अशोक मिश्र
धान की रोपाई करने पर हरियाणा सरकार की ओर से लगाई गई पाबंदी आज यानी 15 जून को समाप्त हो जाएगी। कल के बाद किसान अपनी सुविधानुसार धान की रोपाई कर सकेंगे। हरियाणा में पिछले कुछ दशकों से भूजल स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है जिसकी वजह से साठ दिन में पैदा होने वाले धान की रोपाई पर प्रदेश सरकार ने 15 जून तक रोपाई पर प्रतिबंध लगा रखा है।वैसे भी प्रदेश के लगभग सभी जिलों में लगातार गिरता भूजल स्तर राज्य सरकार, कृषि विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। राज्य सरकार हर संभव प्रयास कर रही है कि लगातार गिरते भूजल स्तर को रोका जाए और लोगों को होने वाली पानी की कमी की समस्या को दूर किया जाए। आज हालात यह है कि हरियाणा में दिनोंदिन गिरता भूजल स्तर एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है। कृषि प्रधान राज्य होने के कारण यहाँ पानी का अत्यधिक दोहन होता है, जिसके चलते लगभग 88 ब्लॉक 'अति-शोषित' (डार्क जोन) की श्रेणी में आ चुके हैं।
पानी की किल्लत के कारण हजारों नलकूप सूख चुके हैं। प्रदेश के लगभग 14 जिलों की स्थिति चिंताजनक है, जहाँ भूजल स्तर 30 मीटर से भी नीचे चला गया है। महेंद्रगढ़, कुरुक्षेत्र, करनाल, कैथल, अंबाला, हिसार और जींद में भूजल का दोहन सबसे अधिक हुआ है। यही वजह है कि प्रदेश सरकार धान की जगह मक्का, बाजरा और दलहन जैसी कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा दे रही है। इतना ही नहीं, सरकार इसके लिए किसानों को प्रोत्साहन राशि भी देती है। सरकार चाहती है कि प्रदेश में धान की फसल कम से कम उगाई जाए ताकि पानी की बचत हो सके। एक बीघा धान बोने से लेकर फसल तैयार होने तक औसतन तीन से पांच लाख लीटर पानी खर्च होता है।
इतना पानी खर्च करने के बाद अगर धान की फसल तैयार होती है, तो पूरे प्रदेश में धान की फसल पर कितना पानी खर्च होता है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। प्रदेश में लगातार गिरते भूजल स्तर का एक प्रमुख कारण धान की खेती भी है। लेकिन यदि किसान चाहें तो आधुनिक तकनीक से पानी की खपत को काफी कम कर सकते हैं। सीधी बुवाई करने से धान की फसल उगाने पर खर्च होने वाले पानी की पचास से साठ प्रतिशत बचत की जा सकती है।
ड्रिप इरीगेशन विधि से धान उगाने पर पानी का वाष्पीकरण कम होता है और सिंचाई पर होने वाला पानी और खर्च दोनों बचते हैं। लेकिन ज्यादातर किसान ऐसा नहीं सोचते हैं। वह धान की अगेती फसल बोकर जल्दी से जल्दी खेत खाली कर लेना चाहते हैं ताकि अगली फसल आलू, सरसों जैसी फसलों को बोकर ज्यादा कमाई की जा सके। अगेती फसल में धान के प्रमुख कीटों और बीमारियों का प्रकोप बहुत कम देखने को मिलता है। लेकिन किसानों को यह सोचना चाहिए कि धान की खेती करने पर पानी की होने वाली बरबादी कम नहीं है। पानी की बरबादी राष्ट्र का नुकसान है।
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