र लगा ले, तो इसकी कंचनी काया के आकर्षण में ही ग्राहक सौ-पचास रुपये की सब्जी ज्यादा खरीद लेंगे।
रामभूल उपाध्याय आई टॉनिक लेने की गरज से सब्जी वाली के नजदीक गए और बोले, ’इधर पेड़ की छाया में क्यों नहीं लगा लेती अपनी दुकान?’ उसने उदासीन भाव से कहा, ’जिसके घर के सामने यह पेड़ है, उस घर की औरत वहां दुकान लगाने पर झगड़ा करती है।’ रामभूल ने शब्दों में शहद घोलते हुए कहा, ’तो फिर बांस-बल्ली लगाकर पन्नी-वन्नी क्यों नहीं तान लेती?’ रामभूल की बात सुनकर चेहरे पर रंचमात्र क्रोध का भाव झलका, ’पुलिस और नगर पालिका वाले बांस-बल्ली, छानी-छप्पर उजाड़ जाते हैं। सब्जियां छितरा देते हैं, नालियों में फेंक जाते है। उन्हें इकट्ठा कर धोती हूं और बेचती हूं।’
‘धूप में बैठने से देखो तुम्हारा शरीर काला पड़ गया है। कंडे की आंच में भुना हुआ भांटा लग रही हो।’ रामभूल ने उसकी श्याम वर्णी काया को निहारते हुए कहा, ‘अगर तुम अपने शरीर का ख्याल रखो। ब्यूटी पार्लर में जाकर पेडिक्योर, मेनिक्योर, आईब्रो सेटिंग करवा लो, फिर देखो, ग्राहकों की संख्या कैसे बढ़ती है।’ यह सुनकर उसने अपने अस्त व्यस्त कपड़ों को संभाला और गुर्राती हुई बोली-‘चल हट नासपीटे! तुम जैसों को रोज धनिये के साथ फ्री बेच लेती हूं। बड़ा आया सहानुभूति जाने वाला।’ यह सुनते ही रामभूल ने चुपचाप खिसक लेने में ही भलाई समझी।
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