बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
तुलसीदास बलराम को भारतीय फुटबॉल को स्वर्ण युग में लाने का श्रेय दिया जाता है। बलराम का जन्म 4 अक्टूबर, 1936 को ब्रिटिश-अधिकृत हैदराबाद के सिकंदराबाद के पास अम्मुगुडा गाँव में हुआ था। उनका जन्म एक बहुत ही गरीब परिवार में हुआ था। गरीबी के बावजूद बचपन से ही उन्हें फुटबॉल खेलने का बहुत शौक था। तमाम परेशानियों के बावजूद बलराम ने लल्लागुडा वर्कशॉप ग्राउंड में फुटबॉल खेलना शुरू किया।उन्होंने शुरुआती दौर से ही हैदराबादी शैली के वन-टच फुटबॉल का अभ्यास किया। सिकंदराबाद लीग में सिविलियंस और आर्मी इलेवन के बीच हुए एक मैच के दौरान उन्हें पहचान मिली। उस समय उनके परिवार की हालत यह थी कि फुटबॉल मैच खेलने के लिए उनके पास जूते नहीं थे। बिना जूतों के फुटबॉल मैच खेलना लगभग असंभव था। आखिरकार बहुत सोच-समझकर वह सिकंदराबाद के ही एक जूते बनाने वाले के पास पहुंचे।
उन्होंने जूते बनाने वाले को अपनी सारी स्थिति बताई। उससे कहा कि यदि उसे जूते नहीं मिले, तो वह टूर्नामेंट नहीं खेल पाएगा। उससे कोई पुराना जूता देने की विनती की। जूता बनाने वाले ने कहा कि उसके पास कोई पुराना जूता नहीं है। अगर वह कहीं से पुलिस का पुराना जूता ले आए, तो वह उसे पहनने लायक बना देगा। काफी प्रयास के बाद उसकी मुलाकात एक ट्रैफिक पुलिसकर्मी से हुई।
उसकी व्यथा-कथा सुनकर पुलिसकर्मी ने अपना पुराना जूता दिया। मरम्मत करने वाले ने दो रुपये में जूता ठीक कर दिया। उस टूर्नामेंट में बलराम ने गोल पर गोल मारकर सबको हैरान कर दिया। बाद में प्रसिद्ध कोच सैयद अब्दुल के मार्गदर्शन में वह 1956 में संतोष ट्राफी और मेलबर्न ओलंपिक तक पहुंचा। बलराम ने भारत के लिए कुल 33 मैच खेले और अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में 12 गोल किए। बलराम का निधन 16 फरवरी 2023 को 86 वर्ष की आयु में हुआ।
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